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राजस्थान के इस अनूठे मंदिर में होती है भगवान की खंडित मूर्ति की पूजा, सपने में आकर प्रभु ने खुद विसर्जन को रोका थाराजस्थान
17 सित॰ 2026, 2:40 pm (4 घंटे पहले)· 0

राजस्थान के इस अनूठे मंदिर में होती है भगवान की खंडित मूर्ति की पूजा, सपने में आकर प्रभु ने खुद विसर्जन को रोका था

राजस्थान के नागौर में स्थित एक हजार साल पुराने गोपीनाथ मंदिर में खंडित मूर्ति की पूजा की जाती है, जिसका इतिहास कोलकाता के दक्षिणेश्वर मंदिर की पावन परंपरा से मेल खाता है।

राजस्थान के नागौर जिले में स्थित एक हजार साल पुराना गोपीनाथ मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं के कारण देश भर में श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। सामान्यतः हिंदू धर्म में किसी भी खंडित मूर्ति की पूजा करना वर्जित माना जाता है और उसे तुरंत विसर्जित कर दिया जाता है, लेकिन नागौर के भगतावाड़ी में स्थित इस मंदिर की कहानी बिल्कुल अलग है। यहाँ सदियों से भगवान गोपीनाथ की एक खंडित प्रतिमा स्थापित है, जिसकी रोज पूरी श्रद्धा और नियम-कानून के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। यह पूरे राजस्थान में अपनी तरह का इकलौता मंदिर है जहाँ इस नियम का उल्लंघन न मानकर इसे भक्ति का एक अनूठा स्वरूप स्वीकार किया गया है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु भगवान को किसी कठोर नियम-कायदे से बांधने के बजाय उनके साथ एक जीवंत और पारिवारिक रिश्ता महसूस करते हैं।

भगवान के एक अलौकिक सपने ने बदल दिया फैसला

इस अनूठी परंपरा के शुरू होने की पीछे एक बेहद रोचक और चमत्कारी कहानी जुड़ी है। इस मंदिर में सेवा करने वाले चौथी पीढ़ी के मुख्य पुजारी कमल जी पिछले चालीस वर्षों से यहाँ भगवान की सेवा कर रहे हैं। उनके अनुसार, कई दशक पहले मंदिर में स्थापित भगवान गोपीनाथ की मूर्ति का अंगूठा किसी कारणवश खंडित हो गया था। इस घटना के बाद स्थानीय परंपरा के अनुसार एक समृद्ध व्यापारी ने मंदिर में नई राधा-कृष्ण की मूर्तियां स्थापित करने का निर्णय लिया ताकि खंडित हो चुकी पुरानी मूर्ति को विसर्जित किया जा सके। वह नई प्रतिमाएं लेकर मंदिर आ भी गया था, लेकिन उसी रात उसके साथ एक चमत्कार हुआ। रात को भगवान गोपीनाथ उस व्यापारी के सपने में आए और बड़े ही सरल और वात्सल्य भाव से बोले कि मैं तो बाहर खेलने गया था और खेलते समय अंगूठे में थोड़ी सी चोट लग गई, तो इसमें क्या बड़ी बात हो गई? इस अद्भुत और अलौकिक सपने को देखने के बाद व्यापारी और मंदिर के प्रबंधन ने पुरानी प्रतिमा को हटाने का अपना इरादा पूरी तरह बदल दिया। तभी से उस खंडित प्रतिमा को गर्भगृह में उसी रूप में रखकर पूजने का सिलसिला लगातार जारी है। यह कहानी आज भी स्थानीय लोगों की जुबां पर बनी हुई है और इसे सुनकर दूर-दूर से लोग इस दिव्य स्थान के दर्शन करने खिंचे चले आते हैं।

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कोलकाता के दक्षिणेश्वर मंदिर जैसी पावन सोच

नागौर के इस मंदिर की यह अनूठी प्रथा कोलकाता के विश्व प्रसिद्ध दक्षिणेश्वर काली मंदिर की एक ऐतिहासिक घटना की याद दिलाती है। दक्षिणेश्वर के राधा-गोविंद मंदिर में भी एक बार श्रीकृष्ण की मूर्ति नीचे गिर गई थी जिससे उनका एक पैर टूट गया था। उस समय के बड़े-बड़े पंडितों और शास्त्रियों ने मूर्ति को अपवित्र मानकर गंगा नदी में विसर्जित करने की सलाह दी थी। लेकिन जब यह बात स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास पहुँची, तो उन्होंने एक बहुत ही गहरी और मर्मस्पर्शी बात कही थी। उन्होंने पूछा था कि यदि हमारे परिवार का कोई सदस्य किसी दुर्घटना में घायल या अपंग हो जाए, तो क्या हम उसे घर से निकाल देते हैं या उसका इलाज कराकर उसे अपने साथ रखते हैं? इसी गहरे वात्सल्य और भक्ति भाव को नागौर के श्रद्धालुओं ने भी अपने जीवन में उतारा है। वे भगवान को केवल एक मूर्ति नहीं बल्कि अपने परिवार का एक अभिन्न सदस्य मानते हैं। यही वजह है कि मंदिर में आने वाले श्रद्धालु नई और पुरानी दोनों ही प्रतिमाओं के सामने समान रूप से सिर झुकाते हैं और दोनों के प्रति उनकी आस्था अटूट बनी हुई है। नागौर का यह मंदिर हमें सिखाता है कि जब भक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर होती है, तो वहाँ कोई बाहरी भौतिक कमियाँ मायने नहीं रखतीं, केवल हृदय का शुद्ध भाव ही सर्वोपरि हो जाता है।

