आज के दौर में मोबाइल फोन और लैपटॉप हमारे दैनिक जीवन का अहम हिस्सा बन चुके हैं। सुबह की शुरुआत से लेकर रात तक पढ़ाई, दफ्तर के काम और मनोरंजन के लिए इनका इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। हालांकि जरूरत से ज्यादा मोबाइल का इस्तेमाल करने और हर समय स्क्रीन से चिपके रहने की आदत अब बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रही है। इस लत के कारण उनकी जीवनशैली पूरी तरह बदल चुकी है, जिससे उनके स्वभाव में नकारात्मक बदलाव आने लगे हैं। इसी गंभीर विषय पर मेडिकल कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. तरुण पाल ने विस्तार से चर्चा की है और इसके खतरों से आगाह किया है।
बच्चों के बर्ताव में आ रहे तेजी से बदलाव
डॉ. तरुण पाल ने बताया कि उनके पास मानसिक समस्याओं से जूझने वाले मरीजों की तादाद लगातार बढ़ रही है। इन मामलों में अब बच्चों और किशोरों की संख्या में भी इजाफा देखा जा रहा है। विशेष तौर पर छोटे बच्चों के स्वभाव में पहले की तुलना में बहुत तेजी से बदलाव आ रहे हैं, जिसके पीछे आधुनिक तकनीक और मोबाइल का अत्यधिक उपयोग मुख्य वजह है। आज के समय में तकनीक ने जितनी सुविधाएं दी हैं, उतनी ही नई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं जिनका सीधा असर नई पीढ़ी के मानसिक संतुलन पर पड़ रहा है।
अभिभावकों की चिंता और निगरानी की कमी
उन्होंने आगे बताया कि तमाम माता-पिता अपने बच्चों के बदले हुए व्यवहार से परेशान होकर उन्हें सलाह और इलाज के लिए अस्पताल लेकर आ रहे हैं। उनका मानना है कि कई मामलों में अभिभावक अपने बच्चों पर उचित नजर नहीं रख पा रहे हैं। स्कूल से लौटने और अपना गृहकार्य पूरा करने के बाद बच्चे मैदान में जाकर खेलने या अपने परिवार के साथ बातचीत करने के बजाय अपना सारा समय मोबाइल स्क्रीन पर बिताने लगते हैं। धीरे-धीरे उन्हें डिजिटल दुनिया की ऐसी लत लग जाती है जिससे बाहर निकलना उनके लिए मुश्किल हो जाता है और वे वास्तविक दुनिया से कटने लगते हैं।
परिवार के साथ वक्त बिताना है जरूरी
डॉ. तरुण पाल का कहना है कि माता-पिता को अपनी नैतिक जिम्मेदारी को समझना होगा और बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना चाहिए। बच्चों से खुलकर बात करने और उनकी मानसिक जरूरतों को समझने से उन्हें यह अहसास होता है कि परिवार और समाज का उनके जीवन में क्या महत्व है। सिर्फ बच्चे का ध्यान भटकाने या उसे चुप कराने के लिए उसके हाथ में मोबाइल थमा देना किसी भी स्थिति में एक सही समाधान नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है।
खेल-कूद और शारीरिक गतिविधियों को दें बढ़ावा
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि बच्चों को शारीरिक खेलों और बाहरी गतिविधियों के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जाना बेहद जरूरी है। खेलकूद बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण आयामों में से एक है। यदि बच्चों का मोबाइल देखने का समय कम कर दिया जाए और उनकी दैनिकचर्या में खेल व पारिवारिक मेलजोल को शामिल किया जाए, तो उनके व्यवहार में आ रहे इन बदलावों को धीरे-धीरे ठीक किया जा सकता है।
खान-पान की आदतों में भी आ रहा बदलाव
डॉ. तरुण पाल ने यह भी रेखांकित किया कि बच्चों की खान-पान की जीवनशैली में भी काफी गिरावट देखने को मिल रही है। अत्यधिक स्क्रीन उपयोग के चक्कर में कई बच्चे अपने भोजन और पोषण पर पूरा ध्यान नहीं देते हैं, जिससे माता-पिता की चिंताएं और अधिक बढ़ जाती हैं। ऐसे में जरूरी यह है कि अभिभावक केवल बच्चों पर नजर न रखें, बल्कि उनके खान-पान की आदतों और पौष्टिक आहार पर भी बराबर ध्यान दें ताकि उनका शारीरिक स्वास्थ्य भी बेहतर बना रह सके।
सोशल मीडिया पर वायरल होने की खतरनाक होड़
उन्होंने चेताया कि युवाओं के बीच सोशल मीडिया पर छा जाने और रातों-रात वायरल होने की चाहत ने उन्हें गलत राह पर धकेल दिया है। इसका सीधा असर उनके पहनावे, हेयर स्टाइल और रहन-सहन पर तो पड़ रहा है, साथ ही वे लोकप्रियता पाने के लिए जोखिम भरे और खतरनाक वीडियो बनाने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। कई बार ऐसे खतरनाक स्टंट या कंटेंट बनाने के चक्कर में युवाओं की जान पर तक बन आती है, जो बेहद चिंताजनक विषय है।
शुरुआत से ही मोबाइल की आदतों पर रखें नियंत्रण
डॉ. तरुण पाल के अनुसार बचपन से ही मोबाइल और ऑनलाइन सामग्री की लत लग जाना आगे चलकर बच्चों की सोचने की क्षमता और व्यवहार को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि बच्चों को शुरुआत से ही गैजेट्स के इस्तेमाल के सही तौर-तरीके सिखाए जाएं। उन्होंने विशेष रूप से एकल परिवारों में रहने वाले माता-पिता को आगाह किया कि वे अपने बच्चों पर विशेष ध्यान दें। बच्चों के साथ संवाद स्थापित करना, उनके साथ खेलना और परिवार के लिए वक्त निकालना अनिवार्य है ताकि वे केवल मोबाइल की आभासी दुनिया तक ही सीमित न होकर रह जाएं।



















