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गंदे मांस पर पलती और देसी मछलियों की दुश्मन, इसीलिए भारत में 25 साल से बैन है थाई मागुरस्वास्थ्य
25 जून 2026, 8:00 pm (79 दिन पहले)· 1

गंदे मांस पर पलती और देसी मछलियों की दुश्मन, इसीलिए भारत में 25 साल से बैन है थाई मागुर

थाई मागुर यानी अफ्रीकी कैटफिश बेहद तेजी से बढ़ती और खूब बिकती है, फिर भी भारत में इसके पालन पर रोक है। जानिए सेहत और पर्यावरण से जुड़ी वो वजहें जिनके चलते साल 2000 में इस पर प्रतिबंध लगा।

मछली खाना सेहत के लिए अच्छा माना जाता है। आम धारणा है कि नियमित मछली खाने से आंखों की रोशनी जल्दी कमजोर नहीं पड़ती। इतना ही नहीं, कई मछलियां ऐसे पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं जो दिल और दिमाग दोनों के लिए जरूरी हैं, इसी वजह से इन्हें खाना फायदेमंद कहा जाता है।

देश में रोहू, कतला, इलिश और चिंगड़ी जैसी मछलियां खूब पसंद की जाती हैं, इनके अलावा भी तरह-तरह की मछलियां थाली में पहुंचती हैं। लेकिन हर मछली सेहत के लिए अच्छी हो, यह जरूरी नहीं। कुछ प्रजातियां इतनी खतरनाक मानी जाती हैं कि उनसे दूरी ही बेहतर है। थाई मागुर इसी तरह की एक मछली है।

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आखिर है क्या यह थाई मागुर

गहरे रंग की यह मछली देखने में आसानी से पहचानी जा सकती है। इसके मुंह के पास लंबी मूंछ जैसी संरचनाएं होती हैं और खास बात यह है कि बहुत कम ऑक्सीजन वाले पानी में भी यह जिंदा रह लेती है। दरअसल यह एक विदेशी प्रजाति की कैटफिश है, जिसे क्लेरियास गैरीपिनस या अफ्रीकी कैटफिश के नाम से भी जाना जाता है। यह तेज रफ्तार से बढ़ती है और मुश्किल से मुश्किल हालात में भी टिकी रहती है। भारत में इसके पालन पर रोक लगाई जा चुकी है।

सेहत और पर्यावरण, दोनों के लिए खतरा

मछली पालन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक यह मछली सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, बल्कि इंसानी सेहत के लिहाज से भी नुकसानदायक मानी जाती है। कुछ अध्ययनों और विशेषज्ञों का कहना है कि इसे खाने से गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। यही कारण है कि लोगों को इसके नुकसान के बारे में सचेत करने के लिए समय-समय पर जागरूकता अभियान भी चलाए जाते हैं।

साल 2000 में क्यों लगा प्रतिबंध

भारत में इस मछली के पालन पर साल 2000 में रोक लगाई गई थी। इसकी सबसे बड़ी वजह इसका मांसाहारी और आक्रामक स्वभाव है। यह स्थानीय मछलियों का भोजन और उनका ठिकाना दोनों हड़प लेती है, जिससे देसी मछलियों की संख्या पर सीधा असर पड़ता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह प्राकृतिक जलाशयों में फैल गई, तो नदियों, तालाबों और झीलों का पूरा पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है।

गंदे मांस पर पलने की समस्या

थाई मागुर के साथ एक और बड़ी दिक्कत यह है कि कई जगहों पर इसे खराब या सड़ा हुआ मांस खिलाकर पाला जाता है। इतना ही नहीं, यह कुछ परजीवियों और बीमारियों को फैलाने की क्षमता भी रखती है, जो दूसरी मछलियों और जलीय जीवों के लिए खतरा बन सकते हैं। तेजी से बढ़ने और खूब बिकने के बावजूद यही वे कारण हैं जिनकी वजह से यह मछली आज भी भारत में प्रतिबंधित है।

सवाल-जवाब

थाई मागुर मछली क्या है?
यह एक विदेशी प्रजाति की कैटफिश है, जिसे क्लेरियास गैरीपिनस या अफ्रीकी कैटफिश भी कहा जाता है। यह गहरे रंग की होती है और कम ऑक्सीजन वाले पानी में भी जिंदा रह सकती है।
भारत में थाई मागुर पर कब प्रतिबंध लगा?
साल 2000 में भारत में इस मछली के पालन पर प्रतिबंध लगाया गया था।
इस मछली पर बैन क्यों लगाया गया?
यह मांसाहारी और आक्रामक स्वभाव की है और स्थानीय मछलियों का भोजन व आवास हड़प लेती है, जिससे देसी मछलियों की संख्या और पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित होता है।
क्या थाई मागुर खाना सेहत के लिए नुकसानदायक है?
मछली पालन विभाग के अधिकारियों और कुछ अध्ययनों के मुताबिक इसे खाने से गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
इस मछली को कैसे पाला जाता है?
कई जगहों पर इसे खराब या सड़ा हुआ मांस खिलाकर पाला जाता है, साथ ही यह कुछ परजीवियों और बीमारियों को भी फैला सकती है।
इस मछली को कैसे पहचानें?
यह गहरे रंग की होती है, इसके मुंह के पास लंबी मूंछ जैसी संरचनाएं होती हैं और यह बेहद तेजी से बढ़ती है।
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