मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र का पारंपरिक देसी खानपान अपनी सादगी और अनूठे जायके के लिए पहचाना जाता है। खंडवा और इसके नजदीकी गांवों के घरों में पीढ़ियों से कई ऐसे पारंपरिक व्यंजन बनते आ रहे हैं, जो आज भी पारिवारिक आयोजनों और आम दिनों की रसोई का अहम हिस्सा हैं। इन्हीं में से एक बेहद लोकप्रिय डिश निमाड़ की खास दाल ढोकली है। साधारण गेहूं के आटे और रोजमर्रा में बनने वाली दाल के मेल से तैयार होने वाला यह भोजन अपने खास त्रिकोण आकार, बेहद नरम बनावट और विशुद्ध देसी तरीके के कारण जाना जाता है। खंडवा के ग्रामीण अंचल में आज भी लोग इसे बेहद चाव से तैयार करते हैं और पूरे परिवार के साथ मिलकर खाते हैं।
स्थानीय गृहणी स्वीटी पटेल बताती हैं कि दाल ढोकली केवल आम दिनों का भोजन नहीं है, बल्कि होली जैसे बड़े त्योहारों और मांगलिक मौकों पर भी इसे खास तौर पर बनाया जाता है। वैसे जब भी कुछ पारंपरिक और स्वादिष्ट खाने की इच्छा हो, तो इसे किसी भी सामान्य दिन घर की रसोई में तैयार किया जा सकता है। इसे बनाने में थोड़ा धैर्य और समय अवश्य लगता है, लेकिन जब अच्छी तरह पकी हुई नरम ढोकली गरमा-गरम तड़के वाली दाल के साथ मिलती है, तो इसका स्वाद लाजवाब हो जाता है। घर पर इस पारंपरिक निमाड़ी डिश को बेहद आसान तरीके से तैयार किया जा सकता है।
गेहूं के आटे से त्रिकोण ढोकली तैयार करने का तरीका
पारंपरिक दाल ढोकली तैयार करने का पहला चरण आटा गूंथने से शुरू होता है। स्वीटी पटेल के अनुसार, इसके लिए अलग से कोई जटिल तैयारी नहीं करनी होती। गेहूं के आटे को बिल्कुल वैसे ही गूंथा जाता है, जैसे सामान्य रोटियां बनाने के लिए तैयार किया जाता है। आटा तैयार हो जाने के बाद उसकी छोटी-छोटी लोइयां तोड़ी जाती हैं और उन्हें चकले पर सामान्य रोटी की तरह बेल लिया जाता है।
इसके बाद बेली गई रोटी की सतह पर हल्का सा तेल लगाया जाता है। तेल लगाने के बाद रोटी को करीने से मोड़कर त्रिकोण यानी तिकोना आकार दिया जाता है। इस त्रिकोण हिस्से को एक बार फिर हल्के हाथों से बेलकर पतला किया जाता है। ढोकली को दिया जाने वाला यही तिकोना स्वरूप और उसकी तहें इसे बाकी सामान्य व्यंजनों से पूरी तरह अलग बनाती हैं। इसे बेलते वक्त यह सावधानी रखनी जरूरी है कि ढोकली बहुत ज्यादा मोटी न रहे। यदि ढोकली अधिक मोटी रह जाएगी, तो उसे पकने में सामान्य से कहीं ज्यादा वक्त लगेगा और उसके भीतर से कच्ची रह जाने का जोखिम बना रहता है।
कड़ाही या कुकर में ढोकली पकाने के सही नियम
जब सभी त्रिकोण ढोकली बेलकर तैयार हो जाएं, तब उन्हें पकाने की प्रक्रिया शुरू होती है। इस पारंपरिक व्यंजन को पकाने के लिए रसोई में मौजूद कड़ाही या प्रेशर कुकर, दोनों बर्तनों का इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि कड़ाही में बना रहे हैं, तो सबसे पहले उसमें पर्याप्त पानी डालकर अच्छी तरह गर्म करें। पानी में उबाल आने पर उसमें तैयार ढोकली डालें और धीमी आंच पर पकने दें। पकाने के दौरान बीच-बीच में चमचे से चलाते हुए देखते रहना चाहिए कि ढोकली कड़ाही के तले में चिपक तो नहीं रही है और सभी टुकड़े एकसमान रूप से पक रहे हैं या नहीं।
