उत्तराखंड के जंगल हर मौसम में कुछ ऐसा देते हैं जो बाजार की दुकानों में मुश्किल से मिलता है। पहाड़ की ढलानों, कटीली झाड़ियों और पुराने पेड़ों पर उगने वाले ये जंगली फल यहां के लोगों के लिए सिर्फ खाने की चीज नहीं हैं, बल्कि बचपन, लोकगीत और परंपरागत दवाओं की पूरी एक दुनिया से जुड़े हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही पांच खास पहाड़ी फलों के बारे में, जिनका स्वाद और सेहत दोनों ही लाजवाब है।
काफल: पहाड़ का शाही फल
इस सूची में सबसे ऊपर आता है काफल, जिसे उत्तराखंड का शाही फल या सबसे लोकप्रिय लोक-फल कहा जा सकता है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगता है कि इस पर बना मशहूर कुमाऊंनी लोकगीत काफल पाको मिल न चाखो आज भी खूब गाया जाता है। यह फल छोटे, गोलाकार और दानेदार गुच्छों में लगता है। कच्चा रहने पर इसका रंग हरा होता है, लेकिन अप्रैल से जून के बीच जब यह पकता है तो इसका रंग गहरा लाल या जामुनी हो जाता है। स्वाद में यह खट्टा-मीठा होता है।
काफल की एक खास दिक्कत इसकी बेहद कम शेल्फ लाइफ है। कहा जाता है कि पेड़ से तोड़ने के कुछ ही घंटों के भीतर इसे खा लेना जरूरी होता है, वरना यह कसैला होने लगता है। यही वजह है कि इसे अक्सर ताजा पिस्यूं लूण यानी पहाड़ी नमक के साथ खाया जाता है। औषधीय गुणों से भरपूर इस जंगली फल में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने के साथ-साथ भूख भी बढ़ाते हैं। इसके पेड़ की छाल का इस्तेमाल पारंपरिक दवाओं में सर्दी, खांसी और गले की तकलीफों के लिए किया जाता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि काफल को गुठली समेत भी खाया जा सकता है और इससे कोई नुकसान नहीं होता। पहाड़ के लोगों के लिए यह महज एक फल नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति की आत्मा है, जो गर्मी शुरू होने के सिर्फ 3 महीनों तक ही उपलब्ध रहता है।
हिसालू: हिमालय की सुनहरी रास्पबेरी
दूसरे नंबर पर है हिसालू, जिसे हिमालयन गोल्डन रास्पबेरी भी कहा जाता है। यह कटीली झाड़ियों में उगता है। इसे गोल्डन बैरी इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह चमकीले पीले या सुनहरे-नारंगी रंग के छोटे-छोटे बैग जैसा दिखता है। यह फल बेहद रसीला और बहुत मीठा होता है, जिसमें हल्की सी खटास भी घुली रहती है। काफल की ही तरह हिसालू को भी बाजार में लंबे समय तक टिकाकर रखना मुश्किल है, इसलिए लोग इसे जंगलों या रास्तों के किनारे लगी झाड़ियों से सीधे तोड़कर ताजा ही खा लेते हैं। खट्टा होने के कारण इसमें विटामिन सी और फाइबर भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। यह पेट की गर्मी शांत करने और कब्ज व एसिडिटी जैसी परेशानियों को दूर करने में मददगार माना जाता है।
किलमोड़ा: जड़ों में छिपी आयुर्वेदिक ताकत
तीसरे स्थान पर है किलमोड़ा, जो देखने में जामुन जैसा लगता है। उत्तराखंड की पहाड़ी ढलानों पर उगने वाली एक कटीली झाड़ी का यह फल दारुहल्दी के नाम से भी जाना जाता है। इसका स्वाद हल्का खट्टा और कसैला-मीठा होता है। आयुर्वेद की नजर से यह बेहद कीमती है। किलमोड़ा अपनी जड़ों और फलों के औषधीय गुणों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसमें बर्बेरिन नामक तत्व पाया जाता है, जो एंटी-डायबिटिक और एंटी-बैक्टीरियल होता है।
इसकी जड़ों का रस आंखों के रोगों में, त्वचा के घावों को भरने में और बीपी को संतुलित रखने में रामबाण माना जाता है। किलमोड़ा की लकड़ी यानी दारुहल्दी के पाउडर को दूध और पानी के साथ लिया जाता है। पेट से जुड़ी किसी भी तरह की बीमारी को ठीक करने में यह बेहद उपयोगी है। आंखों के लिए भी इसे बहुत फायदेमंद माना जाता है, और चर्म रोग व डायबिटीज के मरीजों के लिए भी यह एक अच्छी औषधि साबित होती है।
तिमला: पहाड़ों का पारंपरिक अंजीर
चौथे नंबर पर है तिमला, जिसे पहाड़ों का पारंपरिक अंजीर कहा जा सकता है। यह मध्य-हिमालयी इलाकों में बहुतायत में पाया जाता है और पेड़ के तनों तथा मोटी टहनियों पर गुच्छों में उगता है। पकने पर इसका बाहरी हिस्सा भूरा-बैंगनी और भीतर का हिस्सा गहरा लाल हो जाता है, जबकि स्वाद बहुत मीठा होता है। पके हुए तिमला को सीधे फल के रूप में खाया जाता है, जबकि इसके कच्चे फलों से पहाड़ी सब्जी और चटनी तैयार की जाती है। इतना ही नहीं, पहाड़ों में पारंपरिक रूप से इसके पत्तों का इस्तेमाल पत्तल बनाने में भी किया जाता है।
बेडू: लगभग सालभर मिलने वाला जंगली अंजीर
पांचवें नंबर पर है बेडू, जो उत्तराखंड का एक और किस्म का जंगली अंजीर है। काफल की तरह यह भी खासा मशहूर है और इस पर भी लोकगीत बेडू पाको बारो मासा बना हुआ है। जैसा कि इस लोकगीत में कहा गया है, बेडू पहाड़ों में लगभग सालभर देखने को मिल जाता है। पकने पर यह काला-बैंगनी हो जाता है और बेहद मीठा होता है। पारंपरिक रूप से इसे फेफड़ों और मूत्राशय से जुड़ी समस्याओं में बेहद फायदेमंद माना जाता है।













