मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक निमाड़ अंचल की अपनी एक अनूठी खान-पान परंपरा है, जहां सदियों से चले आ रहे पारंपरिक व्यंजन आधुनिक दौर में भी लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं। बुरहानपुर जिले की समृद्ध रसोई संस्कृति में कई ऐसे पारंपरिक पकवान शामिल हैं, जिनकी सादगी और स्वाद हर किसी को अपनी ओर खींच लेते हैं। इन्हीं में प्रमुख स्थान रखती है गुलगुला मिठाई, जिसे किसी महंगे मेवे या भारी भरकम सामग्री के बिना केवल सामान्य गेहूं के आटे और गुड़ के तालमेल से तैयार किया जाता है। निमाड़ की चौखट से निकला यह ठेठ देसी स्वाद बुरहानपुर की सदियों पुरानी पाक कला का सजीव प्रमाण है, जिसके चलते स्थानीय बाशिंदे इसे आज भी बड़े चाव से अपनी थाली में सजाते हैं।
साधारण घरेलू सामग्रियों से स्वादिष्ट बनाने की विधि
इस पारंपरिक व्यंजन को बनाने के लिए किसी दुर्लभ सामग्री की आवश्यकता नहीं पड़ती है। पकवान बनाने की जानकार फूलाबाई के अनुसार, गुलगुला पकाने के लिए मुख्य रूप से गेहूं का थोड़ा मोटा या जाड़ा आटा, गुड़ और तलने के लिए तेल की जरूरत होती है। इन बेहद मामूली और सहज उपलब्ध सामग्रियों से तैयार होने के बावजूद इसका अंतिम स्वाद लाजवाब होता है। तैयारी की प्रक्रिया में सबसे पहले गुड़ और आटे को उचित मात्रा में मिलाकर एक चिकना घोल या मिश्रण तैयार किया जाता है। इसके पश्चात इस मिश्रण को छोटे-छोटे गोल आकार देकर गर्म तेल में धीमी आंच पर तला जाता है। तेल में अच्छी तरह सिकने के बाद जब गुलगुला बाहर निकलता है, तो इसकी बाहरी परत हल्की कुरकुरी हो जाती है जबकि भीतरी हिस्सा बेहद स्पंजी और मुलायम बना रहता है।
निमाड़ की मेहमाननवाजी और दैनिक संस्कृति का अटूट अंग
बुरहानपुर सहित पूरे निमाड़ क्षेत्र में गुलगुले को मात्र एक सामान्य मिष्ठान्न नहीं, बल्कि लोकजीवन और पारिवारिक आतिथ्य का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। घरों में किसी भी सगे-संबंधी या मेहमान के पधारने पर गृहिणियां तुरंत गुलगुले बनाकर उनका मुंह मीठा कराती हैं। इस मिठाई का संतुलन ऐसा होता है कि घर के बुजुर्गों से लेकर नन्हे बच्चों तक, हर आयु वर्ग के लोग इसे खूब पसंद करते हैं। ग्रामीण परिवेश और पारंपरिक परिवारों में गुलगुले को कई दफा बड़े चावल जैसे स्थानीय पारंपरिक भोजन के साथ पूरक के तौर पर परोसा जाता है, जो इसके स्वाद को दोगुना कर देता है।
सफर के लिए आदर्श और सात दिनों तक सुरक्षित रहने वाला पकवान
गुलगुले की एक सबसे बड़ी व्यावहारिक खूबी इसकी लंबी शेल्फ लाइफ यानी लंबे समय तक खाने योग्य बने रहने की क्षमता है। जब कोई परिवार दूरदराज की यात्रा पर निकलता है, तो रास्ते के भोजन के तौर पर गुलगुले को डिब्बे में भरकर साथ ले जाना बेहद आम बात है। यदि इसे सही विधि से पकाया जाए और नमी से बचाकर सुरक्षित रखा जाए, तो यह लगभग सात दिनों तक बिल्कुल ताजा और स्वादिष्ट बना रहता है। खराब न होने के इसी स्वाभाविक गुण के कारण इसे सफर का सबसे भरोसेमंद साथी माना जाता है। आज बाजार में तरह-तरह के रासायनिक फ्लेवर और आधुनिक मिठाइयों की भरमार है, किंतु बुरहानपुर का गुलगुला न्यूनतम साधनों में संस्कृति और मिठास की पहचान को मजबूती से संजोए हुए है।


















