व्यावसायिक वानिकी में रुचि रखने वाले ग्रामीण उत्पादकों के बीच महोगनी के रोपण का चलन लगातार जोर पकड़ रहा है। बिहार के पश्चिम चंपारण इलाके में काष्ठ की पैदावार करने वाले काश्तकार इसे अन्य पारंपरिक प्रजातियों के मुकाबले अधिक तरजीह देते हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि यह वृक्ष बाकी इमारती वृक्षों की तुलना में काफी तेजी से परिपक्वता प्राप्त करता है। जलयान, नौकाओं, बंदूकों के कुंदे, खिड़कियों, कपाटों, आधुनिक साज-सज्जा की वस्तुओं और मूल्यवान कलाकृतियों के निर्माण में प्रयुक्त होने के चलते व्यापारिक मंडियों में इसकी भारी पूछ-परख बनी रहती है। इसके बावजूद, कई उत्पादक सही वक्त की जानकारी न होने के अभाव में अनिश्चितता की स्थिति में लंबा समय जाया कर देते हैं।
तने का फैलाव और विकास की अवधि
वनस्पति मामलों के दीर्घकालिक जानकार रविकांत पांडे के अनुसार, उचित परिवेश और जरूरी रखरखाव मिलने पर यह पेड़ सामान्यतः 12 से 20 वर्षों के भीतर कटाई योग्य अवस्था में पहुंच जाता है। जब यह पूर्ण विकसित हो जाता है, तो इसके मुख्य तने में भारी मजबूती और मोटाई देखने को मिलती है। एक व्यवस्थित वृक्ष के मुख्य तने का घेरा यानी व्यास कम से कम 12 से 15 इंच अथवा इससे अधिक होना चाहिए। तने की यह चौड़ाई स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि काष्ठ कटाई के अनुकूल स्तर तक पहुंच चुका है।
छाल की बाहरी बनावट और भीतरी काष्ठ का रंग
प्रारंभिक अवस्था में पौधे की बाहरी त्वचा अपेक्षाकृत कोमल, सपाट और मटमैले हल्के भूरे रंग की दिखाई देती है। कालक्रम के अनुसार जैसे-जैसे यह पूर्णता की ओर बढ़ता है, बाहरी आवरण गहरा भूरा या स्याह काले रंग में तब्दील होने लगता है। साथ ही बाहरी सतह पर स्पष्ट रेखाएं, दरारें और झुर्रीनुमा संरचनाएं उभर आती हैं। इसके अतिरिक्त, बाहरी खोल को आंशिक रूप से कुरेदकर भी भीतरी हिस्से की जांच की जा सकती है। पूर्णतः विकसित हो चुके पेड़ की भीतरी लकड़ी गहरे लाल, तांबिया अथवा लालिमा लिए भूरे रंग की झलक देती है, जबकि अपरिपक्व अवस्था में यही भाग पीला अथवा हल्का गुलाबी दिखता है।
ऊंचाई और वैश्विक कारोबार में महत्ता
वयस्क अवस्था में पहुंचने पर महोगनी की शाखाएं 40 से 60 फीट या उससे भी अधिक ऊंचाई तक पहुंच जाती हैं। इसके शीर्ष की सघन पत्तियां ऊपर जाकर एक विस्तृत छतरीनुमा आवरण का स्वरूप ले लेती हैं। अफ्रीकी महाद्वीप की ब्लैक वुड के उपरांत महोगनी को जल और कड़ी धूप में अप्रभावित रहने वाली टिकाऊ काष्ठ माना जाता है। इसी सहनशीलता और मौसम प्रतिरोधी क्षमता की वजह से देश के अलावा वैश्विक मंडियों में भी इस प्राकृतिक संसाधन की निरंतर ऊंची खपत रहती है।



