दूसरी ओर, अगर कुकर का उपयोग कर रहे हैं, तो उसमें पर्याप्त मात्रा में पानी रखें और ढोकली को भाप में पकाने के लिए उपयुक्त स्टैंड या जालीदार बर्तन का इस्तेमाल करें। कुकर का इस्तेमाल करते समय यह ध्यान रखना अनिवार्य है कि उसे क्षमता से अधिक न भरा जाए, ताकि भाप का दबाव ठीक से बने और सुरक्षा नियमों का पूरी तरह पालन हो सके। ढोकली को भीतर तक अच्छी तरह पकाना सबसे जरूरी चरण है, ताकि उसकी बनावट पूरी तरह नरम हो जाए। सही तरीके से पकने के बाद ढोकली इतनी कोमल हो जाती है कि उसे दाल के साथ मिलाकर आसानी से खाया जा सकता है।
दाल में देसी तड़का और परोसने का पारंपरिक अंदाज
इस व्यंजन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके लिए किसी विशेष या दुर्लभ दाल की आवश्यकता नहीं पड़ती। स्वीटी पटेल बताती हैं कि घर में रोजमर्रा के भोजन में बनने वाली सामान्य दाल ही इसके लिए पूरी तरह उपयुक्त होती है। जब दाल पूरी तरह पक जाए, तो उसमें देसी स्वाद घोलने के लिए पारंपरिक तड़का तैयार किया जाता है। तड़के के लिए राई, जीरा, हींग, बारीक कटा लहसुन और साबुत या कटी हुई मिर्च का इस्तेमाल किया जाता है। इस छौंक को दाल में मिलाते ही उसकी सुगंध बढ़ जाती है।
तड़के वाली दाल तैयार होने के बाद पकी हुई ढोकली को दाल के साथ थाली में परोसा जाता है। निमाड़ में कई लोग पकी हुई ढोकली को गरमा-गरम दाल के अंदर डालकर कुछ देर तक पकाना पसंद करते हैं। ऐसा करने से ढोकली दाल के सभी मसालों और उसके रस को अपने भीतर पूरी तरह सोख लेती है, जिससे वह और भी ज्यादा मुलायम और रसीली बन जाती है। दाल में ढोकली को मिलाकर खाने से इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। परोसते समय ऊपर से बारीक कटा हरा धनिया डालकर इसकी ताजगी और सजावट को बढ़ाया जा सकता है।
पीढ़ियों पुरानी परंपरा और पोषण से भरा देसी भोजन
निमाड़ के गांवों में दाल ढोकली बनाने का चलन सदियों पुराना है। स्वीटी पटेल का कहना है कि पुराने जमाने में परिवार के बुजुर्ग सदस्य भी इस व्यंजन को बेहद शौक से खाते थे। इसकी खास वजह यह है कि भाप और पानी में पकने के कारण इसकी बनावट बहुत नरम होती है, जिससे इसे चबाना और पचाना बहुत आसान रहता है। हालांकि, बुजुर्गों या बच्चों को परोसने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि ढोकली अंदर तक पूरी तरह पकी हो।
त्योहारों के खास मौकों, विशेषकर होली के पर्व पर इसे बनाने का विशेष उत्साह गांवों में देखा जाता है, लेकिन इसकी पौष्टिकता के चलते इसे सामान्य दिनों के दोपहर या रात के भोजन में भी शामिल किया जा सकता है। इस पारंपरिक व्यंजन की सबसे व्यावहारिक बात यह है कि इसमें प्रयुक्त होने वाली हर सामग्री घर की रसोई में पहले से मौजूद रहती है। गेहूं का साधारण आटा, रोज की दाल और बुनियादी मसाले मिलकर एक ऐसा स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करते हैं, जो स्वाद देने के साथ-साथ परिवार का पेट भी पूरी तरह भरता है।


















