यूरोप महाद्वीप इस समय ऐतिहासिक गर्मी और सूखे की चपेट में है, जिसका सीधा असर वहां के प्रमुख ऊर्जा ढांचे और नदियों पर पड़ने लगा है। महाद्वीप की दूसरी सबसे लंबी नदी डैन्यूब का पानी कई देशों में पिछले 30 वर्षों के सबसे निचले स्तर पर चला गया है। पानी की भारी किल्लत के कारण रोमानिया को अपने इकलौते चेर्नावोदा परमाणु ऊर्जा स्टेशन के दूसरे रिएक्टर को भी बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। कूलिंग के लिए नदी के पानी पर निर्भर रहने वाले इस संयंत्र के बंद होने से देश की बिजली आपूर्ति पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
चेर्नावोदा संयंत्र का परिचालन ठप और ऊर्जा संकट
चेर्नावोदा परमाणु संयंत्र रोमानिया की कुल बिजली खपत का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा पैदा करता है। इसमें 706 मेगावाट की क्षमता वाले दो परमाणु रिएक्टर स्थापित हैं। इनमें से पहला रिएक्टर जुलाई के महीने में ही बंद कर दिया गया था, जबकि दूसरा रिएक्टर गुरुवार को दोपहर से ठीक पहले ग्रिड से अलग कर दिया गया। संयंत्र के निदेशक रोमियो उर्जान के अनुसार, अगले 10 दिनों के भीतर संयंत्र को दोबारा शुरू कर पाना संभव नहीं दिख रहा है। इससे पहले इस संयंत्र को साल 2003 में जलस्तर कम होने के कारण बंद करना पड़ा था।
नदी में पानी के प्रवाह को बनाए रखने के लिए रोमानियाई अधिकारियों ने चट्टानों से भरे बड़े जहाजों को डैन्यूब नदी में डुबाकर पानी को संयंत्र के इनटेक चैनल की ओर मोड़ने की कोशिश भी की थी, लेकिन यह प्रयास नाकाफी साबित हुआ। दिन के समय धूप और हवा रहने पर रोमानिया सौर और पवन ऊर्जा से अपनी बिजली की जरूरत पूरी कर रहा है, लेकिन शाम के समय बिजली की मांग पूरी करने के लिए कोयला और गैस संयंत्रों के साथ-साथ पड़ोसी देशों से बिजली का आयात करना पड़ रहा है। देश की जलविद्युत क्षमता भी नदियों का पानी सूखने की वजह से बुरी तरह प्रभावित हुई है।
पड़ोसी देशों में नदियों का घटता जलस्तर और अन्य परमाणु संयंत्रों पर खतरा
डैन्यूब नदी के जलस्तर में आई इस भारी गिरावट का असर केवल रोमानिया तक सीमित नहीं है। पड़ोस के देश हंगरी में स्थित पाक्स परमाणु संयंत्र भी डैन्यूब नदी के पानी पर ही निर्भर है। सोवियत काल के इस संयंत्र में चार परमाणु रिएक्टर काम कर रहे हैं। हंगरी के प्रधानमंत्री पीटर मगयार ने चेतावनी दी थी कि पाक्स संयंत्र को इतिहास में पहली बार पूरी तरह बंद करना पड़ सकता है। प्लांट के अधिकारियों का कहना है कि नदी का पानी इतना कम हो गया है कि पानी खींचने वाले सक्शन नोजल अब पानी की सतह तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं। नदी के सूखने से एक अनूठा दृश्य भी सामने आया है, जहां जलस्तर घटने से द्वितीय विश्व युद्ध के समय डूबे हुए जहाज बाहर निकल आए हैं।
यूरोप में जलवायु परिवर्तन का गहराता असर और आर्थिक नुकसान
कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के आंकड़ों के अनुसार, यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन गया है, जो वैश्विक औसत से दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है। इसके कारण गर्मियों में हीटवेव की आवृत्ति बढ़ गई है, जल संसाधनों पर दबाव गहरा गया है और जंगलों की आग विकराल रूप ले रही है। यूरोप की एक अन्य प्रमुख जलमार्ग नदी राइन में भी पानी का स्तर खतरनाक रूप से गिर गया है, जिससे वहां मालवाहक जहाजों की आवाजाही ठप होने के कगार पर है।
इस भीषण सूखे का असर यूरोपीय अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र पर भी साफ दिख रहा है। इटली के प्रमुख कृषि व्यापार संघ कोल्डिरेटी के मुताबिक ओलावृष्टि, सूखा और आग जैसी जलवायु आपदाओं से कृषि क्षेत्र को 3 अरब यूरो से अधिक का नुकसान हो सकता है। वहीं फ्रांस की पर्यावरण मंत्री मोनिक बारबूट ने राष्ट्रीय सांख्यिकी एजेंसी के आंकड़ों का हवाला देते हुए सचेत किया है कि हालिया हीटवेव से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 10 अरब से 15 अरब यूरो तक का आर्थिक नुकसान हो सकता है। डच बैंक ट्रियोडोस ने चेतावनी जारी की है कि अत्यधिक गर्मी यूरोपीय संघ की अनुमानित आर्थिक वृद्धि को पूरी तरह खत्म कर सकती है, जबकि यूरोपीय आयोग ने 1.1 प्रतिशत और आईएमएफ ने यूरो क्षेत्र के लिए 0.9 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया था।
कई देशों के जंगलों में लगी भीषण आग और रिकॉर्ड तापमान
गर्मी का असर यूरोपीय देशों के जनजीवन पर भीषण रूप से दिखाई दे रहा है। ग्रीस के उत्तरी हल्किदिकी प्रायद्वीप में सिविरी और फुरका के मशहूर पर्यटन स्थलों के पास जंगलों में लगी आग रिहायशी इलाकों की तरफ बढ़ गई, जिसके बाद शुक्रवार को 200 से अधिक लोगों और पर्यटकों को सुरक्षित बाहर निकालना पड़ा।
फ्रांस के लगभग 80 विभागों में हीटवेव का अलर्ट जारी किया गया है, जहां शुक्रवार को तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने की संभावना जताई गई है। फ्रांस में इस साल जंगलों की आग से हुआ नुकसान द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से सबसे ज्यादा दर्ज किया गया है। स्पेन के मध्यवर्ती इलाकों में गुरुवार को तापमान 37 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया। वहीं ब्रिटेन में गुरुवार का दिन इस साल का सबसे गर्म दिन रहा, जहां मेट ऑफिस के अनुसार लंदन के क्यू गार्डन्स में अस्थायी तौर पर 38.1 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि सप्ताहांत में बारिश होने की संभावना जरूर है, लेकिन इससे ब्रिटेन में बने भीषण सूखे के हालात खत्म नहीं होंगे।


















