राजस्थान के भरतपुर जिले के देहाती अंचलों और धार्मिक आश्रमों में आज भी पारंपरिक और सात्विक खानपान की परंपरा जीवित है। भारी-भरकम मसालों और लहसुन-प्याज के छौंक से दूर, वहां के लोग हल्के, सुपाच्य और सादे भोजन को प्राथमिकता देते हैं। खासकर साधु-संतों की कुटियों, आश्रमों और स्थानीय तीर्थस्थलों पर बिना लहसुन-प्याज के भोजन तैयार करने का पुराना रिवाज रहा है। इसी परंपरा का एक बेहतरीन उदाहरण है तोरई, आलू और टमाटर के मेल से बनने वाली सात्विक सब्जी, जो अपनी सरलता और प्राकृतिक स्वाद के कारण हर किसी के मन को भाती है।
रसोई में मौजूद सामान्य सामग्री से करें तैयारी
इस व्यंजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे बनाने के लिए किसी विशेष सामग्री या जटिल तैयारी की आवश्यकता नहीं होती। घर पर सहजता से मिलने वाली तोरई, आलू और दो से तीन पके हुए लाल टमाटर ही इसके मुख्य आधार हैं। तैयारी शुरू करने के लिए सबसे पहले ताजी तोरई और आलू को साफ पानी में अच्छी तरह धो लें। इसके बाद तोरई का छिलका उतारकर उसे मध्यम या छोटे टुकड़ों में काट लें। आलू को भी छीलकर छोटे-छोटे चौकोर टुकड़ों में काट लें। साथ ही, दो से तीन टमाटरों को बारीक काटकर अलग रख लें ताकि छौंक के समय वे सब्जी में आसानी से घुल-मिल सकें।
धीमी आंच पर पकाने की सरल विधि
सब्जी पकाने के लिए सबसे पहले एक कड़ाही में थोड़ा सा कुकिंग ऑयल या देसी घी डालकर गर्म करें। जब घी या तेल गर्म हो जाए, तब उसमें जीरे का तड़का लगाएं। जीरा चटकने के तुरंत बाद कटे हुए आलू के टुकड़े डालें और उन्हें कुछ मिनटों तक हल्का सुनहरा होने तक भून लें। आलू के हल्के भुन जाने पर कड़ाही में कटी हुई तोरई और बारीक कटे टमाटर डाल दें। इसके बाद स्वादानुसार नमक और थोड़ी हल्दी डालकर सभी चीजों को अच्छी तरह चलाएं, ताकि मसाले सब्जियों पर एकसमान लिपट जाएं।
पानी की जरूरत और धीमी आंच का कमाल
मसाले मिलाने के बाद कड़ाही को ढक्कन से ढक दें और गैस की आंच धीमी कर दें। इस सब्जी में शुरुआत में अलग से पानी डालने की बिल्कुल जरूरत नहीं होती, क्योंकि तोरई पकते समय अपना प्राकृतिक पानी छोड़ती है। उसी भाप और नमी में आलू और तोरई धीमी आंच पर धीरे-धीरे गलते हैं। यदि पकने के दौरान लगे कि मिश्रण सूख रहा है या तले में चिपक सकता है, तभी बहुत मामूली मात्रा में पानी छिड़का जा सकता है। कुछ देर पकने के बाद जब आलू और तोरई पूरी तरह नरम हो जाएं और टमाटर गलकर रस में घुल जाएं, तो करछुल से सब्जी को हल्के हाथ से चला लें।
परोसने का पारंपरिक तरीका और देसी स्वाद
सब्जी तैयार होने के बाद यदि आप चाहें तो इसका स्वाद और खुशबू बढ़ाने के लिए ऊपर से एक छोटा चम्मच शुद्ध देसी घी डाल सकते हैं। देसी घी का हल्का सा स्पर्श इस सात्विक व्यंजन के जायके को दोगुना कर देता है। यह तैयार सब्जी गेहूं की सादी फुल्का रोटी, बाजरे की पारंपरिक रोटी या फिर गर्मागर्म पराठों के साथ परोसने के लिए एकदम मुफीद है। ग्रामीण अंचल की यही खासियत है कि वहां न्यूनतम सामग्री और सीमित मसालों में भी स्वास्थ्यवर्धक और तृप्त करने वाला भोजन तैयार कर लिया जाता है, जिसे कोई भी अपनी रसोई में आसानी से आजमा सकता है।


















