अगर टेक इंडस्ट्री सचमुच वह ‘क्वांटम छलांग’ लगा भी ले, तो भी आपको जेब में रखने वाला क्वांटम कंप्यूटर नहीं मिलने वाला — किसी ‘iPhone Q’ के लिए पैसे जोड़ना शुरू मत कीजिए। असल बात यह है कि क्वांटम कंप्यूटर आम कंप्यूटरों की जगह नहीं लेंगे। कई विशेषज्ञ इसे एक खास तरह की चिप के रूप में देखते हैं — एक ऐसा हिस्सा जो किसी सामान्य सुपरकंप्यूटर के भीतर बैठेगा और जिस तक पहुंच क्लाउड के ज़रिए होगी। जिन समस्याओं के लिए ऐसे खास एल्गोरिदम बने हैं जहां क्वांटम गणना फायदेमंद है, वहीं यह सिस्टम अपनी क्वांटम एक्सेलरेटर चिप का इस्तेमाल करेगा। इसी तेज़ी के दम पर क्वांटम कंप्यूटर विज्ञान और तकनीक के कई क्षेत्रों को आगे बढ़ा सकते हैं — इलेक्ट्रिक कारों के लिए ज़्यादा देर चलने वाली बैटरी से लेकर नए मेडिकल इलाज तक।
सपने हकीकत कब बनेंगे?
इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों से यह पूछना न तो उपयोगी है और न ही शिष्ट कि ये सपने जैसे इस्तेमाल आखिर कब असली होंगे। पक्की बात सिर्फ इतनी है कि वे अभी कई साल दूर हैं। शोधकर्ता अब तक प्रोटोटाइप क्वांटम हार्डवेयर से कोई व्यावहारिक काम नहीं करा पाए हैं। हां, उन्होंने ऐसे प्रोटोटाइप ज़रूर दिखाए हैं जो एक व्यावसायिक रूप से बेकार गणित की पहेली को सबसे आधुनिक सुपरकंप्यूटर से भी तेज़ हल कर सकते हैं।
फिर भी, क्वांटम भौतिकी से चलने वाले ये ताकतवर — और टेक कंपनियों के लिए मुनाफ़ा बढ़ाने वाले — कंप्यूटर हाल के दिनों में पहले से कहीं कम काल्पनिक लगने लगे हैं।
अचानक इतना शोर क्यों
इसकी वजह यह है कि Google, IBM और दूसरी कंपनियों ने तय कर लिया है कि अब इस तकनीक में जमकर पैसा लगाने का समय आ गया है। नतीजा यह हुआ कि क्वांटम कंप्यूटिंग ने वित्त से लेकर एयरोस्पेस तक की बड़ी कंपनियों की रणनीति वाली प्रेज़ेंटेशनों में जगह बना ली है — जैसे फाइनेंस में JPMorgan और एयरोस्पेस में Airbus। Pitchbook के आंकड़ों के मुताबिक 2022 में वेंचर कैपिटलिस्टों ने दुनिया भर में क्वांटम कंप्यूटिंग का हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर बना रही कंपनियों में रिकॉर्ड 1.8 अरब डॉलर लगाए। यह 2019 में लगाई गई रकम का लगभग पांच गुना है।
जैसा कि क्वांटम कंप्यूटिंग के पीछे का उलझाने वाला गणित है, वैसे ही इस अब तक अव्यावहारिक तकनीक को लेकर बनी कुछ उम्मीदें भी सिर चकरा देने वाली हैं। आज सैन फ्रांसिस्को की ओर उड़ान भरते हुए खिड़की से झांकें तो सिलिकॉन वैली पर क्वांटम के प्रचार की एक धुंध सी तैरती दिख सकती है। लेकिन इस तकनीक की विशाल संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, और इसे साधने के लिए ज़रूरी हार्डवेयर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। अगर क्वांटम कंप्यूटिंग को समझने का कोई सही वक्त है, तो वह अभी है।
क्वांटम कंप्यूटिंग का इतिहास
क्वांटम कंप्यूटिंग की पृष्ठभूमि बीसवीं सदी की शुरुआत में बनती है, जब भौतिकविदों को लगने लगा था कि हकीकत पर उनकी पकड़ छूट रही है। पहले-पहल, उप-परमाणविक (subatomic) दुनिया की मानी-समझी व्याख्याएं अधूरी निकलीं। मसलन, इलेक्ट्रॉन और दूसरे कण न्यूटन के बिलियर्ड गेंदों की तरह करीने से इधर-उधर नहीं टकराते थे — कभी-कभी वे तरंग (wave) की तरह बर्ताव करते थे। ऐसी अजीबोगरीब बातों को समझाने के लिए क्वांटम यांत्रिकी (quantum mechanics) सामने आई, पर इसने अपने ही परेशान करने वाले सवाल खड़े कर दिए।
