सड़क पर होने वाले हादसों या किसी भी प्रकार की भयानक दुर्घटना के बाद के शुरुआती पल किसी भी घायल व्यक्ति के भविष्य का फैसला करते हैं। अक्सर लोग केवल उन्हीं घावों को देखकर घबराते हैं जो बाहर से दिखाई देते हैं, लेकिन चिकित्सीय दृष्टि से शरीर के भीतर होने वाला नुकसान कहीं अधिक खतरनाक साबित होता है। बाहर से कोई बड़ा जख्म न दिखने पर भी मरीज के भीतर अंगों से लगातार खून बह सकता है, जो कुछ ही मिनटों में जानलेवा रूप अख्तियार कर लेता है। ऐसे आपातकालीन मामलों में समय की बर्बादी सीधे तौर पर मौत का कारण बन सकती है।
गोल्डन आवर की अहमियत और शरीर में शॉक का खतरा
चिकित्सा विज्ञान में किसी भी गंभीर चोट के तुरंत बाद के पहले साठ मिनट को गोल्डन आवर कहा जाता है। फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल के न्यूरो एनेस्थीसिया और न्यूरो क्रिटिकल केयर विभाग के प्रमुख डॉ. गौरव कक्कड़ के अनुसार, इस एक घंटे के भीतर मिलने वाला सही उपचार मरीज के जीवित बचने की संभावना को कई गुना बढ़ा देता है। जब शरीर से भारी मात्रा में रक्त बह जाता है, तब रक्तचाप में भारी गिरावट आती है और शरीर शॉक की स्थिति में चला जाता है। सिर, छाती अथवा पेट के भीतरी अंगों में लगी गहरी चोटें इस खतरनाक स्थिति को बहुत तेजी से जन्म देती हैं।
छिपी हुई अंदरूनी ब्लीडिंग और प्राथमिक उपचार का तरीका
किसी भी ट्रॉमा मरीज के लिए अनियंत्रित रक्तस्राव सबसे बड़ा जोखिम बनकर उभरता है। यदि घाव बाहरी हिस्से पर है और खून बाहर बह रहा है, तो अस्पताल ले जाते समय किसी साफ कपड़े या पट्टी की मदद से उस पर लगातार दबाव बनाकर रक्तस्राव को सीमित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके विपरीत, छाती, पेट के आंतरिक हिस्सों या जांघ जैसी बड़ी हड्डियों के टूटने पर रक्त शरीर की गुहाओं में जमा होने लगता है। बाहर से कोई निशान न दिखने के बावजूद मरीज का ब्लड प्रेशर तेजी से लुढ़कने लगता है और उसकी शारीरिक स्थिति मिनटों में नाजुक हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में किसी भी स्थानीय क्लीनिक में वक्त गंवाए बिना सीधे बहु-विशेषज्ञता वाले बड़े अस्पताल पहुंचना चाहिए।
व्यापक ट्रॉमा प्रोटोकॉल और आधुनिक जांच तकनीक
जब कोई गंभीर रूप से घायल मरीज अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचता है, तो डॉक्टर पूरे शरीर का एक साथ परीक्षण करते हैं। ट्रॉमा प्रोटोकॉल के तहत सिर से लेकर पैर तक हर अंग की स्थिति का एक सुनियोजित क्रम में आकलन किया जाता है। आधुनिक चिकित्सा उपकरणों जैसे सीटी स्कैन के जरिए मस्तिष्क, पसलियों, फेफड़ों और पेट के अंगों में हुए नुकसान की स्पष्ट तस्वीर सामने आ जाती है। यदि शरीर में रक्त की भारी कमी हो चुकी हो, तो तुरंत ब्लड ट्रांसफ्यूजन शुरू किया जाता है ताकि मरीज के अंगों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति बंद न हो। सही समय पर लिया गया त्वरित निर्णय मरीज को स्थिर करने में सबसे अहम भूमिका निभाता है।
बच्चों में ऊंचाई से गिरने की घटनाएं और रोकथाम
दुर्घटनाओं के मामलों में छोटे बच्चों को लेकर विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी जाती है। घरों में बालकनी, बिना मुंडेर वाली छत या खुली खिड़कियों से छोटे बच्चों के नीचे गिरने के मामले हर महीने चिकित्सा केंद्रों में सामने आते हैं। बच्चों के सिर और आंतरिक अंग बेहद नाजुक होते हैं, जिससे ऊंचाई से गिरने पर उन्हें जानलेवा चोटें आती हैं। अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने घरों की बालकनी, खिड़कियों और सीढ़ियों पर मजबूत सुरक्षा ग्रिल या रेलिंग लगवाएं ताकि बच्चों के नीचे गिरने की किसी भी आशंका को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
हादसे के बाद सामान्य जीवन में वापसी की उम्मीद
गंभीर दुर्घटना का शिकार होने के बाद भी मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने सामान्य कामकाज में लौट सकता है। यह पुनर्प्राप्ति इस बात पर निर्भर करती है कि दुर्घटनास्थल पर प्राथमिक सहायता किस स्तर की मिली, चोट की वास्तविक गंभीरता क्या थी और बड़े चिकित्सा केंद्र तक मरीज को कितनी तेजी से पहुंचाया गया। समय पर उन्नत चिकित्सीय हस्तक्षेप मिलने से न केवल मरीज के प्राण बचते हैं, बल्कि वह भविष्य में किसी स्थायी शारीरिक या मानसिक विकलांगता से भी सुरक्षित रह पाता है।



















