आज सफर पर निकलने से पहले लोग दुकान से ब्रांडेड वेफर्स और वैक्यूम-पैक बिस्किट उठा लेते हैं, लेकिन उससे बहुत पहले का दौर अलग था। तब यात्रा का खाना घर पर ही, बड़ी सोच-समझकर तैयार होता था। शर्तें साफ थीं — चीज आसानी से ढोई जा सके, उसमें ठीक-ठाक कैलोरी हो, चिलचिलाती गर्मी में भी न सड़े और स्वाद भी अच्छा लगे। इन्हीं मापदंडों पर खरी उतरने वाली चीजें ही बैलगाड़ी, नाव या पुराने जमाने की ट्रेनों के मुसाफिरों का पेट भरती थीं। यहां ऐसे ही छह घरेलू पकवानों की बात है — ये क्या थे, इन्हें क्यों चुना जाता था और परिवार इन्हें कैसे बनाते थे।
खाखरा: सुखाई हुई रोटी जो हफ्तों चलती थी
पश्चिमी भारत की यह पतली और कुरकुरी रोटी दरअसल पकाकर सुखाई गई रोटी ही है, जिसकी सबसे बड़ी खूबी यह कि यह जल्दी खराब नहीं होती। गेहूं के आटे की बेहद पतली लोई बेलकर बिना तेल के तवे पर सेंका जाता है, जिससे खाखरा कुरकुरा हो जाता है। घरों में इसे कपड़े में लपेटकर, हल्का घी लगाकर टिन में भरकर रखा जाता था। इसे लोग सादा भी खाते थे, गुड़ के साथ भी और अचार के साथ भी। हल्का वजन और लंबी शेल्फ लाइफ — इसी जोड़ी ने इसे सफर का आदर्श साथी बना दिया।
ठेकुआ और मीठे लड्डू: मिठास ही था सबसे बड़ा प्रिजर्वेटिव
बिहार का सख्त ठेकुआ, जो गेहूं और गुड़ से बनता है, और बेसन, तिल या नारियल के तरह-तरह के लड्डू — ये सफर की क्लासिक मिठाइयां थीं। इनमें मौजूद चीनी या गुड़ ही असल में इन्हें कई दिनों तक सुरक्षित रखता था, जबकि इनका सूखा और ठोस टेक्सचर इन्हें टूटने-फूटने से बचाता था। घरों में ये पहले से बनाकर पत्ते या कागज में लपेट दिए जाते थे, और नमी कम रखने के लिए घी तथा भूने आटे का इस्तेमाल होता था। फायदा दोहरा था — ये तुरंत ऊर्जा देते थे और त्योहारों पर भी काम आ जाते थे।
सत्तू और भूना चना: प्रोटीन का सबसे पुराना सहारा
भुने चने का आटा यानी सत्तू और साबुत भूना चना या मूंगफली प्रोटीन का बेहद पुराना और सहज स्रोत रहे हैं। सत्तू को आटे के रूप में साथ रखा जाता और जरूरत पड़ने पर पानी या मट्ठे में घोलकर पी लिया जाता था। भूना चना और मूंगफली बिना किसी तैयारी के सीधे खाए जा सकते थे और शरीर को धीरे-धीरे ऊर्जा देते थे। मध्य और पूर्वी भारत के यात्री सत्तू को छोटे मिट्टी के बर्तनों में रखते थे; इसे दही या गुड़ के साथ मिलाने पर एक भरपेट और ठंडक देने वाला भोजन तैयार हो जाता था, जो ताजे दाल-चावल से कहीं ज्यादा टिकाऊ साबित होता था।
मुरमुरा और चिवड़ा: हल्का लेकिन पेट भरने वाला
फूला हुआ चावल यानी मुरमुरा और उसका मसालेदार मिश्रण चिवड़ा हल्के-फुल्के सफरी खाने की सबसे अच्छी मिसाल हैं। दुकानदार और घर दोनों इसे बड़े बैच में बनाते थे और इसमें मूंगफली, भूनी दालें, करी पत्ता और नींबू या नमक मिलाते थे। मुरमुरा हल्का होने के बावजूद पेट भर देता है, इसलिए लंबे सफर में भूख मिटाने के लिए यह बढ़िया विकल्प था। थोड़ी नमी आ भी जाए तो यह जल्दी खराब नहीं होता, और टिन में रखकर इसे बार-बार थोड़ा-थोड़ा निकाला जा सकता था।
अचार और संरक्षित चटनियां: छोटी शीशी, बड़ा कमाल
अचार की एक नन्ही शीशी भी फीके खाने को स्वादिष्ट बना देती थी। तेल, नमक और सिरके या कच्चे आम से बने अचार स्वाद तो देते ही थे, साथ ही प्रिजर्वेटिव का काम भी करते थे। तेल या गाढ़ी चीनी की चाशनी में डूबे फल और सब्जियों के अचार गर्मी और लंबे सफर में भी खराब नहीं होते थे। तीखे और चटपटे होने के कारण ये पुरानी रोटी या चावल का स्वाद तक सुधार देते थे — खासकर तब, जब ताजा गर्म खाना मिलना मुमकिन न हो।
आम पापड़ और धूप में सुखाए फल: मीठा-खट्टा संतुलन
धूप में सुखाया गया आम पापड़ और दूसरे फलों के प्रिजर्व्स फलों को पतली, लचीली शीट में बदल देते थे, जिन्हें सफर में साथ ले जाना बेहद आसान था। इसी तरह धूप में सुखाए केले, आम और अन्य फलों से नमी निकल जाती थी, जिससे वे जल्दी खराब नहीं होते थे और उनका स्वाद भी गाढ़ा हो जाता था। इन्हें अक्सर मोम वाले कागज या केले के पत्ते में लपेटकर सामान के बीच रखा जाता था ताकि ये सूखे रहें। सफर के नमकीन खाने के बीच ये मीठा और खट्टा स्वाद जोड़ने का काम करते थे।













