मिथिलांचल की रसोई परंपराओं में स्थानीय खानपान का अंदाज हमेशा से सादगी और संपूर्ण पोषण से जुड़ा रहा है। आमतौर पर घरों में बनने वाली गेहूं की पतली रोटियों के मुकाबले यहां तैयार होने वाली पारंपरिक मोटी रोटी का स्वाद और बनाने की शैली एकदम अनूठी है। सामान्य रोटी तैयार करते समय चकले पर आटे की लोई रखी जाती है और फिर उसे बेलन की सहायता से घुमा-घुमाकर पतला किया जाता है। साथ ही लोई चकले या बेलन से चिपके नहीं, इसके लिए सूखे गेहूं के आटे यानी पर्थन का सहारा लिया जाता है। इसके विपरीत, इस ग्रामीण देहाती रोटी को बनाने में न तो चकला-बेलन की आवश्यकता पड़ती है और न ही सूखे आटे की। इसे पूरी तरह दोनों हथेलियों की थाप और तालियां पीट-पीटकर गोल आकार दिया जाता है।
कई अनाजों का मेल और गूंथने का विशेष तरीका
इस देहाती रोटी को तैयार करने के लिए अनाज के चयन का विशेष महत्व होता है। मिथिलांचल के गांवों में पहले यह रोजमर्रा के खानपान का अहम हिस्सा हुआ करती थी, लेकिन अब लोग पारंपरिक देसी जायके का आनंद लेने के लिए इसे खास मौकों पर तैयार करते हैं। इसके लिए सात से आठ अलग-अलग प्रकार के अनाजों को अच्छी तरह धोकर और सुखाकर आटा पिसवाया जाता है। इस बहुअनाज आटे में मुख्य रूप से चावल, दाल, गेहूं, चूड़ा, चना और मक्का शामिल रहते हैं। हालांकि परिवार की पसंद और स्वाद के अनुसार अनाजों का अनुपात या चुनाव बदला भी जा सकता है।
स्थानीय गृहिणी अंजू के अनुसार इस रोटी को बनाने की कला सामान्य रोटी से बेहद अलग है। अंजू बताती हैं कि इस तैयार बहुअनाज आटे को सबसे पहले हल्के गर्म पानी की मदद से गूंथा जाता है। इसके बाद लोई बनाते समय हाथों में थोड़ा पानी लगाया जाता है और फिर दोनों हथेलियों के बीच दबाकर तालियां पीट-पीटकर रोटी को धीरे-धीरे फैलाया और बड़ा किया जाता है। पानी के हल्के स्पर्श से आटा हाथों पर चिपकता नहीं है और बिना बेलन के ही रोटी अपने मनचाहे आकार में आ जाती है।
चूल्हे की आंच और परोसने का देसी अंदाज
इस रोटी का असली सोंधापन मिट्टी के पारंपरिक चूल्हे की आंच पर पकाने से ही निकलकर आता है। गांव-देहात के घरों में चूल्हे की धीमी और स्थिर गर्माहट में इसे दोनों तरफ से अच्छी तरह सेका जाता है, जिससे यह अंदर तक पूरी तरह पक जाती है। चूंकि शहरी जीवनशैली में लोग दोनों हथेलियों के बीच आटे को थपथपाकर रोटी बड़ा करने के इस पारंपरिक हुनर से पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं, इसलिए यह कला मुख्य रूप से ग्रामीण रसोइयों तक ही सिमटी दिखाई देती है।
आकार और वजन में यह रोटी इतनी भारी-भरकम होती है कि एक ही रोटी खा लेने के बाद किसी भी व्यक्ति का पेट आसानी से भर जाता है और दूसरी रोटी लेने की नौबत नहीं आती। स्वाद बढ़ाने के लिए इसे नमक, सरसों के तेल, कच्ची हरी मिर्च और कटे हुए प्याज के साथ परोसा जाता है। वहीं कई लोग अपनी रुचि के अनुसार इसे घर के बने तीखे अचार या ताजी पिसी हरी मिर्च की चटनी के साथ खाना पसंद करते हैं। कई अनाजों के पोषक तत्वों से भरपूर होने की वजह से यह सेहत के लिहाज से भी काफी फायदेमंद मानी जाती है।



















