शीत ऋतु के आगमन के साथ ही पशुपालकों के सामने अपने मवेशियों को ठंड और मौसमी बीमारियों से सुरक्षित रखने की गंभीर चुनौती खड़ी हो जाती है। विशेष रूप से बकरियों के मामले में अत्यधिक ठंड, बर्फीली हवाएं, बारिश का पानी या गीला फर्श बेहद घातक सिद्ध हो सकता है। उचित सुरक्षा प्रबंध न होने पर बकरियां तेजी से संक्रमण की चपेट में आ जाती हैं और स्थिति बिगड़ने पर उनकी जान भी जा सकती है। इसी विषय पर कृषि विज्ञान केंद्र, बोकारो की पशुपालन वैज्ञानिक डॉ. सुषमा ने पशुपालकों के लिए विस्तार से जरूरी परामर्श जारी किए हैं।
बोकारो में बकरी पालन और मौसमी चुनौतियां
बोकारो क्षेत्र में पशुपालक व्यापक स्तर पर ब्लैक बंगाल नस्ल के साथ-साथ विभिन्न देसी नस्ल की बकरियों का पालन करते हैं। ये नस्लें आजीविका का बड़ा साधन हैं, लेकिन शीत ऋतु के दौरान इनकी आवास व्यवस्था और देखभाल में थोड़ी सी भी चूक भारी पड़ सकती है। यदि बकरियां अचानक बारिश में भीग जाएं, पानी के संपर्क में आ जाएं या फिर कई दिनों तक नम सतह पर बैठी रहें, तो उनकी शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है। इसका सबसे सीधा असर श्वसन तंत्र पर पड़ता है और उन्हें निमोनिया घेर लेता है। सही समय पर उपचार और बचाव न मिलने पर यह बीमारी जानलेवा बन जाती है।
गीले बिछावन से बढ़ता है संक्रमण का जोखिम
पशु बाड़े की स्वच्छता बकरियों के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ी होती है। बकरियों की यह सामान्य प्रवृत्ति होती है कि वे जिस जगह खड़ी या बैठी होती हैं, वहीं पर गोबर और पेशाब करती हैं। यदि बाड़े की रोजाना सफाई न की जाए, तो वे उसी गीले, मलमूत्र से सने फर्श पर बैठने को विवश हो जाती हैं। नम और गंदा बिछावन कई तरह के बैक्टीरिया और वायरस के पनपने का केंद्र बन जाता है, जिससे संक्रमण बहुत तेजी से फैलता है। यही नमी बकरियों के फेफड़ों को जकड़कर उन्हें निमोनिया और अन्य श्वसन विकारों की ओर धकेलती है।
निमोनिया के प्रमुख लक्षण और तुरंत कदम
बकरियों में निमोनिया के लक्षण उभरते ही पशुपालकों को अत्यधिक सतर्क हो जाना चाहिए। इस बीमारी से पीड़ित बकरी में तेज बुखार, अत्यधिक सुस्ती, लगातार नाक बहना, गंभीर खांसी और नाक से गाढ़ा बलगम निकलने जैसे स्पष्ट संकेत दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में घरेलू उपायों में समय व्यतीत करने के बजाय तत्काल नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क कर विधिवत इलाज शुरू करवाना चाहिए, ताकि पशु को असमय मृत्यु से बचाया जा सके।
नहलाने से परहेज और भीगने पर तत्काल देखभाल
सर्दियों के पूरे मौसम में बकरियों को बेवजह नहलाने से पूरी तरह बचना चाहिए। इस मौसम में पानी से नहलाना उनके शरीर का तापमान अचानक गिरा देता है। यदि किसी मजबूरी, बारिश या दुर्घटना के कारण बकरी भीग भी जाती है, तो उसे कभी भी खुले आंगन या ठंडी हवा के सीधे संपर्क में न छोड़ें। भीगते ही उसे फौरन सूखे व साफ तौलिए या मोटे सूती कपड़े से अच्छी तरह पोंछकर सुखाएं। इसके तुरंत बाद उसे धूप वाली, सूखी और ठंडी हवा से सुरक्षित जगह पर ले जाकर रखें।
बांस का मचान: नमी से बचाव का कारगर तरीका
डॉ. सुषमा ने गीलेपन और सर्द हवाओं से बकरियों की सुरक्षा के लिए बांस का मचान तैयार करने का व्यावहारिक समाधान सुझाया है। इस मचान को जमीन की सतह से लगभग एक से डेढ़ फीट की ऊंचाई पर तैयार किया जा सकता है। बकरियां इस ऊंचे ढांचे पर आसानी से चढ़ और उतर सकें, इसके लिए बांस की छोटी सीढ़ी की व्यवस्था की जानी चाहिए।
इस बांस के मचान का प्रमुख लाभ यह होता है कि बकरियां जमीन की सीलन से ऊपर बिल्कुल सूखी जगह पर बैठती हैं। जब वे मलमूत्र करती हैं, तो बांस की संरचना के छिद्रों से गोबर और पेशाब सीधे नीचे जमीन पर गिर जाता है। इससे बकरियों का शरीर गंदे और भीगे बिछावन के सीधे संपर्क में नहीं आता, जिससे बाड़े में नमी और ठंडक का असर काफी कम हो जाता है।
छोटे मेमनों के लिए रात के समय विशेष व्यवस्था
वयस्क बकरियों की तुलना में छोटे मेमनों को ठंड का असर बहुत तेजी से होता है। रात के समय तापमान में भारी गिरावट और चलने वाली बर्फीली हवाओं से बचाने के लिए मेमनों के बैठने की जगह पर सूखा पुआल बिछाना चाहिए। अत्यधिक ठंड होने पर उन्हें बांस की बड़ी टोकरी जैसी वस्तुओं से सुरक्षित ढंग से ढका भी जा सकता है। हालांकि, ढंकते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है कि टोकरी में शुद्ध हवा के आवागमन यानी वेंटिलेशन की पर्याप्त जगह खुली रहे, ताकि मेमनों का दम न घुटे।





