विशेष त्योहारों पर उमड़ता है आस्था का सैलाब

नागौर के इस ऐतिहासिक और पौराणिक गोपीनाथ मंदिर में वर्ष भर कई बड़े धार्मिक आयोजनों का आयोजन होता रहता है। यहाँ का सबसे मुख्य और भव्य त्योहार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है, जिसके दौरान मंदिर परिसर को विशेष रोशनी और फूलों से सजाया जाता है। इसके अलावा रामनवमी, हरियाली अमावस्या और सावन के पावन महीने में यहाँ विशेष रौनक देखने को मिलती है। सावन के महीने में मंदिर में भव्य झूलोत्सव का आयोजन होता है, जिसमें भगवान गोपीनाथ और राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को एक बेहद खूबसूरत झूले में विराजित कर उनका मनमोहक श्रृंगार किया जाता है। इन उत्सवों में भाग लेने के लिए न केवल नागौर बल्कि राजस्थान के विभिन्न जिलों और पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यह मंदिर किसी भी प्रकार के रूढ़िवादी बंधनों से ऊपर उठकर भगवान और भक्त के बीच के शुद्ध प्रेम और आत्मीयता का एक जीवंत उदाहरण पेश करता है। यहाँ आने वाला हर एक व्यक्ति भक्ति के इस अनोखे रूप को देखकर भाव-विभोर हो जाता है और अपने साथ एक अनूठा आध्यात्मिक अनुभव लेकर घर लौटता है।

सवाल-जवाब

गोपीनाथ मंदिर कहाँ स्थित है?
यह मंदिर राजस्थान के नागौर शहर के भगतावाड़ी क्षेत्र में स्थित है।
इस 1000 साल पुराने मंदिर की क्या विशेषता है?
यह मंदिर इसलिए बेहद अनोखा है क्योंकि यहाँ भगवान गोपीनाथ की एक खंडित मूर्ति की नियमित रूप से पूजा की जाती है।
खंडित मूर्ति को मंदिर से विसर्जित क्यों नहीं किया गया?
एक व्यापारी जब नई मूर्तियां लाया था, तब भगवान गोपीनाथ ने उसके सपने में आकर कहा था कि खेलते समय उनके अंगूठे में थोड़ी चोट लग गई थी, इसलिए उन्हें न हटाया जाए।
इस मंदिर की परंपरा का कोलकाता के दक्षिणेश्वर मंदिर से क्या संबंध है?
दक्षिणेश्वर में स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने भी एक खंडित मूर्ति का विसर्जन यह कहते हुए रोका था कि हम अपने घायल परिवार के सदस्य को घर से बाहर नहीं फेंकते।
इस ऐतिहासिक मंदिर में कौन-से मुख्य त्योहार मनाए जाते हैं?
यहाँ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, हरियाली अमावस्या और सावन के महीने में सुंदर झूलोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

यह रिपोर्ट धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के मनोवैज्ञानिक पहलू को अच्छे से सामने लाती है। यद्यपि यह बीट सीधे तौर पर अपराध से जुड़ी नहीं है, फिर भी ऐसी अनूठी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आस्थाएँ स्थानीय सामुदायिक सौहार्द, जनभावना और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। इस तरह के मामलों में जनमानस की संवेदनशीलता प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर कानून-व्यवस्था को सहज बनाए रखने में सहायक होती है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

करण जी की बात से आगे बढ़ते हुए, ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव से यह स्पष्ट दिखता है कि ऐसे सांस्कृतिक आख्यान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को मजबूती प्रदान करते हैं। नीतिगत और प्रशासनिक दृष्टिकोण से, जब समाज नियमों की कट्टरता के बजाय वात्सल्य और मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देता है, तो क्षेत्रीय स्तर पर धार्मिक या सामाजिक तनाव की आशंकाएं स्वतः कम हो जाती हैं। शासन-प्रशासन के लिए भी ऐसी जनभावनाओं को समझना आवश्यक है, क्योंकि ये स्थानीय स्तर पर बिना किसी बाह्य दबाव के सामुदायिक सौहार्द और सांस्कृतिक धरोहर के स्वतःस्फूर्त संरक्षण की मिसाल पेश करती हैं।

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