सिर्फ एक उदाहरण लें: इस नए गणित का मतलब था कि उप-परमाणविक दुनिया के भौतिक गुण, जैसे किसी इलेक्ट्रॉन की स्थिति, देखे जाने से पहले महज़ संभावनाओं के रूप में मौजूद रहते हैं। जब तक आप किसी इलेक्ट्रॉन की जगह नापते नहीं, वह न यहां होता है न वहां — बल्कि हर जगह होने की कोई न कोई संभावना होती है। इसे हवा में उछले सिक्के की तरह समझिए: ज़मीन पर गिरने से पहले सिक्का न चित होता है न पट, बल्कि दोनों होने की एक-एक संभावना लिए रहता है।
अगर यह बात आपको उलझा रही है, तो आप अच्छी संगत में हैं। क्वांटम सिद्धांत में अपने योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने से एक साल पहले, Caltech के रिचर्ड फाइनमैन (Richard Feynman) ने कहा था कि “क्वांटम यांत्रिकी को कोई नहीं समझता।” हम दुनिया को जिस तरह महसूस करते हैं, यह बात उससे मेल ही नहीं खाती। फिर भी कुछ लोगों ने इसे इतना समझ लिया कि उन्होंने ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ ही नई कर दी। और 1980 के दशक में इनमें से कुछ लोग — फाइनमैन समेत — यह सोचने लगे कि क्या उप-परमाणविक कणों के इस संभावनात्मक अस्तित्व जैसी क्वांटम परिघटनाओं का इस्तेमाल जानकारी को प्रोसेस करने में किया जा सकता है। 80 और 90 के दशक में जो बुनियादी सिद्धांत या खाका बना, वही आज भी Google और इस तकनीक पर काम कर रही दूसरी कंपनियों की राह दिखाता है।
पहले आम कंप्यूटर को समझें
क्वांटम कंप्यूटिंग की गहराई में उतरने से पहले अपने आम कंप्यूटरों की समझ ताज़ा कर लेना ज़रूरी है। जैसा आप जानते हैं, स्मार्टवॉच, iPhones और दुनिया का सबसे तेज़ सुपरकंप्यूटर — सब मूल रूप से एक ही काम करते हैं: वे जानकारी को डिजिटल बिट्स यानी 0 और 1 के रूप में दर्ज करके गणना करते हैं। मसलन, कोई कंप्यूटर किसी सर्किट में वोल्टेज को चालू-बंद करके 1 और 0 दिखा सकता है।
क्वांटम कंप्यूटर भी गणना के लिए बिट्स ही इस्तेमाल करते हैं — आखिर हम चाहते हैं कि वे हमारे मौजूदा डेटा और कंप्यूटरों से जुड़ सकें। लेकिन क्वांटम बिट्स, यानी क्यूबिट्स (qubits), में कुछ ऐसी अनोखी और ताकतवर खूबियां होती हैं जो उनके एक समूह को उतने ही आम बिट्स से कहीं ज़्यादा कर गुज़रने की ताकत देती हैं।
सुपरपोज़िशन का जादू
क्यूबिट्स कई तरीकों से बनाए जा सकते हैं, पर ये सभी किसी ऐसी चीज़ के क्वांटम गुणों का इस्तेमाल कर 0 और 1 दिखाते हैं जिसे बिजली से नियंत्रित किया जा सके। इसके मशहूर उदाहरण — कम से कम बहुत चुनिंदा लोगों के बीच — हैं सुपरकंडक्टिंग सर्किट, या विद्युत-चुंबकीय क्षेत्रों के भीतर तैराए गए अकेले परमाणु। क्वांटम कंप्यूटिंग की जादुई ताकत यह है कि इस व्यवस्था में क्यूबिट्स सिर्फ 0 और 1 के बीच पलटने भर तक सीमित नहीं रहते। सही ढंग से बरतें तो वे एक रहस्यमयी अतिरिक्त अवस्था में जा सकते हैं, जिसे सुपरपोज़िशन (superposition) कहते हैं।
