देश की राजधानी नई दिल्ली में कनॉट प्लेस का इलाका अपने भव्य बाज़ारों, आलीशान कैफे और सफ़ेद स्तंभों वाले गलियारों के लिए दुनिया भर में मशहूर है, लेकिन इसी आधुनिकता के बीच पारंपरिक खान-पान की एक बेहद लोकप्रिय दुनिया भी बसती है। बाबा खड़क सिंह मार्ग पर स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर में दर्शन करने पहुंचने वाले श्रद्धालुओं और इलाके की सैर पर निकले लोगों के लिए यहां का स्ट्रीट फूड सुबह की शुरुआत का एक अटूट हिस्सा बन चुका है। भोर होते ही जब मंदिर के आसपास की दुकानों में बड़ी-बड़ी कड़ाही में कचौड़ियां छननी शुरू होती हैं, तो तेल में तलती खस्ता परतों और खौलती मसालेदार सब्जी की महक दूर-दूर तक फैल जाती है। इस महक की खिंचाई ऐसी होती है कि राहगीर, दफ्तर जाने वाले लोग और मंदिर के दर्शनार्थी खुद-ब-खुद इन दुकानों की तरफ खिंचे चले आते हैं।
कुरकुरी कचौड़ी और तीखी आलू की सब्जी का अनोखा मेल
मंदिर परिसर के बाहर मिलने वाले इस नाश्ते की सबसे बड़ी खासियत इसकी ताजगी और अनोखा कुरकुरापन है। कड़ाही के खौलते तेल से सीधे निकालकर पत्तल या प्लेट में रखी जाने वाली खस्ता कचौड़ी को जब विशेष रूप से तैयार मसालेदार आलू की सब्जी के साथ परोसा जाता है, तो यह साधारण सा लगने वाला व्यंजन स्वाद का एक बेमिसाल अनुभव बन जाता है। सब्जी में डाले गए तीखे और चटपटे खड़े मसालों का तीखापन कचौड़ी की दाल भरी परत के साथ मिलकर ऐसा स्वाद तैयार करता है जिसे चखने के बाद लोग बार-बार खिंचे चले आते हैं। कई लोग हनुमान जी के दर्शन पूजन के तुरंत बाद सीधे इन नाश्ते की ठेलों और दुकानों का रुख करते हैं, वहीं बाज़ार में सुबह की सैर पर निकले लोग कड़ाही से उठती खुशबू से प्रभावित होकर रुक जाते हैं। दुकानों के सामने खड़े होकर गरमागरम नाश्ते का लुत्फ उठाने का अंदाज़ और चारों तरफ दिखने वाली पुरानी दिल्ली जैसी जीवंत चहल-पहल इस पूरे माहौल को बेहद खास बना देती है।
मसालेदार स्वाद के बाद ठंडी लस्सी और मिठाइयों का ज़ायका
तीखी और चटपटी कचौड़ी-सब्जी का सेवन करने के बाद ठंडी लस्सी का घूंट इस पूरे खान-पान के अनुभव को पूरी तरह संतुलित कर देता है। गाढ़ी, मलाईदार और ठंडी लस्सी यहां नाश्ता करने वालों की पहली पसंद रहती है, जो मसालेदार खाने के तीखे असर को शांत कर एक मीठी ठंडक देती है। यही वजह है कि यहां आने वाले लोग इसे केवल भूख मिटाने का जरिया नहीं मानते, बल्कि दिल्ली के ठेठ देसी स्वाद को जीने का जरिया समझते हैं। कनॉट प्लेस की आधुनिकता के बीच यह कोना यह साबित करता है कि शहर का असली स्वाद सिर्फ बड़े, महंगे रेस्टोरेंट या वातानुकूलित कैफे में ही नहीं मिलता, बल्कि इन छोटी-छोटी खुली दुकानों और दोने-पत्तल में परोसी जाने वाली गरमागरम थालियों में भी जिंदा रहता है। हनुमान मंदिर के आध्यात्मिक दर्शन, दिलकश रास्तों की सैर और उसके बाद देसी कचौड़ी-सब्जी का यह पूरा सिलसिला दिल्ली की उस सरल और किफायती जीवनशैली का प्रतीक है, जहां बहुत कम खर्च में भी खाने का भरपूर आनंद मिल जाता है।
दुकानों की विविधता और ₹60 की थाली का पूरा हिसाब
इस इलाके में खान-पान के कई जाने-माने ठिकाने मौजूद हैं जो दशकों से लोगों को यह जायका परोस रहे हैं। इनमें श्री हनुमान कचौड़ी, श्री राम कचौड़ी और शर्मा कचौड़ी जैसी दुकानें प्रमुख हैं, जहां सुबह होते ही ग्राहकों की लंबी कतारें देखी जा सकती हैं। इन ठिकानों की खासियत केवल कचौड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि कचौड़ियों के साथ-साथ यहां कई अन्य पारंपरिक व्यंजन भी परोसे जाते हैं। मीठे के शौकीन लोगों के लिए गरमागरम चाशनी में डूबी जलेबी और गुलाब जामुन तैयार मिलते हैं, वहीं गुजराती स्वाद पसंद करने वालों के लिए कुरकुरा फाफड़ा और गाढ़ी लस्सी भी हर समय उपलब्ध रहती है। खर्च की बात करें तो यहां एक कचौड़ी की पूरी थाली की कीमत मात्र ₹60 तय की गई है। इस ₹60 की प्लेट में एक खस्ता कचौड़ी, उसके साथ भरपूर मसालेदार आलू की सब्जी और अंत में मुंह मीठा करने के लिए गरमागरम सूजी का हलवा शामिल रहता है, जो इस पूरे नाश्ते को एक संपूर्ण और किफायती भोजन बनाता है।



















