नशे की लत किसी भी हंसते-खेलते परिवार को तिनके की तरह बिखेर देती है। जो व्यक्ति एक बार इस दलदल में कदम रख देता है, उसके लिए वापस लौटना बेहद कठिन हो जाता है। हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित अटाली गांव के निवासी कर्मवीर की दास्तान भी कुछ ऐसी ही अंधेरी राहों से शुरू होकर उजालों तक पहुंची है। कर्मवीर पांच भाई थे और विडंबना यह थी कि पांचों ही गंभीर व्यसन की चपेट में फंस चुके थे। अत्यधिक नशे की वजह से उनके एक भाई की असमय जान चली गई थी। उस वक्त कर्मवीर हरियाणा रोडवेज में ड्राइवर के पद पर कार्यरत थे। साल 2001 में उनके जीवन में एक ऐसी घटना घटी, जिसने उनके जीने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया। एक मंदिर में जाकर उन्होंने अचानक शराब और नशे को सदा के लिए अलविदा कहने की प्रतिज्ञा ली और फिर वही कर्मवीर समाज के लिए प्रेरणा बन गए।
संकट से भरा पारिवारिक अतीत और आत्ममंथन
कर्मवीर के जीवन का शुरुआती दौर भारी उथल-पुथल से भरा हुआ था। उनके आसपास दोस्त, रिश्तेदार और खुद के भाई नशे की दलदल में गहरे धंसे थे। परिवार के सदस्यों को आर्थिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ती थी, साथ ही समाज में आए दिन अपमानित होना पड़ता था। कर्मवीर खुद नशे में चूर रहते थे, जिसके कारण उनका अपना परिवार भी गंभीर संकट से गुजर रहा था। कई मर्तबा वे सड़क हादसों में बाल-बाल बचे थे। बार-बार जान जोखिम में पड़ने के बाद उनके मन में यह विचार कौंधा कि जिस बुराई ने उनके पूरे घर-परिवार को तहस-नहस किया है, अब उसी बुराई को जड़ से खत्म करने का वक्त आ गया है।
इसी अंतर्द्वंद्व के बीच उन्होंने फैसला किया कि वे लोगों को व्यसन से मुक्त कराएंगे। उनका संकल्प था कि वे एक ऐसा नशा मुक्ति केंद्र शुरू करेंगे, जहां किसी से एक पैसा फीस नहीं ली जाएगी और न ही किसी तरह की दवा का इस्तेमाल होगा। उन्होंने इस सामाजिक सुधार अभियान की नींव अपने गांव के मंदिरों से रखी। चूंकि वे हरियाणा रोडवेज में सरकारी चालक थे, इसलिए उन्होंने अपने कार्यस्थल और सरकारी बसों को भी जागरूकता का जरिया बना लिया। वे बस चलाने के दौरान और यात्रियों से मिलते वक्त भी लोगों को नशे के जानलेवा दुष्प्रभावों के बारे में सचेत करते रहते थे।
15 अगस्त 2001 की वह रात जिसने बदली राह
कर्मवीर के जीवन में बदलाव की ऐतिहासिक तारीख 15 अगस्त 2001 थी। उस समय उनकी उम्र 38 साल थी। वे रातभर सरकारी बस चलाने की ड्यूटी करके लौटे थे और दिन में उन्होंने बहुत ज्यादा शराब पी ली थी। अत्यधिक शराब पीने के बाद अचानक उन्हें भीतर से यह अहसास हुआ कि अगर उन्होंने अब भी खुद को नहीं रोका, तो आगे सिर्फ मौत खड़ी है। उसी नाजुक घड़ी में वे लाल दास बाबा के मंदिर पहुंचे। मंदिर में जाकर उन्होंने पूरी श्रद्धा से शीश नवाया और मन ही मन प्रार्थना की कि बाबा पहले उनका अपना नशा छुड़वा दें, उसके बाद वे बाकी लोगों को भी इस बुराई से उबारने के लिए जीवन समर्पित कर देंगे।
उस दौर में उनके घर के हालात बेहद दर्दनाक थे। पांचों भाइयों के नशे में रहने की वजह से तीन भाइयों का मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका था। उनका एक भाई बहुत अच्छा गायक था और पूरे क्षेत्र में अपने गायन के लिए मशहूर था, मगर दुर्भाग्यवश वह भी नशे की गिरफ्त में फंस चुका था। कर्मवीर ने जब खुद नशा छोड़ दिया, तो वे लोगों को समझाने लगे कि बीड़ी, सिगरेट और तंबाकू के सेवन से कैंसर जैसी असाध्य बीमारियां जन्म लेती हैं। उनकी भावनात्मक बातचीत का ऐसा असर होता था कि लोग रास्ते में ही अपनी जेब से बीड़ी के बंडल निकालकर उनके हाथ में थमा देते थे और भविष्य में कभी नशा न करने का वचन देते थे। कर्मवीर साल 2021 में हरियाणा रोडवेज की सेवा से सेवानिवृत्त हुए।
मां की स्मृति, ईश्वर से पुकार और भाइयों की वापसी
नशे के भारी प्रकोप के चलते उनके एक भाई की मृत्यु हो गई थी। इस दुखद हादसे ने कर्मवीर को झकझोर कर रख दिया। उनकी मां रामवती का देहांत पहले ही हो चुका था। कर्मवीर के मन में लगातार यह कचोट रहती थी कि समाज उनकी दिवंगत मां के बारे में क्या कहेगा कि उनके पांच बेटे हुए और पांचों ही नशे की भेंट चढ़ गए। इस गहरे दर्द के बीच उन्होंने ऊपरवाले से गुहार लगाई कि हे भगवान, कम से कम पांच में से किसी एक बेटे को तो बचा लो ताकि मां का नाम कलंकित होने से बच जाए।
ईश्वर ने उनकी पुकार सुनी और उनके तीन भाइयों ने कर्मवीर की सीख को आत्मसात कर लिया। आज जीवित चारों भाई पूरी तरह से नशा मुक्त होकर सम्मानित जीवन जी रहे हैं। जिस गांव के मंदिर परिसर में पहले लोग नशा करके डेरा डाले रहते थे, कर्मवीर की लगातार कोशिशों से आज वही परिसर पूरी तरह व्यसनमुक्त हो चुका है। पिछले 25 वर्षों में उन्होंने हजारों व्यक्तियों को नशे की दलदल से बाहर निकालने में सफलता पाई है। उन्होंने नशा मुक्ति पर पुस्तकें भी लिखी हैं और आज भी वे स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक चौराहों पर जाकर युवाओं को जागरूक करते हैं।
65 वर्ष की आयु में भी निरंतर जारी है मुहिम
वर्तमान में कर्मवीर 65 वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन उनका सेवा भाव पहले जैसा ही अटूट है। वे मानते हैं कि नशे के प्रसार में बुरी संगत की सबसे बड़ी भूमिका होती है। व्यक्ति जिस तरह के माहौल और संगति में समय बिताता है, उसका प्रत्यक्ष असर उसके चरित्र और दिनचर्या पर पड़ता है। उन्होंने अपने जीवन में नशे की विभीषिका को बहुत करीब से महसूस किया है। उन्होंने अपने पूरे कुनबे को बिखरते देखा और पड़ोसियों को उजड़ते देखा। इसी दर्द ने उन्हें यह मिशन सौंपा है कि जिस विपत्ति ने उनके अपने घर को उजाड़ा, वह किसी अन्य निर्दोष परिवार की खुशियां न छीन सके।























