बढ़ती उम्र के साथ शरीर में कई तरह के शारीरिक और जैविक बदलाव देखने को मिलते हैं, लेकिन सही दिनचर्या अपनाकर बुढ़ापे में भी पूरी तरह फिट और ऊर्जावान बना रहा जा सकता है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के तुलसीसागर क्षेत्र के मूल निवासी और वर्तमान में जर्मनी में शोध कर रहे वैज्ञानिक डॉ. पीयूष गुप्ता का स्पष्ट कहना है कि सेहतमंद लंबी उम्र हासिल करने के लिए किसी जादुई नुस्खे या शॉर्टकट की तलाश करना व्यर्थ है। लंबे समय तक सेहतमंद और चुस्त बने रहने की बुनियाद व्यक्ति की रोजमर्रा की जीवनशैली, पौष्टिक भोजन, शारीरिक सक्रियता, सुकून भरी नींद और मजबूत मानसिक स्वास्थ्य के संतुलित तालमेल पर टिकी होती है। उम्र बढ़ने की वैज्ञानिक प्रक्रिया और शरीर की आंतरिक कार्यप्रणाली को गहराई से समझने के बाद उन्होंने दीर्घायु और निरोगी जीवन के व्यावहारिक पहलुओं पर अपने विचार विस्तार से रखे हैं।
युवाओं में समय से पहले बीमारियों का बढ़ता खतरा
डॉ. पीयूष गुप्ता ने चिंता जताते हुए रेखांकित किया कि भारत की लगभग 40 से 50 फीसदी युवा आबादी आने वाले कुछ दशकों में बड़ी तेजी से बुजुर्ग आबादी का रूप ले लेगी। आज के समय में जिस तरह बहुत कम उम्र में युवाओं के भीतर डायबिटीज और दिल के दौरे जैसी गंभीर बीमारियों के मामले सामने आ रहे हैं, वह बेहद चिंताजनक स्थिति है। पहले जो समस्याएं बुढ़ापे का लक्षण मानी जाती थीं, वे अब शुरुआती उम्र में ही लोगों को अपनी चपेट में ले रही हैं। युवाओं में कम उम्र में ही तेजी से पनपती इन घातक बीमारियों को देखकर ही उनके मन में उम्र बढ़ने की प्रक्रिया यानी एजिंग रिसर्च के क्षेत्र में काम करने और इसके मूल कारणों की पड़ताल करने की गहरी रुचि पैदा हुई। उनका कहना है कि अगर समय रहते सचेत कदम न उठाए गए, तो भविष्य में यह स्थिति देश के स्वास्थ्य तंत्र पर बहुत बड़ा दबाव बना सकती है।
मानसिक तनाव को पहचानना और समय रहते संभालना
आधुनिक दौर की तेज रफ्तार जिंदगी में काम का भारी दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियां और वित्तीय उलझनें लोगों के मानसिक तनाव को लगातार बढ़ा रही हैं। डॉ. पीयूष के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति लगातार लंबे समय तक मानसिक तनाव की गिरफ्त में रहता है, तो उसका दुष्प्रभाव केवल उसके मस्तिष्क तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा शारीरिक तंत्र उससे प्रभावित होने लगता है। शरीर को लंबे समय तक बीमारियों से मुक्त रखने के लिए जरूरी है कि तनाव के शुरुआती संकेतों को पहचाना जाए और उसका समय पर प्रबंधन किया जाए। तनाव को सामान्य मानकर नजरअंदाज करने के बजाय उसके कारणों को समझना और दैनिक जीवन में स्ट्रेस मैनेजमेंट के उपाय अपनाना बेहद उपयोगी साबित होता है।
नींद के घंटों से ज्यादा अहम है उसकी गुणवत्ता
पर्याप्त नींद को लेकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण साझा करते हुए डॉ. पीयूष ने बताया कि सिर्फ बिस्तर पर सात से आठ घंटे का समय बिताना ही अच्छी सेहत की गारंटी नहीं है। नींद की अवधि से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसकी गुणवत्ता होती है। जब इंसान सोता है, तब शरीर की कोशिकाएं अपनी मरम्मत करती हैं और मस्तिष्क को वास्तविक विश्राम मिलता है। यदि कोई व्यक्ति लगातार विचारों में उलझकर, अत्यधिक चिंता या मानसिक दबाव में सोता है, तो आठ घंटे सोने के बाद भी सुबह उठने पर उसका शरीर थका हुआ और दिमाग भारी महसूस करेगा। इसलिए केवल नींद के घंटे गिनने के स्थान पर इस बात पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए कि नींद बिना किसी विघ्न और पूरी तरह सुकून भरी रही हो।