आपने शायद सुना होगा कि सुपरपोज़िशन में मौजूद क्यूबिट एक ही वक्त में 0 भी होता है और 1 भी। यह बात पूरी तरह सही भी नहीं है और पूरी तरह गलत भी नहीं। सुपरपोज़िशन में क्यूबिट के 1 या 0 होने की कोई संभावना होती है, पर वह इनमें से किसी एक अवस्था को नहीं दर्शाता — ठीक वैसे ही जैसे हवा में उछला सिक्का न चित है न पट, बल्कि दोनों की एक-एक संभावना लिए हुए है। समझने वाली अहम बात बस इतनी है कि सुपरपोज़िशन का गणित यह बताता है कि क्यूबिट को पढ़े जाने पर उसमें 0 मिलने या 1 मिलने की संभावना कितनी है। क्यूबिट का मान पढ़ने की क्रिया उसे संभावनाओं के मिश्रण से खींचकर एक साफ़, तय अवस्था में ला पटकती है — ठीक वैसे ही जैसे सिक्का मेज़ पर गिरकर किसी एक ओर ऊपर हो जाता है।
एक क्वांटम कंप्यूटर सुपरपोज़िशन में मौजूद क्यूबिट्स के समूह का इस्तेमाल कर किसी गणना के अलग-अलग संभावित रास्तों को आज़मा सकता है। अगर सब सही तरह से हो, तो गलत रास्तों की ओर इशारा करने वाले संकेत आपस में कट जाते हैं और जब क्यूबिट्स को 0 और 1 के रूप में पढ़ा जाता है तो सही जवाब बचा रह जाता है।
कुछ ऐसी समस्याओं के लिए जिनमें आम कंप्यूटरों को बहुत समय लगता है, यही खूबी क्वांटम कंप्यूटर को कहीं कम कदमों में हल तक पहुंचा देती है। मशहूर क्वांटम सर्च एल्गोरिदम ‘ग्रोवर्स एल्गोरिदम’ (Grover’s algorithm) 10 करोड़ नामों वाली टेलीफोन डायरेक्ट्री में आपको महज़ 10,000 ऑपरेशनों में ढूंढ सकता है। अगर कोई पारंपरिक सर्च एल्गोरिदम एक-एक नाम छानता जाए, तो उसे औसतन 5 करोड़ ऑपरेशन लगेंगे। ग्रोवर्स और कुछ अन्य क्वांटम एल्गोरिदम के मामले में शुरुआती समस्या — या डायरेक्ट्री — जितनी बड़ी होगी, आम कंप्यूटर उतना ही पीछे छूटता जाएगा।
फिर अब तक काम का क्वांटम कंप्यूटर क्यों नहीं
आज हमारे पास काम का क्वांटम कंप्यूटर इसलिए नहीं है क्योंकि क्यूबिट्स बेहद नाज़ुक होते हैं। जिन क्वांटम प्रभावों को इन्हें संभालना होता है वे बहुत ही कोमल होते हैं, और इधर-उधर की ज़रा सी गर्मी या शोर 0 और 1 को पलट सकता है या किसी ज़रूरी सुपरपोज़िशन को मिटा सकता है। इसलिए क्यूबिट्स को सावधानी से ढककर रखना पड़ता है और बहुत ठंडे तापमान पर चलाना पड़ता है — कभी-कभी तो परम शून्य (absolute zero) से महज़ डिग्री के अंशभर ऊपर।
शोध का एक बड़ा क्षेत्र ऐसे एल्गोरिदम बनाने का है जिनसे क्वांटम कंप्यूटर खराब क्यूबिट्स से होने वाली अपनी गलतियां खुद सुधार सके। अब तक इन्हें लागू करना मुश्किल रहा है, क्योंकि ये क्वांटम प्रोसेसर की इतनी ताकत खा जाते हैं कि असली समस्याएं हल करने के लिए कुछ खास या कुछ भी नहीं बचता। कुछ शोधकर्ता, खासकर Microsoft में, इस चुनौती को किनारे से निकालना चाहते हैं — वे इलेक्ट्रॉनों के समूहों से एक खास किस्म का क्यूबिट बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे टोपोलॉजिकल क्यूबिट कहते हैं। भौतिकविदों का अनुमान है कि टोपोलॉजिकल क्यूबिट पर्यावरण के शोर के सामने ज़्यादा मज़बूत और इसलिए कम गलती करने वाले होंगे, पर अब तक वे एक भी बना पाने में जूझ रहे हैं। 2018 में एक हार्डवेयर उपलब्धि की घोषणा के बाद, Microsoft के शोधकर्ताओं ने 2021 में अपना काम वापस ले लिया, जब दूसरे वैज्ञानिकों ने उसमें प्रयोग की गलतियां पकड़ीं।
