मौसम में होने वाले बदलावों के साथ ही वायरल संक्रमण और बुखार का खतरा काफी तेजी से बढ़ जाता है। ज्यादातर लोग हर तरह के बुखार को एक साधारण वायरल मानकर उसकी अनदेखी कर देते हैं, लेकिन इन दिनों दिल्ली में स्वाइन फ्लू यानी H1N1 का संक्रमण बहुत तेजी से फैल रहा है। ऐसी स्थिति में यह पहचानना बेहद आवश्यक हो जाता है कि सामान्य वायरल फीवर और स्वाइन फ्लू के बीच असल फर्क क्या है ताकि समय रहते सही कदम उठाए जा सकें। इस विषय पर डॉ. अजय अग्रवाल, चेयरमैन इंटरनल मेडिसिन, फोर्टिस हॉस्पिटल नोएडा विस्तार से जानकारी दे रहे हैं कि दोनों संक्रमणों में क्या अंतर है और स्वाइन फ्लू से बचने के लिए कौन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए।
सामान्य वायरल फीवर और स्वाइन फ्लू में अंतर
सामान्य वायरल फीवर की शुरुआत आमतौर पर धीरे-धीरे होती है, जबकि इसके ठीक विपरीत स्वाइन फ्लू के मामले में वायरस का हमला बहुत अचानक और तेज होता है। इस खतरनाक संक्रमण की चपेट में आने पर मरीज कुछ ही घंटों के भीतर खुद को बहुत अधिक बीमार महसूस करने लगता है। बुखार के स्तर की बात करें तो साधारण वायरल में तापमान हल्का से मध्यम यानी 99° से 101°F के बीच रहता है, जबकि स्वाइन फ्लू में अचानक ही 102° से 104°F तक तेज बुखार चढ़ जाता है जो सामान्य दवाओं से आसानी से नीचे नहीं उतरता है। इसके अलावा, शरीर और मांसपेशियों के दर्द में भी बड़ा अंतर होता है। स्वाइन फ्लू होने पर जोड़ों, मांसपेशियों में भयंकर दर्द और अत्यधिक थकान महसूस होती है, जबकि सामान्य वायरल में यह दर्द काफी हल्का होता है।
सांस से जुड़ी समस्याएं और संक्रमण के लक्षण
श्वसन तंत्र पर असर के मामले में भी दोनों बीमारियां एक-दूसरे से काफी अलग होती हैं। सामान्य वायरल संक्रमण में अमूमन केवल नाक बहने या गला हल्का खराब होने जैसी परेशानियां ही सामने आती हैं। वहीं दूसरी तरफ, स्वाइन फ्लू के मरीजों में सूखी और तेज खांसी उठती है, गले में गंभीर खराश बनी रहती है और कुछ विशेष मामलों में तो सांस फूलने या सीने में जकड़न जैसी गंभीर समस्याएं भी महसूस होने लगती हैं। चूंकि स्वाइन फ्लू एक ड्रॉपलेट इन्फेक्शन है, इसलिए इसके फैलने की रफ्तार बहुत तेज होती है और यह खांसने या छींकने के दौरान निकलने वाली बूंदों से दूसरों तक आसानी से पहुंच सकता है।
स्वाइन फ्लू (H1N1) से बचाव के लिए जरूरी कदम
इस खतरनाक संक्रमण के प्रसार को रोकने और खुद को सुरक्षित रखने के लिए कुछ खास उपायों को अपनी दिनचर्या में शामिल करना बेहद आवश्यक है। स्वाइन फ्लू से बचने का सबसे असरदार और सुरक्षित तरीका एनुअल क्वाड्रिवेलेंट इन्फ्लूएंजा वैक्सीन लगवाना है, जो शरीर के भीतर H1N1 वायरस से मुकाबला करने के लिए मजबूत एंटीबॉडी तैयार करती है। इसके अलावा, जब भी आप किसी भीड़भाड़ वाले इलाके में जाएं तो N95 या सर्जिकल मास्क का अनिवार्य रूप से इस्तेमाल करें। खांसते या छींकते वक्त अपने मुंह को किसी टिशू पेपर या अपनी कोहनी से अच्छी तरह ढकें ताकि संक्रमण हवा में न फैले।
स्वच्छता और खुद को अलग रखना
व्यक्तिगत साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना इस बीमारी से बचाव में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। दिन में कई बार कम से कम 20 सेकंड तक अपने हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोएं या फिर अल्कोहल-आधारित सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करें। गंदे हाथों से अपनी आंख, नाक और मुंह को बिल्कुल न छुएं क्योंकि वायरस इन्हीं रास्तों से शरीर के अंदर प्रवेश करता है। यदि आपको या आपके परिवार के किसी सदस्य को बुखार या खांसी की शिकायत है, तो बेहतर यही होगा कि आप घर पर ही रहें और खुद को आइसोलेट कर लें ताकि यह बीमारी आपके सहकर्मियों और परिवार के अन्य सदस्यों तक न फैल सके।
डॉक्टर से संपर्क करने का सही समय
यदि आपको या आपके परिवार में किसी भी व्यक्ति को सांस लेने में गंभीर तकलीफ हो रही हो, सीने में लगातार दर्द बना रहे, होंठ नीले पड़ने लगे हों या फिर लगातार तीन दिन से ज्यादा समय तक तेज बुखार उतरने का नाम न ले रहा हो, तो बिना एक पल गंवाए अपने नजदीकी अस्पताल के डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें। किसी भी परिस्थिति में डॉक्टर की सलाह के बिना खुद से एंटीबायोटिक्स का सेवन न शुरू करें। यह बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि स्वाइन फ्लू एक वायरल बीमारी है, और वायरल संक्रमणों पर एंटीबायोटिक्स दवाएं बिल्कुल असर नहीं करती हैं।



















