सर्दियों के मौसम में ठिठुरन से बचना हो, मांसपेशियों की जकड़न ढीली करनी हो, कमर दर्द से निपटना हो या फिर मासिक धर्म के दौरान पेट में उठने वाली ऐंठन को शांत करना हो, गर्म सिकाई हमेशा से एक बेहद लोकप्रिय घरेलू उपाय रही है। हाल के दिनों में पानी उबालकर साधारण रबड़ की बोतल में भरने की मशक्कत से बचने के लिए लोगों ने बिजली से गर्म होने वाले आधुनिक हीटिंग बैग का रुख तेजी से किया है। यह उपकरण मिनटों में तैयार हो जाता है और बार-बार गर्म पानी बदलने की झंझट को खत्म कर लंबे समय तक गर्मी बरकरार रखता है। राहत की इसी सुविधा के बीच लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि जरूरत से ज्यादा या अनियंत्रित तापमान फायदे की जगह शरीर को नई मुसीबत में डाल सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञों का साफ मानना है कि सिकाई में अतिरिक्त तापमान का अर्थ अधिक लाभ कतई नहीं होता, बल्कि बेतरतीब गर्माहट, त्वचा के सीधे संपर्क में अत्यधिक देर तक उपकरण को रखना अथवा इसे चालू रखकर सो जाना भारी शारीरिक नुकसान की वजह बन सकता है।
त्वचा के लिए क्यों खतरनाक साबित होती है जरूरत से ज्यादा गर्माहट
चिकित्सकीय नजरिए से देखें तो किसी भी हिस्से पर गर्म सिकाई करने का मुख्य ध्येय उस जगह के रक्तसंचार को संतुलित कर मांसपेशियों के तनाव को कम करना होता है। डॉ राजकुमार (आयुष) के अनुसार, यदि उपकरण बहुत ज्यादा गर्म हो चुका है और उसे बिना किसी सुरक्षात्मक कपड़े या आवरण के सीधे बदन पर टिका दिया जाए, तो इससे त्वचा की बाहरी सतह गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। लंबे समय तक सीधी तेज तपिश झेलने से उस हिस्से पर लाल चकत्ते उभरना, जलन होना, त्वचा में रूखापन आना और अत्यधिक संवेदनशीलता पैदा होना बेहद आम बात है। कई मामलों में तो गर्मी इतनी गहरी चोट पहुंचा देती है कि त्वचा पर पानी से भरे छाले पड़ जाते हैं, जिनका उपचार लंबा खिंच सकता है।
बिस्तर पर इसे लगाकर सो जाना बढ़ा देता है जलने का जोखिम
कमर, घुटने या पेट के दर्द से परेशान लोग अक्सर गर्माहट से मिलने वाले आराम के कारण हीटिंग बैग को शरीर से सटाकर ही गहरी नींद में चले जाते हैं। यह आदत सबसे ज्यादा जोखिम भरी मानी जाती है, क्योंकि सोते वक्त व्यक्ति की सजगता खत्म हो जाती है और उसे आभास ही नहीं होता कि त्वचा कितनी प्रचंड गर्मी झेल रही है। यदि त्वचा झुलसने भी लगे तो अचेत अवस्था में बैग को समय रहते हटा पाना संभव नहीं हो पाता, जिससे गहरी चोट लग जाती है।
डायबिटिक और पेरिफेरल न्यूरोपैथी के मरीजों को विशेष सतर्कता की दरकार
जो लोग डायबिटीज यानी मधुमेह की बीमारी से जूझ रहे हैं, उनमें कई बार नसों की क्षति हो जाती है, जिसे चिकित्सीय भाषा में डायबिटिक न्यूरोपैथी कहा जाता है। इस विकार के शिकार व्यक्तियों के हाथ, पैर और बदन के अन्य अंगों में दर्द या गर्मी को तुरंत भांपने की शारीरिक क्षमता कमजोर पड़ जाती है। ऐसे मरीज जब गर्म सिकाई करते हैं तो त्वचा के अत्यधिक जल जाने के बाद ही उन्हें खतरे का पता चलता है, तब तक गंभीर घाव बन चुका होता है। इसी तरह परिधीय न्यूरोपैथी के मरीजों में भी तापमान की संवेदनशीलता घट जाती है, जिससे अनजाने में त्वचा के बुरी तरह झुलसने की संभावना काफी बढ़ जाती है। ऐसे सभी मरीजों को गर्म सिकाई का सहारा लेने से पहले अपने चिकित्सक की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।
बच्चों, बुजुर्गों की नाजुक त्वचा और बिजली से जुड़े खतरों की अनदेखी न करें
घर के छोटे बच्चों, वृद्धजनों और जिन लोगों की त्वचा प्राकृतिक रूप से बहुत नाजुक या कम संवेदी है, उनके मामले में अतिरिक्त चौकसी बरतना जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति की त्वचा तापमान के उतार-चढ़ाव को तेजी से नहीं भांप पाती, तो मामूली समय में भी गर्म उपकरण त्वचा को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक हॉट वॉटर बैग के साथ सिर्फ गर्मी ही नहीं बल्कि करंट और तकनीकी खराबी का खतरा भी जुड़ा होता है। उपकरण को चालू करने से पहले उसकी वायरिंग, सॉकेट पिन और बैग की बाहरी सिलाई की जांच अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। यदि केबल कटी हुई दिखाई दे, प्लग ढीला बैठता हो, बैग के जोड़ों से किसी प्रकार का रिसाव हो रहा हो या उपकरण में कोई भी तकनीकी दोष नजर आए, तो उसका उपयोग तुरंत बंद कर देना ही बुद्धिमानी है।

