‘क्वांटम एडवांटेज’ की दौड़
फिर भी कंपनियों ने अपनी सीमित मशीनों से उम्मीद जगाने वाली क्षमता दिखाई है। 2019 में Google ने एक 53-क्यूबिट क्वांटम कंप्यूटर का इस्तेमाल कर एक खास गणितीय पैटर्न वाले नंबर किसी सुपरकंप्यूटर से तेज़ी से बनाकर दिखाए। इस प्रदर्शन ने तथाकथित ‘क्वांटम एडवांटेज’ प्रयोगों की एक कड़ी शुरू कर दी — 2020 में चीन के एक अकादमिक समूह ने अपना प्रदर्शन घोषित किया और 2022 में कनाडाई स्टार्टअप Xanadu ने अपना। (लंबे समय तक इन्हें ‘क्वांटम सुप्रीमेसी’ प्रयोग कहा जाता रहा, पर ‘व्हाइट सुप्रीमेसी’ की गूंज से बचने के लिए कई शोधकर्ताओं ने नाम बदलना बेहतर समझा।) शोधकर्ता हर क्वांटम एडवांटेज के दावे को बेहतर क्लासिकल एल्गोरिदम बनाकर चुनौती देते रहे हैं, जिनसे आम कंप्यूटर वही समस्याएं और तेज़ी से हल कर पाएं — और इस होड़ में क्वांटम और क्लासिकल, दोनों ही कंप्यूटिंग आगे बढ़ती हैं।
इसी बीच शोधकर्ताओं ने चंद क्यूबिट्स की मदद से छोटे अणुओं का सफल सिमुलेशन भी किया है। ये सिमुलेशन अभी ऐसा कुछ नहीं कर पाते जो क्लासिकल कंप्यूटरों की पहुंच से बाहर हो, पर बड़े पैमाने पर किए जाएं तो शायद कर सकें — और इससे नए रसायनों और पदार्थों की खोज में मदद मिल सकती है। हालांकि इनमें से कोई भी प्रदर्शन अभी सीधे-सीधे व्यावसायिक मूल्य नहीं देता, फिर भी इन्होंने क्वांटम कंप्यूटिंग को लेकर भरोसा और निवेश बढ़ाया है। 30 साल तक कंप्यूटर वैज्ञानिकों को ललचाते रहने के बाद, व्यावहारिक क्वांटम कंप्यूटिंग भले बिल्कुल पास न आई हो, पर पहले से कहीं ज़्यादा करीब महसूस होने लगी है।
आगे क्या होगा: NISQ युग
गलतियां करने वाले, पर एक खास तौर पर चुने गए काम में सुपरकंप्यूटरों से बेहतर — क्वांटम कंप्यूटर अब अपनी किशोरावस्था में पहुंच चुके हैं। यह बेढब दौर कितना लंबा चलेगा, साफ़ नहीं है, और इंसान की किशोरावस्था की तरह कभी-कभी लगता है कि यह कभी खत्म ही नहीं होगा। इस क्षेत्र के शोधकर्ता आज की तकनीक को मोटे तौर पर ‘नॉइज़ी इंटरमीडिएट-स्केल क्वांटम’ (Noisy Intermediate-Scale Quantum) कंप्यूटर कहते हैं, यानी यह क्षेत्र NISQ युग में है (इसे ‘निस्क’ बोला जाता है)। मौजूदा क्वांटम कंप्यूटर इतने छोटे और भरोसे लायक नहीं हैं कि वे इस क्षेत्र के सपनों वाले एल्गोरिदम चला सकें — जैसे संख्याओं के गुणनखंड निकालने वाला शोर्स एल्गोरिदम (Shor’s algorithm)।
सवाल यह बना हुआ है कि क्या शोधकर्ता अपनी इन कच्ची, किशोर NISQ मशीनों से कुछ काम का करा पाएंगे। सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों की टीमें इस पर दांव लगा रही हैं। Google, IBM, Intel और Microsoft — सभी ने इस तकनीक पर काम कर रही अपनी टीमें बड़ी की हैं, और Xanadu व QuEra जैसे स्टार्टअप का एक बढ़ता झुंड उनके पीछे लगा है। अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ — हरेक के पास क्वांटम शोध को बढ़ावा देने के लिए अरबों डॉलर वाले नए कार्यक्रम हैं। Rigetti और IonQ जैसे कुछ स्टार्टअप तो किसी ‘स्पेशल-पर्पज़ एक्विज़िशन कंपनी’ यानी SPAC में विलय करके शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध भी हो चुके हैं — यह जल्दी नकदी पाने का एक तरीका है। उसके बाद से उनकी कीमतें गिर चुकी हैं, कुछ मामलों में तो टेक कंपनियों में दिखी आम महामारी-गिरावट से कहीं ज़्यादा। यह अब भी साफ़ नहीं है कि क्वांटम कंप्यूटिंग के पहले ‘किलर ऐप’ कौन से होंगे या कब आएंगे। पर एक अहसास ज़रूर है कि जो भी कंपनी इन मशीनों को सबसे पहले काम का बना देगी, उसे बड़े आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा फायदे मिलेंगे।
पहला व्यावहारिक इस्तेमाल: रसायन विज्ञान
इन प्रोटोटाइप मशीनों का पहला व्यावहारिक उपयोग शायद रसायन विज्ञान के सिमुलेशन हों, क्योंकि शोधकर्ता यह तरीका खोज रहे हैं कि उनके क्यूबिट्स किसी अणु में इलेक्ट्रॉनों की तरह आपस में बर्ताव करें। नई दवाओं या पदार्थों की तलाश में अणुओं और परमाणुओं के कंप्यूटर मॉडल बेहद ज़रूरी हैं। मगर आम कंप्यूटर रासायनिक प्रतिक्रियाओं के दौरान परमाणुओं और इलेक्ट्रॉनों का बर्ताव सटीक ढंग से नहीं नकल कर पाते। क्यों? क्योंकि यह बर्ताव क्वांटम यांत्रिकी से चलता है, जिसकी पूरी जटिलता आम मशीनों के बस की बात नहीं। Daimler और Volkswagen, दोनों ने इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी का रसायन सुधारने के एक तरीके के रूप में क्वांटम कंप्यूटिंग की पड़ताल शुरू कर दी है। Microsoft का कहना है कि इसके दूसरे उपयोगों में नए कैटलिस्ट तैयार करना शामिल हो सकता है, जिनसे औद्योगिक प्रक्रियाएं कम ऊर्जा खर्च करें, या यहां तक कि वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड खींचकर जलवायु परिवर्तन का असर कम करना भी।
एन्क्रिप्शन और AI पर असर
क्रिप्टोग्राफी के शोधकर्ता भी क्वांटम कंप्यूटरों की कोड तोड़ने की क्षमता के लिए तैयारी शुरू कर चुके हैं। 90 के दशक से हमें पता है कि ये उस गणित को आसानी से चीर सकते हैं जिस पर ऑनलाइन बैंकिंग, बातचीत और खरीदारी को सुरक्षित रखने वाला एन्क्रिप्शन टिका है। ऐसा करने के लिए क्वांटम प्रोसेसरों को कहीं ज़्यादा उन्नत होना होगा, पर सरकारें और कंपनियां पहले से तैयार रहना चाहती हैं। अमेरिका का National Institute of Standards and Technology इस वक्त नई एन्क्रिप्शन प्रणालियों का मूल्यांकन कर रहा है, जिन्हें इंटरनेट को क्वांटम-प्रूफ बनाने के लिए लागू किया जा सके।
Google जैसी टेक कंपनियां यह दांव भी लगा रही हैं कि क्वांटम कंप्यूटर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को और ताकतवर बना सकते हैं। यह रसायन या कोड-ब्रेकिंग वाले उपयोगों से कहीं दूर भविष्य की बात है और उतनी साफ़ भी नहीं, पर शोधकर्ताओं का तर्क है कि बड़े क्वांटम प्रोसेसरों के साथ प्रयोग करते-करते वे इसके ब्योरे आगे चलकर समझ लेंगे। एक उम्मीद यह है कि क्वांटम कंप्यूटर मशीन-लर्निंग एल्गोरिदम को इतनी मदद दे सकें कि वे जटिल काम सीखने के लिए लाखों उदाहरणों की बजाय कहीं कम उदाहरणों से काम चला लें, जबकि आज के AI सिस्टम को सिखाने में आम तौर पर लाखों उदाहरण लगते हैं।
प्रोग्रामर, छात्र और बाकी सब के लिए
