औद्योगिक इकाइयों और गगनचुंबी इमारतों से घिरे फरीदाबाद के बीचों-बीच सूरजकुंड क्षेत्र में एक ऐसा निर्माण मौजूद है जो आधुनिक शहरी जीवन की आपाधापी से बिल्कुल अलग अहसास कराता है। मिट्टी, तराशे गए पत्थरों और प्राकृतिक लकड़ी के मेल से खड़ा किया गया यह ढांचा पहली नजर में किसी शांत पर्वतीय अंचल की बसावट जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है। सीमेंट और कंक्रीट से पटे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के माहौल में विशुद्ध पारंपरिक देसी निर्माण सामग्री से तैयार यह आवास आजकल बड़ी संख्या में लोगों को अपनी बनावट से आकर्षित कर रहा है।
सीमेंट और कंक्रीट के दौर में पुरानी निर्माण शैली की वापसी
मौजूदा दौर में जब आवास निर्माण का दायरा पूरी तरह सीमेंट, बजरी और लोहे की छड़ों तक सिमट चुका है, तब यह आवास पुरखों की जीवनशैली और पारंपरिक भारतीय वास्तुकला की याद दिलाता है। पूर्वजों के समय में रिहायशी ठिकाने बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर सुलभ मिट्टी, धूप में पकाई गई ईंटों, पत्थर और लकड़ी की बल्लियों का उपयोग आम बात थी। इस भवन में मिट्टी की मोटी दीवारें खड़ी की गई हैं, जो प्राकृतिक रोधक का काम करती हैं और तेज गर्मी के मौसम में भी अंदरूनी हिस्से में ठंडक बनाए रखती हैं। आज के यांत्रिक युग में जब कृत्रिम ठंडक पर निर्भरता बढ़ चुकी है, यह निर्माण पर्यावरण के अनुकूल प्राचीन तकनीक का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है।
वास्तुविदों की सोच और तीन दशक पुराना इतिहास
बाहर से देखने पर भले ही यह परिसर एकदम नया सा प्रतीत हो, लेकिन इसकी वास्तविक पृष्ठभूमि लगभग 30 साल पुरानी है। पर्यावरण केंद्रित उपक्रम इकोप्लोर की संस्थापक प्रेरणा प्रसाद के अनुसार, इस विशिष्ट ढांचे की परिकल्पना और निर्माण प्रसिद्ध वास्तुकार रेवती कामथ और बसंत कामथ ने किया था। समय बीतने के साथ अब इस पूरे परिसर को 'वनभोज' नाम देकर एक निजी संग्रहालय के रूप में संरक्षित और संचालित किया जा रहा है। यहां आने वाले आगंतुकों को न केवल इस अनोखे घर का दीदार करने का अवसर मिलता है, बल्कि वे इसकी रचना प्रक्रिया और पारंपरिक कारीगरी की बारीकियों को भी करीब से समझ सकते हैं।
भीषण गर्मी में प्राकृतिक ठंडक का अनुभव
इस मिट्टी के घर की सबसे बड़ी व्यावहारिक विशेषता इसका आंतरिक वातावरण है। शहर की तपती धूप से निकलकर जैसे ही कोई व्यक्ति इस परिसर की देहरी पार करता है, उसे तापमान में साफ अंतर महसूस होता है। प्रेरणा प्रसाद बताती हैं कि घर के अंदर का पारा बाहरी वातावरण के मुकाबले काफी कम रहता है। इसके लिए किसी कृत्रिम उपकरण या ऊर्जा खपत की आवश्यकता नहीं पड़ती, बल्कि दीवारों में लगी मिट्टी और पत्थरों की स्वाभाविक तापीय क्षमता ही अंदरूनी वातावरण को सुहावना बनाए रखती है। बिना किसी दिखावे या आधुनिक चकाचौंध के यह सादा ढांचा अपनी स्वाभाविक बनावट से हर दर्शक पर गहरा प्रभाव छोड़ता है।
विद्यार्थियों और प्रकृति प्रेमियों के लिए ज्ञान का केंद्र
इस परिसर में केवल आम सैलानी या शांति की तलाश में निकले परिवार ही नहीं आ रहे, बल्कि वास्तुकला महाविद्यालयों के छात्र और स्कूली बच्चे भी लगातार पहुंच रहे हैं। प्रेरणा प्रसाद का कहना है कि युवा पीढ़ी और अध्ययनरत विद्यार्थियों के लिए यह स्थान पारंपरिक देसी निर्माण तकनीकों को जमीनी स्तर पर परखने की जीवंत प्रयोगशाला जैसा है। सीमेंट के बिना मात्र मिट्टी, लकड़ी और पत्थरों के सहारे एक टिकाऊ व मजबूत घर कैसे खड़ा किया जा सकता है, यह देखना भावी योजनाकारों और शिल्पकारों के लिए बेहद प्रेरणादायक साबित हो रहा है।
एनसीआर के प्रदूषण और शोरगुल से दूर स्वच्छ हवा का कोना
दिल्ली और फरीदाबाद समेत समूचे एनसीआर में वायु प्रदूषण और जहरीली हवा एक विकट चुनौती बनी रहती है। ऐसे माहौल में वनभोज का हरा-भरा और प्राकृतिक उपादानों से रचा परिवेश शहर की भीड़ और धुंध से एक दुर्लभ राहत देता है। राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता बिगड़ने के दिनों में भी इस हरित परिसर का वातावरण अपेक्षाकृत स्वच्छ और ताजा बना रहता है। चमक-दमक भरी बहुमंजिला इमारतों के समानांतर यह मिट्टी का घर उन तमाम शहरी नागरिकों के लिए एक सुखद अनुभव है जो अपनी जड़ों और प्रकृति के करीब कुछ पल बिताना चाहते हैं।



