सक्रिय दिनचर्या और नियमित शारीरिक हलचल
स्वस्थ जीवनशैली और लंबी उम्र के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि को अनिवार्य माना गया है। डॉ. पीयूष के अनुसार, शरीर को निरंतर सक्रिय बनाए रखने से मांसपेशियों की मजबूती और आंतरिक फिटनेस बरकरार रहती है। इसके लिए किसी भारी-भरकम कसरत की अनिवार्यता नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति अपनी आयु और शारीरिक क्षमता के अनुसार प्रतिदिन पैदल चलना, सामान्य व्यायाम या वर्कआउट अपनी दिनचर्या में जोड़ सकता है। लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने, आलस्य और निष्क्रियता की आदत को त्यागकर शरीर को गतिशील बनाए रखना स्वस्थ जीवन की पहली शर्त है।
संतुलित आहार और पोषक तत्वों की सही मात्रा
उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर शरीर की पोषण संबंधी जरूरतें बदलती हैं, इसलिए खान-पान पर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। दैनिक आहार में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन और अन्य आवश्यक पोषक तत्व शामिल होने चाहिए ताकि शरीर के ऊतकों की उचित देखरेख हो सके। डॉ. पीयूष ने अत्यधिक तले-भुने पकवानों और डिब्बाबंद प्रोसेस्ड फूड के नियमित सेवन से पूरी तरह बचने की सलाह दी है। किसी एक कथित सुपरफूड पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने के बजाय ऐसी संतुलित थाली तैयार करनी चाहिए, जिससे शरीर को हर तरह के जरूरी विटामिन्स, मिनरल्स और ऊर्जा मिल सके।
योग और ध्यान से मानसिक स्थिरता
शारीरिक तंदुरुस्ती के साथ-साथ मानसिक शांति का ध्यान रखना भी बेहद आवश्यक है। डॉ. पीयूष ने माइंडफुलनेस, योग और ध्यान की दैनिक गतिविधियों को जीवन में शामिल करने पर जोर दिया है। जब व्यक्ति अपने विचारों को नियंत्रित करना और वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करना सीखता है, तो मानसिक स्तर पर आने वाला ठहराव सीधे तौर पर संपूर्ण शारीरिक स्वास्थ्य को फायदा पहुंचाता है। नियमित ध्यान करने से मन शांत रहता है और जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिया विकसित होता है।
दीर्घायु से ज्यादा महत्वपूर्ण है स्वस्थ जीवन के वर्ष
एजिंग और रिवर्स एजिंग पर आधारित अपने शोध के पीछे के मुख्य उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए डॉ. पीयूष ने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कोई इंसान कितने साल तक जिंदा रहता है। असली महत्व इस बात का है कि वह अपनी कुल उम्र के कितने साल पूरी तरह स्वस्थ, ऊर्जावान और आत्मनिर्भर रहकर व्यतीत करता है। इसी दृष्टिकोण के साथ उन्होंने बढ़ती उम्र के जैविक बदलावों को समझने और लोगों को बुढ़ापे में भी एक सक्रिय व आनंदमय जीवन जीने के व्यावहारिक तरीके उपलब्ध कराने की दिशा में अपने वैज्ञानिक अनुसंधान को आगे बढ़ाया है।

















