पेट खराब होने या दस्त लगने की स्थिति में शरीर से पानी और ज़रूरी मिनरल्स बहुत तेज़ी से बाहर निकल जाते हैं। जब डिहाइड्रेशन बढ़ता है, तो पूरे बदन में सुस्ती, भारी कमज़ोरी और थकान महसूस होने लगती है। ऐसी नाज़ुक शारीरिक स्थिति में खानपान का चुनाव बहुत सतर्कता से करना पड़ता है, क्योंकि गलत भोजन आंतों की जलन को और बढ़ा सकता है, जबकि सही डाइट पाचन तंत्र पर बिना अतिरिक्त दबाव डाले शरीर को दोबारा संभलने में सहायता करती है। मेडिकल विशेषज्ञ शुभम वत्स के अनुसार, पेट के संक्रमण या दस्त के दौरान कुछ खास खाद्य पदार्थों को भोजन में शामिल करने से आंतों को राहत मिलती है और रिकवरी की प्रक्रिया आसान हो जाती है।
केला: स्टूल को बांधने और मिनरल्स की भरपाई में मददगार
दस्त की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए केला एक बेहतरीन फल साबित होता है। शुभम वत्स समझाते हैं कि केले के भीतर प्रचुर मात्रा में घुलनशील फाइबर यानी सॉल्युबल फाइबर पाया जाता है। यह घुलनशील फाइबर आंतों में मौजूद तरल को सोखकर पतले और ढीले स्टूल को बांधने तथा उसे ठोस स्वरूप प्रदान करने का कार्य करता है। इसके अलावा, डायरिया होने पर शरीर से बड़े पैमाने पर पोटेशियम निकल जाता है, जिसकी वजह से मांसपेशियों में ऐंठन और कमज़ोरी आ सकती है। केला प्राकृतिक रूप से पोटेशियम प्रदान करता है, जिससे खोए हुए पोषक तत्वों की तत्काल भरपाई संभव हो पाती है।
सफेद चावल: संवेदनशील पाचन तंत्र के लिए बेहद हल्का विकल्प
जब पाचन तंत्र पूरी तरह बिगड़ा हुआ हो, तब सादा सफेद चावल खाना बेहद सुरक्षित माना जाता है। शुभम वत्स के अनुसार, प्लेन उबले हुए सफेद चावल में फाइबर की मात्रा काफी कम होती है। फाइबर कम होने के कारण यह पेट में बहुत सरलता और तेज़ी से पच जाता है। संक्रमण से परेशान और संवेदनशील गट लाइनिंग पर यह चावल बिल्कुल सौम्य तरीके से काम करता है और पाचन अंगों को किसी भी तरह के भारी तनाव से दूर रखता है, जिससे पेट को आराम करने का पूरा अवसर मिलता है।
सादा दही: आंतों के माइक्रोबायोम को दोबारा सक्रिय करने वाला प्रोबायोटिक
अगर कोई व्यक्ति डेयरी उत्पादों का नियमित सेवन करता है, तो दस्त के दिनों में दही को अपने आहार में अवश्य जगह देनी चाहिए। दही के अंदर मौजूद स्वाभाविक प्रोबायोटिक्स यानी मित्र बैक्टीरिया आंतों के माइक्रोबायोम को मजबूत और संतुलित बनाने में मदद करते हैं। ये अच्छे बैक्टीरिया संक्रमण फैलाने वाले तत्वों से लड़ते हैं और आंतों की आंतरिक कार्यप्रणाली को व्यवस्थित करते हैं। हालांकि, इसमें एक सावधानी बरतना अत्यंत आवश्यक है। डायरिया के समय दही में चीनी, मीठा या किसी भी प्रकार का आर्टिफिशियल स्वीटनर बिल्कुल न मिलाएं। मिठास मिलाने से दही का चिकित्सीय प्रभाव खत्म हो जाता है और पेट को कोई लाभ नहीं पहुंचता।
नारियल पानी और ओआरएस: इलेक्ट्रोलाइट्स का सही संतुलन बनाना
लूज मोशन में शरीर की हाइड्रेशन बनाए रखने के लिए नारियल पानी का उपयोग काफी असरदार माना जाता है। इसमें प्राकृतिक तरल पदार्थ और पोटेशियम भरपूर मात्रा में उपलब्ध होते हैं, जो पानी की कमी को दूर करने में सहायता करते हैं। लेकिन ध्यान रखने योग्य बात यह है कि यदि दस्त की तीव्रता बहुत अधिक है, तो केवल नारियल पानी को ओआरएस का विकल्प मान लेना सही नहीं होगा। गंभीर दस्त में शरीर से निकलने वाले आवश्यक इलेक्ट्रोलाइट्स और नमक की सटीक भरपाई के लिए ओरल रिहाइड्रेशन साल्ट्स यानी ओआरएस का घोल पीना सर्वाधिक आवश्यक होता है।
मूंग दाल और चावल की खिचड़ी: ऊर्जा और पोषण का सुपाच्य स्रोत
बीमारी के दौरान जब शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है, तब सफेद चावल और पीली मूंग दाल से तैयार की गई पतली खिचड़ी सबसे आदर्श भोजन बनती है। यह हल्की खिचड़ी आसानी से पच जाती है और आंतों पर ज़रा भी अतिरिक्त बोझ नहीं डालती। इससे शरीर को आवश्यक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन दोनों मिल जाते हैं, जिससे बिना पेट पर दबाव बनाए खोई हुई शक्ति वापस लौटने लगती है।


















