झारखंड के औद्योगिक शहर जमशेदपुर में दक्षिण भारतीय व्यंजनों के प्रति लोगों की दीवानगी किसी से छिपी नहीं है। सुबह के नाश्ते में इडली और डोसा यहां की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन काशीडीह इलाके में नाश्ता करने का अनुभव पूरी तरह अलग है। काशीडीह गुरुद्वारा के ठीक बगल में स्थित एक छोटी सी दुकान में आज के आधुनिक दौर में भी भोजन पकाने के सबसे पुराने तरीकों को सहेज कर रखा गया है। यहां गैस सिलिंडर या आधुनिक बर्नर के बजाय पारंपरिक मिट्टी के चूल्हे और कोयले की धीमी आंच पर कुरकुरा डोसा सेका जाता है, जिसकी सौंधी खुशबू सुबह से ही राहगीरों को अपनी तरफ खींच लेती है।
सुबह छह बजे से शुरू हो जाती है तैयारी
इस दुकान को चलाने वाले नरसिम्हा राव हर रोज सुबह ठीक 6 बजे अपनी दुकान पर पहुंच जाते हैं। दुकान खोलते ही सबसे पहले मिट्टी के चूल्हे में कोयला सुलगाया जाता है और डोसा बनाने का तवा चढ़ाया जाता है। सुबह की शुरुआत होते ही यहां नाश्ता करने वालों का तांता लगना शुरू हो जाता है। जहां अधिकांश दुकानों और होटलों में समय बचाने के लिए गैस चूल्हों या ऑटोमैटिक तवों का इस्तेमाल होता है, वहीं नरसिम्हा राव का यह पारंपरिक तरीका उनके काम को बाकी सभी से पूरी तरह जुदा बना देता है। भट्टी से उठती सौंधी महक और तवे की छनछनाहट दूर से ही लोगों को आकर्षित करती है, जिसके चलते लोग सुबह की सैर के बाद सीधे यहीं पहुंचते हैं।
कोयले की धीमी आंच और कुरकुरा स्वाद
पारंपरिक तरीके से खाना पकाने के अपने इस हुनर को लेकर नरसिम्हा राव का मानना है कि कोयले की अंगीठी पर बने डोसे का स्वाद गैस पर बने डोसे के मुकाबले कहीं ज्यादा लाजवाब होता है। कोयले की आंच तवे पर एक समान फैलती है, जिससे घोल बेहद सलीके से पकता है और डोसा बाहर से बहुत ज्यादा कुरकुरा बनता है। हालांकि मिट्टी के चूल्हे और कोयले पर पका भोजन अपने आप में सेहत के लिए कोई अतिरिक्त फायदेमंद साबित हो ऐसा आवश्यक नहीं है, फिर भी स्वाद के शौकीनों को यह पारंपरिक देसी अंदाज और इसका खास जायका बेहद पसंद आता है।
सब्जियों से भरपूर आलू का अनोखा मसाला
स्वाद के अलावा इस डोसे की भरावन भी अपने आप में काफी अनूठी है। सामान्य दुकानों पर डोसे के अंदर केवल उबले आलू और हल्के मसालों का मिश्रण दिया जाता है, लेकिन यहां आलू के साथ गाजर और कद्दूकस किया हुआ चुकंदर भी प्रचुर मात्रा में मिलाया जाता है। इन रंग-बिरंगी सब्जियों के चलते भरावन का स्वाद चटपटा और अलग बन जाता है। गर्म और बेहद कुरकुरे डोसे के भीतर इन सब्जियों का यह मेल हर निवाले को खास बना देता है, जिस वजह से इलाके के नियमित ग्राहक सुबह का नाश्ता करने के लिए हमेशा इसी ठिकाने को प्राथमिकता देते हैं।
सखुआ के पत्तों पर परोसने का सादगी भरा अंदाज
इस पारंपरिक नाश्ते की लोकप्रियता की एक और बड़ी वजह इसका बेहद किफायती होना है। नरसिम्हा राव अपनी दुकान पर यह डोसा महज 40 रुपये में उपलब्ध कराते हैं। आधुनिक प्लास्टिक की प्लेटों या कागज के बर्तनों के बजाय इस डोसे को सखुआ के पत्तों पर परोसा जाता है। जंगल की पत्तियों से बनी यह प्राकृतिक पत्तल न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि भोजन के पारंपरिक अनुभव को और भी समृद्ध बना देती है। मिट्टी का चूल्हा, कोयले का धीमा ताप, पौष्टिक सब्जियों वाला मसाला और सखुआ के पत्तों की सादगी मिलकर इस दुकान को जमशेदपुर के खानपान का एक बेहद खास केंद्र बनाते हैं।


















