गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों और उनके परिजनों के लिए इलाज के खर्च का एक बहुत बड़ा हिस्सा दवाइयों की खरीद में चला जाता है। देश के प्रमुख दवा बाजारों और बड़े अस्पतालों के इर्द-गिर्द संचालित मेडिकल स्टोर्स पर पड़ताल करने पर यह हकीकत सामने आती है कि पैकेजिंग पर दर्ज अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी और दवाइयों की वास्तविक खरीद लागत के बीच भारी खाई मौजूद है। पैकेजिंग पर दर्ज अत्यधिक प्रिंट रेट के कारण मरीजों को लगता है कि उन्हें रियायत मिल रही है, जबकि हकीकत में दवाइयों के उत्पादन और थोक आपूर्ति की लागत छपे हुए मूल्य का एक छोटा सा हिस्सा ही होती है।
एमआरपी और थोक खरीद के बीच भारी अंतर का गणित
राजधानी दिल्ली में दिल्ली स्टेट कैंसर हॉस्पिटल के सामने स्थित रिटेल केमिस्ट की दुकानों पर दवाइयों के मूल्य निर्धारण का जो ढांचा दिखता है, वह हैरान करने वाला है। एक रिटेल केमिस्ट के अनुसार, दवा निर्माता कंपनियां कई बार किसी उत्पाद पर 1000 रुपए एमआरपी दर्ज करती हैं, जबकि वही उत्पाद खुले बाजार में महज 100 रुपए में बिकने के लिए उपलब्ध हो जाता है। दुकानदारों का कहना है कि वे ग्राहकों से सीधे एमआरपी वसूलने के बजाय भारी छूट पर दवाइयां बेचते हैं, लेकिन उत्पाद पर जरूरत से ज्यादा एमआरपी छापने की मुख्य वजह खुद दवा निर्माता कंपनियां ही बता सकती हैं। केमिस्ट थोक मंडियों से 20 प्रतिशत के स्तर पर दवाइयों की खरीद करते हैं।
नर्सिंग होम और निजी स्वास्थ्य केंद्रों में सप्लाई होने वाली दवाइयों पर प्रिंट रेट का ढांचा अलग रहता है। जब वही उत्पाद खुले बाजार में रिटेल काउंटर तक पहुंचता है, तो केमिस्ट अपनी ओर से केवल 10 प्रतिशत का मार्जिन जोड़कर उसे आगे ग्राहक को बेच देते हैं। उदाहरण के तौर पर, एक दवा जिस पर 14000 रुपए एमआरपी दर्ज थी, उसे केमिस्ट थोक बाजार से 1550 रुपए में खरीदता है और मरीज अथवा ग्राहक को 1700 रुपए में बेचता है। इसी तरह 445 रुपए की एमआरपी वाली एक अन्य आवश्यक दवा थोक में 150 रुपए में खरीदी जाती है और रिटेल काउंटर पर 200 रुपए में बेची जाती है। इस प्रकार भारी भरकम एमआरपी ग्राहकों के लिए केवल एक दिखावा बनकर रह जाती है।
फार्मेसी संचालकों की कार्यप्रणाली और मरीजों की लाचारी
मेडिकल स्टोर पर दवा खरीदने पहुंची एक महिला ने आम आदमी की विवशता को साझा करते हुए कहा कि बाजार में जीवनरक्षक दवाइयां बहुत महंगी मिलती हैं और उनके पास इन्हें खरीदने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। वहीं मेडिकल स्टोर संचालकों का तर्क है कि वे बिना डॉक्टर के वैध पर्चे के कोई भी प्रिस्क्रिप्शन आधारित दवा नहीं बेचते हैं। जब बाजार में किसी विशेष दवा की किल्लत या शॉर्टेज हो जाती है, तो उसकी आपूर्ति प्रभावित होने से कीमतें और अधिक बढ़ जाती हैं। दवा कारोबार में हर क्षेत्र और हर उत्पाद के हिसाब से ट्रेड प्रैक्टिस और मार्जिन अलग-अलग तय होते हैं।
कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की दवाइयों के बारे में पूछने पर कुछ स्टैंडअलोन फार्मेसी संचालकों ने स्पष्ट किया कि उनके पास ऐसी विशिष्ट दवाइयां उपलब्ध नहीं रहती हैं। उनका कहना है कि स्टैंडअलोन मेडिकल स्टोर्स पर इस तरह की संवेदनशील दवाइयां बहुत सस्ती दरों पर उपलब्ध कराना व्यावहारिक नहीं हो पाता। एक अन्य दुकानदार ने बताया कि इलाके और लोकेशन के आधार पर भी दवाइयों की दरों में अंतर आ जाता है। बड़े कॉर्पोरेट और निजी अस्पताल अपने परिसरों के भीतर मनमाने ढंग से दवाइयों की कीमतें और मार्जिन तय करते हैं, जबकि सामान्य स्वतंत्र रिटेल दुकानदार एमआरपी पर 10 से 12 प्रतिशत तक का ही मुनाफा ले पाते हैं।
