पुरुषों के शरीर में मूत्रमार्ग के ऊपरी हिस्से और ब्लैडर के बिल्कुल नीचे अखरोट के आकार की एक अहम ग्रंथि मौजूद होती है, जिसे प्रोस्टेट कहा जाता है। यह ग्रंथि पुरुष प्रजनन प्रणाली का एक अनिवार्य अंग है और वीर्य निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उम्र के 40वें पड़ाव पर पहुंचने के बाद इस ग्रंथि की कार्यप्रणाली में बदलाव आने लगते हैं और इसमें सूजन, आकार का असामान्य रूप से बढ़ना या कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं का अंदेशा काफी बढ़ जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रोजमर्रा के खानपान में सही पोषक तत्वों को शामिल करके इस ग्रंथि की कोशिकाओं को समय पूर्व होने वाले नुकसान से सुरक्षित रखा जा सकता है।
टमाटर का लाइकोपीन पहुंचाता है सुरक्षा
दैनिक भोजन में टमाटर और उससे बने खाद्य पदार्थों का उपयोग प्रोस्टेट ग्रंथि की सुरक्षा के लिए बेहद असरदार साबित होता है। टमाटर के गहरे लाल रंग की मुख्य वजह लाइकोपीन नामक एक अत्यंत शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है। यह यौगिक शरीर में मौजूद हानिकारक फ्री रेडिकल्स को बेअसर करता है और कोशिकाओं में होने वाली आंतरिक सूजन को शांत करने में मददगार साबित होता है। इसके अलावा यह असामान्य कोशिकाओं के फैलाव की रफ्तार को भी धीमा करता है। टमाटर को पकाकर खाने, जैसे कि सूप, ग्रेवी, सॉस या पेस्ट के रूप में लेने से लाइकोपीन शरीर में बेहतर तरीके से अवशोषित होता है। चिकित्सा अध्ययनों के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि भोजन में लाइकोपीन की मात्रा प्रतिदिन 2 मिलीग्राम बढ़ाने पर प्रोस्टेट कैंसर के खतरे में लगभग 1 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की जा सकती है।
सोया से तैयार खाद्य पदार्थों के फायदे
प्रोस्टेट ग्रंथि की सेहत को दुरुस्त रखने में सोयाबीन और उससे बनने वाले उत्पाद भी बेहद कारगर भूमिका निभाते हैं। टोफू, सोया मिल्क, एडामेम और मिसो जैसे पदार्थों में फाइटोएस्ट्रोजन प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं। फाइटोएस्ट्रोजन पौधों में पाए जाने वाले ऐसे प्राकृतिक तत्व हैं जो शरीर में असामान्य कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोकने या धीमा करने में मदद करते हैं। प्रोस्टेट कैंसर के जोखिम को सीमित करने में यह तत्व विशेष रूप से प्रभावी साबित हो सकता है। जिन पुरुषों के नियमित भोजन में सोयाबीन आधारित उत्पादों की पर्याप्त हिस्सेदारी होती है, उनमें कैंसर से बचाव की संभावना तुलनात्मक रूप से बेहतर देखी गई है।
क्रूसीफेरस कुल की हरी सब्जियां
ब्रोकली, पत्तागोभी, केल, बोक चॉय और ब्रसेल्स स्प्राउट्स जैसी क्रूसीफेरस परिवार की सब्जियों को भी भोजन की थाली में प्रमुख स्थान मिलना चाहिए। इन हरी सब्जियों में जरूरी विटामिन्स, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स का भंडार होता है। इनकी सबसे बड़ी खूबी इनमें पाया जाने वाला सल्फोराफेन नामक विशेष यौगिक है। सल्फोराफेन शरीर में कोशिकाओं की अनियंत्रित और अवांछित वृद्धि को थामने का काम करता है, जिससे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों को फैलने का मौका नहीं मिलता। नियमित आधार पर इन सब्जियों को अपनी खुराक का हिस्सा बनाने से प्रोस्टेट से जुड़ी घातक बीमारियों का अंदेशा काफी हद तक नियंत्रित रहता है।
ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर मछलियां
मांसाहारी विकल्प के तौर पर सैल्मन, सार्डिन, मैकेरल और हेरिंग जैसी फैटी मछलियों का सेवन प्रोस्टेट ग्रंथि के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है। इन मछलियों में ओमेगा-3 फैटी एसिड की उच्च मात्रा मौजूद होती है। यह स्वस्थ वसा न केवल दिमाग की कार्यक्षमता और आंखों की दृष्टि को दुरुस्त रखने के लिए जरूरी है, बल्कि प्रोस्टेट के ऊतकों को भी निरोगी बनाए रखती है। ओमेगा-3 फैटी एसिड शरीर के भीतर पुरानी सूजन को कम करते हैं और सामान्य कोशिकाओं की संरचना को मजबूत बनाते हैं। चिकित्सा अध्ययनों से यह सामने आया है कि जो लोग नियमित रूप से ऐसी मछलियों का सेवन करते हैं, उनमें प्रोस्टेट की पेचीदा और गंभीर बीमारियों का खतरा काफी कम पाया जाता है।
अलसी के बीजों से मिलता है पोषण
छोटे आकार के अलसी के बीज पोषण के मामले में किसी बड़े सुरक्षा कवच से कम नहीं हैं। इनमें उच्च गुणवत्ता वाला डायटरी फाइबर, ओमेगा-3 फैटी एसिड और लिग्नान जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व भारी मात्रा में पाए जाते हैं। अलसी के बीजों में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण शरीर को भीतर से मजबूती प्रदान करते हैं और अनावश्यक सूजन को घटाते हैं। इसके अलावा लिग्नान जैसे यौगिक हार्मोन के असंतुलन से पनपने वाले कैंसर के जोखिम को कम करने में भी सहायक माने गए हैं। हालांकि इसके व्यापक प्रभावों को लेकर वैज्ञानिक शोध अभी लगातार जारी हैं, फिर भी 40 पार कर चुके पुरुषों के लिए अलसी को अपनी दिनचर्या में जोड़ना सेहत के लिहाज से एक सुरक्षित और लाभकारी कदम साबित होता है।



















