छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाकों में बरसात के मौसम के दौरान एक खास और पारंपरिक देसी हरी सब्जी बनाने का चलन काफी पसंद किया जाता है। आजकल ग्रामीण क्षेत्रों में कोचई पत्ते की मांग और लोकप्रियता काफी बढ़ गई है, जिसे स्थानीय लोग सीधे जंगलों से चुनकर लाते हैं और फिर उन्हें धूप में अच्छी तरह सुखाकर सुरक्षित रख लेते हैं। जंगलों में प्राकृतिक रूप से मिलने वाला यह कोचई पत्ता ग्रामीणों के लिए किसी स्वाद के खजाना से कम नहीं है। इन पत्तों को धूप में सुखाकर लंबे समय तक आसानी से संरक्षित रखा जा सकता है, जिसके कारण ग्रामीण साल के किसी भी मौसम में इसकी स्वादिष्ट सब्जी बनाकर इसका लुत्फ उठा सकते हैं। खानपान की यह प्राचीन परंपरा ग्रामीणों को बाजार की महंगी सब्जियों पर अपनी निर्भरता को काफी हद तक कम करने में मदद करती है।
स्थानीय निवासी सनी माझी ने इस पारंपरिक व्यंजन के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि वर्षा ऋतु के दौरान ग्रामीण जंगलों के भीतर जाकर कोचई के ताजे पत्ते काटते हैं और उन्हें अपने घरों तक लेकर आते हैं। इसके बाद इन पत्तों को धूप में पूरी तरह से सुखाया जाता है। एक बार अच्छी तरह सूख जाने के बाद इन पत्तों को लंबी अवधि तक सुरक्षित रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर साल के अलग-अलग महीनों में इसकी सब्जी तैयार की जाती है।
सनी राम माझी के बताए अनुसार, धूप में पहले से सुखाए गए इन कोचई पत्तों को बाद में सब्जी पकाने के लिए तैयार किया जाता है। इस अनोखी रेसिपी में चावल पकाने के बाद बचा हुआ माड़ यानी पसिया, नमक, मिर्च, तेल और खट्टे टमाटर का इस्तेमाल करके स्वादिष्ट सब्जी बनाई जाती है। स्थानीय ग्रामीणों का ऐसा मानना है कि चावल के बचे हुए पसिया के साथ तैयार होने वाली इस पारंपरिक सब्जी का स्वाद बेहद खास और लाजवाब होता है, जो खाने में बहुत ही स्वादिष्ट लगती है।
सनी राम माझी का यह भी कहना है कि यह कोई आधुनिक या नई रेसिपी नहीं है, बल्कि ग्रामीण अंचलों में यह परंपरा बहुत लंबे समय चली आ रही है। बरसात के दिनों में जंगल से मिलने वाले इन कोचई पत्तों को ग्रामीण अपने घर लाते हैं और इन्हें धूप में सुखाकर आने वाले दिनों के लिए सुरक्षित रख लेते हैं। गांव के लोगों का बचपन इन पारंपरिक स्वादों और व्यंजनों की यादों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
चूंकि कोचई पत्ता पूरी तरह से जंगलों में मुफ्त में मिल जाता है, इसलिए ग्रामीणों को बरसात के इस मौसम में बाजार से हरी सब्जियां खरीदने की कोई खास आवश्यकता नहीं पड़ती है। इन पत्तों को सुखाकर लंबे समय तक इस्तेमाल करने की इस कला के कारण उनकी बाजार पर निर्भरता काफी कम हो जाती है और वे पूरी तरह से अपनी प्राकृतिक संपदा पर निर्भर रहते हैं।



