एक अन्य फार्मेसी संचालक ने दवा बिक्री के बुनियादी ढांचे को समझाते हुए बताया कि बिक्री के समय एमआरपी निश्चित रूप से प्रभावित होता है, लेकिन स्वतंत्र फार्मेसी अपने खर्चे और मार्जिन के अनुसार अंतिम दर तय करती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी दवा की थोक खरीद 2000 रुपए है, तो उसे दुकान पर 2200 रुपए या 2300 रुपए में बेचा जा सकता है। उनके अनुसार, अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और गतिशील बाजार में एमआरपी पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी है, जबकि बड़े अस्पतालों के भीतर संचालित आंतरिक दवा दुकानों पर यह मुनाफा कहीं अधिक बड़ा हो जाता है।
डॉक्टर, अस्पताल और मेडिकल स्टोर के बीच गठजोड़ का खेल
दवा कारोबार के जानकारों और केमिस्टों ने इस बात को दबी जुबान में स्वीकार किया है कि डॉक्टरों और चुनिंदा मेडिकल स्टोर्स के बीच सीधा वाणिज्यिक गठजोड़ यानी टाई-अप काम करता है। कई मामलों में डॉक्टर पर्चे पर ऐसी विशिष्ट कंपनियों या ब्रांड्स की दवाइयां लिखते हैं, जो केवल उन्हीं चुनिंदा मेडिकल स्टोर्स पर उपलब्ध होती हैं जिनके साथ उनका पहले से तालमेल होता है। एक केमिस्ट ने खुले तौर पर माना कि डॉक्टरों और दवा विक्रेताओं के बीच कमीशन और रेफरल की यह व्यवस्था व्यापार का एक सामान्य हिस्सा बन चुकी है।
वहीं जब एक मेडिकल स्टोर पर वित्तीय कामकाज देख रही महिला कर्मचारी से अत्यधिक मार्जिन को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वे केवल फाइनेंस का काम संभालती हैं और उन्हें दवाओं के मूल्य निर्धारण की तकनीकी जानकारी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दवाइयों पर मुनाफे का मार्जिन सीमित करने को लेकर की गई टिप्पणियों पर उन्होंने कहा कि इस संबंध में वे कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं हैं। अन्य दुकानदारों का कहना था कि भले ही वे 50 प्रतिशत तक की छूट देकर दवा बेचते हों, लेकिन अंतिम बिक्री मूल्य तय करना पूरी तरह दुकानदार के हाथ में होता है। उनका कहना है कि एमआरपी के दायरे में रहते हुए वे किसी भी दर पर दवा बेचने के लिए स्वतंत्र हैं।
भागीरथ पैलेस के थोक कारोबारियों ने खोली नीतिगत खामियों की पोल
पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक स्थित भागीरथ पैलेस को एशिया का सबसे बड़ा थोक दवा बाजार माना जाता है। वहां के दवा व्यापारियों ने पूरे सिस्टम में मौजूद विसंगतियों को खुलकर सामने रखा है। दिल्ली ड्रग ट्रेडर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी आशीष ग्रोवर ने जानकारी दी कि चाहे कैंसर की दवाएं हों या सामान्य उपचार की अन्य दवाएं, निर्माता कंपनियों द्वारा उन पर अत्यधिक एमआरपी छापने का चलन बेहद पुराना है। थोक दवा व्यापारी लंबे समय से सभी आवश्यक दवाओं के लिए एक समान और पारदर्शी मूल्य निर्धारण व्यवस्था लागू करने की मांग कर रहे हैं।
आशीष ग्रोवर ने स्पष्ट किया कि थोक बाजार में काम करने वाले व्यापारियों का कमीशन और मार्जिन पूरी तरह सीमित और फिक्स होता है। इसलिए सरकार और संबंधित नियामक प्राधिकरणों को इस बात का संज्ञान लेना चाहिए कि दवा निर्माण स्तर पर ही एमआरपी इतनी अधिक क्यों रखी जाती है। जब दवा कंपनियां शुरुआत में ही अत्यधिक प्रिंट रेट तय करेंगी, तो सामान्य उपभोक्ता को सस्ती दर पर दवा मिलना असंभव हो जाता है। थोक मंडियों से दवा जब रिटेल दुकानों पर पहुंचती है, तो छूट का खेल शुरू होता है और दवा कंपनियां भी वन प्लस वन जैसी आक्रामक मार्केटिंग स्कीमें चलाकर एमआरपी को कृत्रिम रूप से कई गुना बढ़ाकर पेश करती हैं।



















