बहुत से लोग अक्सर काम, पढ़ाई या फिर मजबूरी में पूरी रात जागते हैं। हालांकि एक समय आता है जब शरीर जवाब देने लगता है और दिमाग ठीक से काम करना बंद कर देता है। कई बार लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर बिना सोए रहना कब तक संभव है? इसका जवाब काफी जटिल है क्योंकि शरीर अपनी सुरक्षा के लिए अजीब तरीके अपनाता है।
इतिहास में दर्ज रिकॉर्ड
साल 1963 में रैंडी गार्डनर ने एक विज्ञान प्रोजेक्ट के तहत सबसे लंबे समय तक जागने का एक प्रसिद्ध रिकॉर्ड बनाया था। उन्होंने करीब 264 घंटे यानी 11 दिनों तक नींद नहीं ली थी। उस समय 17 साल के रैंडी गार्डनर के साथ विलियम डमेंट और जॉन रॉस जैसे विशेषज्ञों ने भी काम किया था। प्रयोग खत्म होने के बाद उन्होंने 14 घंटे तक लगातार नींद ली थी।
बाद के वर्षों में इस रिकॉर्ड को कई बार चुनौती दी गई। साल 1986 में स्टंटमैन रॉबर्ट मैकडोनाल्ड ने करीब 19 दिनों तक बिना सोए रहने का दावा किया था। इसके बाद से यह सिलसिला थमता हुआ नजर आया। साल 1997 में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने स्पष्ट कर दिया कि वे अब नींद त्यागने वाले इन रिकॉर्ड्स को मान्यता नहीं देंगे। उनके अनुसार, इसे प्रमोट करने से लोगों की जान को खतरा हो सकता है क्योंकि चरम अभाव के दुष्परिणाम बेहद खतरनाक होते हैं।
पुराने रिकॉर्ड्स की बात करें तो पीटर ट्रिप नामक डीजे का नाम भी अक्सर आता है। उन्होंने 1950 के दशक में जागने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में सामने आया कि उन पर रितालिन जैसी दवाओं का असर था, जो उन्हें जगाए रखने के लिए दी गई थीं। इससे साबित होता है कि मतिभ्रम (hallucinations) केवल बिना सोए रहने से ही नहीं, बल्कि बाहरी रसायनों के कारण भी हो सकते हैं।
शरीर पर पड़ने वाला गंभीर असर
लंबे समय तक जागने वाले लोगों ने अक्सर जी मिचलाने और चिड़चिड़ेपन की शिकायत की है। रैंडी गार्डनर के अनुभव को देखने वाले वैज्ञानिकों ने नोट किया था कि चौथे दिन के आसपास उनका ध्यान भटकने लगा था और उन्हें अजीब चीजें महसूस होने लगी थीं। वहीं 1974 के रिकॉर्ड धारी रोजर गाय इंग्लिश ने भी मतिभ्रम की समस्या का जिक्र किया था, जिसका असर प्रयोग समाप्त होने के बाद भी कुछ समय तक रहा।
दूसरी ओर, मॉरीन वेस्टन ने भी जागने के दौरान भ्रम का अनुभव किया था, हालांकि अच्छी नींद मिलने के बाद वे पूरी तरह सामान्य हो गईं। स्टेटपर्ल्स (StatPearls) की एक गाइड के अनुसार, दीर्घकालिक नींद का अभाव मृत्यु दर को बढ़ा सकता है और जीवन की गुणवत्ता को पूरी तरह बिगाड़ सकता है। इसमें यह भी कहा गया है कि अपर्याप्त नींद से चोट लगने और दुर्घटनाओं की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
सैन्य दृष्टिकोण और कार्यक्षमता
अमेरिकी रक्षा विभाग ने नींद की कमी के प्रभाव को बेहतर समझने के लिए विस्तृत नियम बनाए हैं। वे 24 घंटे जागने को पूरी तरह से नींद की कमी मानते हैं। उनके अनुसार, हर 24 घंटे की पूर्ण जागृति के साथ व्यक्ति की मानसिक क्षमता में 25 से 35 प्रतिशत तक गिरावट आ जाती है। सैन्य रिपोर्ट का मानना है कि इंसान अचानक बंद नहीं होता, बल्कि उसका दिमाग धीरे-धीरे अपनी कार्यकुशलता खोने लगता है।
लंबे समय तक नींद न लेने से भावनात्मक थकावट बढ़ती है और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी स्थितियां जैसे चिंता या तनाव गंभीर हो जाते हैं। सेना ने सलाह दी है कि जवानों को हर 24 घंटे में कम से कम 8 घंटे की नींद दी जानी चाहिए। यदि ऐसा करना संभव न हो, तो पहले से 'बैंक' की गई नींद या बाद में 'रिकवरी' स्लीप का सहारा लेना ही इकलौता सुरक्षित विकल्प है।
इंसोमनिया और सूक्ष्म नींद
जब आप प्राकृतिक रूप से नहीं सो पाते, तो इसे क्लीनिकल इंसोमनिया कहा जाता है। इसके कारणों की सही जांच कराना बहुत जरूरी है। कई बार लोग दावा करते हैं कि वे बिल्कुल नहीं सोए, लेकिन नींद के वैज्ञानिक अध्ययन (sleep studies) से पता चलता है कि वे असल में छोटी-छोटी झपकियां ले रहे थे, जिन्हें 'माइक्रोस्लीप' कहा जाता है।
रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (CDC) के अनुसार, अत्यधिक थका हुआ व्यक्ति अनजाने में ही सूक्ष्म नींद का शिकार हो जाता है और उसे खुद भी पता नहीं चलता कि वह कब सो गया। यदि आप नींद न आने से परेशान हैं, तो घड़ी देखने के बजाय खुद को आराम देने की कोशिश करें। विशेषज्ञों का सुझाव है कि तनावमुक्त होना नींद में सुधार का सबसे अच्छा तरीका है, लेकिन अगर समस्या बनी रहे तो चिकित्सक से परामर्श करना अनिवार्य है।




