यह तय न होने के बावजूद कि क्वांटम कंप्यूटिंग का युग सचमुच कब शुरू होगा, बड़ी टेक कंपनियों का तर्क है कि प्रोग्रामरों को अभी से तैयार हो जाना चाहिए। Google, IBM और Microsoft — सभी ने ओपन-सोर्स टूल जारी किए हैं ताकि कोडर क्वांटम हार्डवेयर के लिए प्रोग्राम लिखने से वाकिफ हो सकें। IBM अपने कुछ क्वांटम प्रोसेसरों तक ऑनलाइन पहुंच भी देता है, ताकि कोई भी उन पर प्रयोग कर सके। लंबी दौड़ में बड़ी कंप्यूटिंग कंपनियां खुद को इस तरह कमाई करते देखती हैं कि वे कंपनियों से बेहद ठंडे रखे गए क्वांटम प्रोसेसरों से भरे डेटा सेंटरों तक पहुंच के बदले शुल्क लेंगी। 2019 में शुरू हुई Amazon Web Services एक ऐसी सेवा देती है जो उपयोगकर्ताओं को क्लाउड के ज़रिए स्टार्टअप के बनाए, अलग-अलग किस्म के क्यूबिट्स वाले क्वांटम कंप्यूटरों से जोड़ती है।
सरकारें और विश्वविद्यालय भी क्वांटम-साक्षर कार्यबल तैयार करने में जुटे हैं। 2020 में अमेरिकी सरकार ने क्वांटम कंप्यूटिंग से जुड़ा एक K-12 पाठ्यक्रम तैयार करने की पहल शुरू की (इसका नाम है Q-12)। उसी साल ऑस्ट्रेलिया की University of New South Wales ने दुनिया की पहली क्वांटम इंजीनियरिंग की बैचलर डिग्री शुरू की। बाकी हम सबके लिए इसमें क्या है? कुछ साफ़ नुकसानों के बावजूद, आम कंप्यूटरों के दौर ने ज़िंदगी को ज़्यादा सुरक्षित, समृद्ध और सुविधाजनक बनाने में मदद की है — हममें से ज़्यादातर लोग किसी बिल्ली के बच्चे के वीडियो से कभी पांच सेकंड से ज़्यादा दूर नहीं होते। क्वांटम कंप्यूटरों के युग के भी इसी तरह दूरगामी, फायदेमंद और पहले से अंदाज़ा न लगने वाले नतीजे होने चाहिए।
क्वांटम कंप्यूटिंग के और मोर्चे
इन कंप्यूटरों के संभावित उपयोगों की बात शुरू करने से पहले हमें इनके पीछे की बुनियादी भौतिकी समझनी होती है — और यही इसे समझाना इतना कठिन बनाता है। आज की डिवाइसें ज़रा सी पर्यावरणीय दखलंदाज़ी से भी पटरी से उतर सकती हैं; Algorithmiq जैसी कंपनी इस शोर का तोड़ निकालने और क्वांटम की ताकत साधने के तरीके बना रही है। उधर भौतिकविदों की एक टीम ने तीन फोटॉनों को काफी दूरी तक ‘एंटैंगल’ (entangle) करके दिखाया है, जिससे और ताकतवर क्वांटम क्रिप्टोग्राफी की राह खुल सकती है।
नौकरियों के मोर्चे पर भी हलचल है: कोई नई इंडस्ट्री बिना उसमें काम करने वाले लोगों के नहीं बन सकती। National Quantum Initiative नाम का एक कांग्रेस-विधेयक चाहता है कि अमेरिकी सरकार अगली पीढ़ी के क्वांटम कंप्यूटर तकनीशियनों, डिज़ाइनरों और उद्यमियों को तैयार करने में निवेश करे। दिलचस्प यह भी है कि Google की मूल कंपनी Alphabet के पास एक दूसरी, गुपचुप क्वांटम कंप्यूटिंग टीम भी है — X नाम की इकाई में काम करने वाला यह समूह सॉफ्टवेयर पर काम करता है, जिसका वह सार्वजनिक रूप से ज़िक्र नहीं करता। और एक और संभावना: क्वांटम कंप्यूटर शुद्ध, सत्यापन-योग्य यादृच्छिकता (randomness) पैदा करने वाले बन सकते हैं — एन्क्रिप्शन के लिए जो बेहद ज़रूरी है पर आसानी से मिलती नहीं। कुल मिलाकर, यह इन मशीनों को काम करने लायक बनाने की एक ऊंचे दांव वाली दौड़ है, जो कामयाब हुई तो ब्रह्मांड के कुछ सबसे बुनियादी रहस्य सुलझा सकती है और वित्त से लेकर एन्क्रिप्शन तक सब कुछ उलट-पुलट कर सकती है।













