एक वक्त था जब नॉन-कम्युनिकेबल क्रोनिक बीमारियां सिर्फ बुजुर्गों की समस्या मानी जाती थीं। उच्च रक्तचाप, डायबिटीज और भूलने जैसी दिक्कतें अमूल्य तौर पर उम्रदराज लोगों में ही देखने को मिलती थीं, लेकिन समय के साथ हालात बदल चुके हैं और अब बीमारियां भी अपने निशाने बदल रही हैं। आज के दौर में 20 से 30 साल के युवा हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी समस्याओं की चपेट में आ रहे हैं, और भूलने की बीमारी भी अब कम उम्र के लोगों में आम होने लगी है। जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के एक शोध में यह बात सामने आई है कि जो गंभीर बीमारियां पहले 50 या 60 साल से अधिक उम्र के लोगों को होती थीं, वे अब जवानी में ही लोगों को अपनी गिरफ्त में ले रही हैं।
गतिहीन जीवनशैली और कम उम्र में बीमारियां
इस संस्थान के प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट की डायरेक्टर एरिन मिचोस का कहना है कि कम उम्र में इन बीमारियों के पनपने की सबसे बड़ी वजह लोगों की गतिहीन दिनचर्या है। आज के समय में लोग अपना ज्यादातर वक्त बैठकर बिताते हैं, जिसकी वजह से शरीर स्थूल हो जाता है और कई प्रकार की बीमारियां आसानी से घेर लेती हैं। यही मुख्य कारण है कि आज के युवाओं में हाई कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, थायरॉयड और अल्जाइमर जैसी समस्याएं तेजी से पैर पसार रही हैं।
ब्रेन सिंकिंग की समस्या और युवा
उम्र बढ़ने के साथ, खासकर 30 से 35 साल के बाद, दिमाग का सिकुड़ना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, हालांकि यह प्रक्रिया बेहद धीमी होती है और 60 साल के बाद इसमें तेजी आती है, जिसे ब्रेन सिंकिंग कहा जाता है। दिमाग की कोशिकाएं एक बार नष्ट होने के बाद दोबारा नहीं बनती हैं, इसलिए अगर यह सिकुड़न तेजी से होने लगे तो कई गंभीर परेशानियां खड़ी हो सकती हैं। आज चिंता की बात यह है कि कुछ युवाओं में भी ब्रेन सिंकिंग की रफ्तार तेज हो गई है, जिसके लिए लोग खुद जिम्मेदार हैं। डायबिटीज, मोटापा, स्मोकिंग और अल्कोहल जैसे कई कारक इसके लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी माने जाते हैं।
टाइप 2 डायबिटीज का बढ़ता खतरा
पहले के दौर में डायबिटीज मुख्य रूप से बुजुर्गों की बीमारी हुआ करती थी, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार आज दुनिया भर में लगभग 50 करोड़ लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं। भारत को दुनिया की डायबिटीज राजधानी कहा जाता है, जहां 10 करोड़ से ज्यादा लोग इस बीमारी के मरीज हैं। इनमें से कितने ही ऐसे लोग हैं जिन्हें यह पता ही नहीं होता कि उनके शरीर के भीतर डायबिटीज की बीमारी पल रही है। डायबिटीज एक ऐसा साइलेंट किलर है जिसके शुरुआती चरण में कोई भी स्पष्ट लक्षण नजर नहीं आते हैं, इसलिए 20 साल की उम्र से ही इससे बचाव के उपाय शुरू कर देना बेहद जरूरी हो जाता है।
हाई ब्लड प्रेशर और अनसुनी चेतावनी
भारत में हर चार में से एक वयस्क हाई ब्लड प्रेशर की समस्या से पीड़ित है, जिससे आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने सारे युवा इसकी चपेट में आ चुके हैं। हाई ब्लड प्रेशर एक ऐसी बीमारी है जो धीरे-धीरे दिल को कमजोर करती है और एक दिन किसी बड़ी हृदय संबंधी बीमारी के रूप में सामने आती है। जब खून नलियों की दीवारों पर बहुत तेज दबाव डालने लगता है, तो उसे हाई ब्लड प्रेशर कहा जाता है। चूंकि इसमें भी जल्दी कोई लक्षण नहीं दिखते, इसलिए इसका अनुमान लगाना काफी कठिन होता है। हमारे देश के लोगों में नियमित रूप से बीपी की जांच कराने की आदत नहीं होती है, और जब तक बीपी के कारण शरीर अंदर से पूरी तरह खोखला नहीं हो जाता, तब तक इसकी भनक तक नहीं लगती।
स्ट्रोक और कोलोन कैंसर के बदलते आंकड़े
स्ट्रोक तब होता है जब दिमाग तक किसी न किसी वजह से ऑक्सीजन की आपूर्ति कुछ समय के लिए बाधित हो जाती है। आम तौर पर पहले स्ट्रोक की समस्या बुजुर्गों में देखी जाती थी, लेकिन आजकल 20 साल के युवा भी इसका शिकार हो रहे हैं, और तो और 18 से 34 साल की महिलाओं में भी स्ट्रोक के मामले सामने आने लगे हैं। स्ट्रोक के पीछे कई अलग-अलग वजहें हो सकती हैं, और राहत की बात यह है कि कम उम्र में स्ट्रोक होने पर यह कम जानलेवा साबित होता है, फिर भी इससे बचने के लिए एहतियात बरतना बहुत जरूरी है। इसके अलावा, हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के एक नए अध्ययन में यह भी पाया गया है कि 1980 से 1994 के बीच पैदा हुए लोगों में कोलोन कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिनमें कोलोरेक्टल कैंसर के मरीज सबसे ज्यादा होते हैं, जबकि पहले युवाओं में यह बीमारी नहीं पाई जाती थी।
बुढ़ापे की बीमारियों से बचाव के उपाय
बुढ़ापे से जुड़ी इन सभी गंभीर बीमारियों से खुद को बचाना बहुत आसान है। हमें बस अपने बुजुर्गों की जीवनशैली और उनके खान-पान को अपनाना होगा। रात में समय पर सोना और सुबह जल्दी जागना चाहिए, साथ ही कम से कम 7 से 8 घंटे की गहरी और सुकून भरी नींद लेनी चाहिए जिसमें बार-बार आंख न खुले। इसके अलावा हर रोज अपने शरीर को शारीरिक श्रम से थकाना चाहिए, भारी चीजें उठानी चाहिए, पैदल चलना चाहिए और नियमित रूप से एक्सरसाइज करनी चाहिए। खाने-पीने के मामले में प्राचीन भारतीय परंपराओं का पालन करना चाहिए और बीमारी फैलाने वाली अनहेल्दी चीजों से दूरी बनानी चाहिए। फास्ट फूड, जंक फूड, प्रोसेस्ड फूड, पिज्जा और बर्गर जैसी चीजों को आज ही अपनी डाइट से पूरी तरह हटा देना चाहिए। जितना संभव हो सके घर का बना शुद्ध और साबुत अनाज से तैयार भोजन ही खाना चाहिए। हरी पत्तेदार सब्जियों का भरपूर सेवन करने से सेहत दुरुस्त रहती है, जबकि ज्यादा चीनी और नमक के सेवन से बचना चाहिए। ताजे फलों को अपनी दिनचर्या में शामिल करें, मानसिक तनाव से दूर रहें, सामाजिक मेल-जोल को बढ़ाएं और हमेशा खुश रहने की कोशिश करें। जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के शोध और दिशानिर्देशों के बारे में अधिक जानने के लिए आप Johns Hopkins Medicine की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं।



















