देश की राजधानी दिल्ली में स्वाइन फ्लू यानी H1N1 इन्फ्लूएंजा का संक्रमण तेजी से पांव पसार रहा है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में इस वायरस से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़कर 1449 हो चुकी है। महज दो दिन पहले तक यह संख्या 1344 दर्ज की गई थी, जिसका सीधा मतलब है कि सिर्फ 48 घंटों में लगभग 100 नए मामले सामने आए हैं। पिछले वर्ष सितंबर के महीने तक जहां केवल 229 मामले सामने आए थे, वहीं इस बार के आंकड़े स्वास्थ्य प्रशासन और आम जनता की चिंता बढ़ाने के लिए काफी हैं। हालांकि, राहत की बात यह है कि अब तक किसी भी मरीज की जान जाने की खबर नहीं है और अधिकांश मरीजों का इलाज कर उन्हें अस्पताल से छुट्टी दी जा चुकी है।
सरकारी अस्पतालों में तैयारियां और जांच प्रक्रिया में तेजी
बढ़ते मामलों को देखते हुए दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने नागरिकों को आश्वस्त किया है कि सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। उन्होंने कहा कि फ्लू जैसे लक्षण वाले सभी संदिग्ध मरीजों की समय पर जांच और इलाज की व्यवस्था की जा रही है। डॉक्टर पंकज कुमार सिंह के अनुसार, "सरकारी अस्पतालों में दवाइयां और जरूरी इंतजाम किए गए हैं।" उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर जरूरत पड़ी, तो मरीजों की स्क्रीनिंग, टेस्टिंग, अस्पताल में दाखिले और उपचार की सुविधाओं का विस्तार और अधिक गति से किया जाएगा।
H3N2 के स्थान पर H1N1 स्ट्रेन का दबदबा और चिकित्सीय चुनौतियां
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले साल राजधानी में इन्फ्लूएंजा के लगभग 4,000 मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें से अधिकांश H3N2 स्ट्रेन से प्रभावित थे। हालांकि, इस साल स्थिति बदल गई है और इन्फ्लूएंजा ए का H1N1 स्ट्रेन मुख्य रूप से लोगों को संक्रमित कर रहा है। स्वाइन फ्लू का यह वायरस मुख्य रूप से हवा में मौजूद सांस की बूंदों के माध्यम से फैलता है। हालांकि इसके ज्यादातर मामले हल्के होते हैं और पर्याप्त आराम व प्राथमिक चिकित्सा से ठीक हो जाते हैं, लेकिन वरिष्ठ नागरिकों, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले व्यक्तियों में यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।
दिल्ली के कई सरकारी और निजी अस्पतालों में मरीजों की आवक बढ़ने के साथ ही डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि कुछ मामलों में यह संक्रमण फेफड़ों के निमोनिया में बदल रहा है। ऐसे गंभीर मरीजों को आईसीयू में भर्ती करने की नौबत भी आ रही है। चिकित्सकों ने सलाह दी है कि तेज बुखार, लगातार खांसी, गले में खराश या सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण महसूस होने पर मरीज को बिना देरी किए योग्य डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। किसी भी स्थिति में बिना डॉक्टरी सलाह के एंटीवायरल दवाओं का सेवन करने से बचने की सख्त हिदायत दी गई है। बचाव के सर्वोत्तम उपायों में नियमित रूप से साबुन से हाथ धोना, भीड़भाड़ वाली जगहों पर मास्क पहनना और खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को ढकना शामिल है।
स्वाइन फ्लू का वैश्विक इतिहास और भारत में पिछले प्रकोप
इन्फ्लूएंजा का H1N1 वायरस पहली बार साल 2009 में वैश्विक स्तर पर एक बड़ी महामारी के रूप में सामने आया था। इसका शुरुआती केंद्र मेक्सिको का वेराक्रूज इलाका था, जिसके बाद अप्रैल 2009 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में इसके नए मामले दर्ज किए गए थे। यह वायरस मूल रूप से सूअरों से जुड़े एक नए जेनेटिक रूप से तैयार हुआ था, जिसकी वजह से इसे आम भाषा में स्वाइन फ्लू कहा गया।
भारत में H1N1 इन्फ्लूएंजा का पहला मामला 16 मई 2009 को हैदराबाद शहर में सामने आया था। अमेरिका से दुबई होते हुए भारत पहुंचे एक यात्री में इस वायरस की पुष्टि हुई थी। इसके बाद 2009 और 2010 के दौरान इस महामारी ने पूरे भारत को अपनी चपेट में ले लिया था, जिसके परिणामस्वरूप हजारों लोग संक्रमित हुए और 1,000 से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इसके बाद वर्ष 2015 में स्वाइन फ्लू का दूसरा बड़ा प्रकोप देखने को मिला, जब देश भर में 33,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए और 2,000 से ज्यादा मौतें हुईं। उस दौर में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल थे।
मौसमी बदलाव और सावधानी बरतने की सलाह
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली में वर्तमान में दर्ज किए जा रहे मामले मौसम में हो रहे बदलाव से जुड़े हुए हैं। यद्यपि आम तौर पर स्वस्थ व्यक्ति उचित देखभाल से इस संक्रमण से पूरी तरह उबर जाते हैं, फिर भी उच्च जोखिम वाले समूहों को विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य विभाग और डॉक्टर स्थिति पर लगातार निगरानी रख रहे हैं ताकि संक्रमण के फैलाव को नियंत्रित किया जा सके।



















