शीत ऋतु की औपचारिक शुरुआत से ठीक पहले उत्तर भारत के वातावरण में धुंध और जहरीले कणों का जमावड़ा शुरू हो गया है। सितंबर के ताजे पर्यावरणीय मूल्यांकन से सामने आया है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की तुलना में पड़ोसी राज्य हरियाणा में वायु प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। देश भर के 10 सबसे खराब हवा वाले शहरों में आधे अकेले हरियाणा से हैं, जिससे यह साफ होता है कि क्षेत्रीय हवा की गुणवत्ता ठंड के आगमन से पहले ही तेजी से बिगड़ने लगी है।
राष्ट्रीय राजधानी में राहत, पड़ोसी इलाकों में बढ़ा संकट
सितंबर के दौरान दिल्ली की आबोहवा में कुछ सुधार देखा गया। राजधानी में पीएम 2.5 का मासिक औसत स्तर 38 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। यह आंकड़ा भारत के राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों द्वारा निर्धारित 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की तय सीमा से काफी नीचे और सुरक्षित दायरे में रहा। हालांकि, मानसून की विदाई और मौसम में आ रहे बदलाव के बीच दिल्ली के निकटवर्ती मैदानी इलाकों में हालात बिल्कुल उलट रहे, जहां सूक्ष्म प्रदूषकों का घनत्व लगातार बढ़ता गया।
हरियाणा के पांच औद्योगिक व शहरी केंद्र सबसे ज्यादा प्रभावित
देश के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों की फेहरिस्त में हरियाणा का पानीपत पहले स्थान पर दर्ज हुआ। पानीपत में पीएम 2.5 की मासिक औसत सांद्रता 78 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गई। महीने के 29 दिनों में से 20 दिन ऐसे रहे जब वहां प्रदूषण का स्तर राष्ट्रीय दैनिक सीमा से अधिक रहा, और कई दिनों तक वायु गुणवत्ता सूचकांक खराब तथा बहुत खराब श्रेणी में दर्ज किया गया। शीर्ष 10 सबसे प्रदूषित केंद्रों में हरियाणा के कुल पांच शहर शामिल रहे, जिनमें पानीपत के अलावा जींद, यमुनानगर, गुरुग्राम और मानेसर के नाम दर्ज हैं।
उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों की स्थिति
इस सूची में उत्तर प्रदेश के भी दो प्रमुख इलाके शामिल रहे, जिनमें खोड़ा और गोरखपुर का नाम दर्ज हुआ। इनके अतिरिक्त पंजाब, मध्यप्रदेश और असम के शहर भी देश के शीर्ष 10 सबसे प्रदूषित स्थानों की श्रेणी में पहुंचे। सतत परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों के आंकड़ों के मुताबिक, देश के 251 शहरों में से 230 शहरों में पीएम 2.5 की सघनता विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सुरक्षित दैनिक सीमा से अधिक पाई गई।
सूक्ष्म कणों का जोखिम और आगामी चुनौतियां
पीएम 2.5 हवा में तैरने वाले ऐसे अत्यंत बारीक ठोस कणों और तरल बूंदों का मिश्रण है, जिनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या उससे भी कम होता है। सांस के जरिए ये कण फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं। आमतौर पर सर्दियों के महीनों में पूरे दिल्ली एनसीआर और उत्तर भारत के मैदानी भागों में मौसमी दशाओं और खेतों में पराली जलाए जाने के कारण धुएं की मोटी चादर छा जाती है। वार्षिक रुझानों को देखते हुए, शुरुआती पतझड़ में ही इस तरह के आंकड़े सामने आना आने वाले हफ्तों के लिए गंभीर पर्यावरणीय चेतावनी की ओर इशारा करते हैं।



















