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कम उम्र में भी बढ़ रहा ब्रेन स्ट्रोक का खतरा, न्यूरोसर्जन ने बताया कैसे बी फास्ट फॉर्मूला बचा सकता है जानस्वास्थ्य
28 अक्तू॰ 2026, 11:23 am (2 घंटे पहले)· 2

कम उम्र में भी बढ़ रहा ब्रेन स्ट्रोक का खतरा, न्यूरोसर्जन ने बताया कैसे बी फास्ट फॉर्मूला बचा सकता है जान

ब्रेन स्ट्रोक अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है बल्कि दस से पंद्रह साल के बच्चों में भी इसके मामले देखे जा रहे हैं। समय रहते लक्षणों की पहचान और शुरुआती एक घंटे में इलाज से लकवे का खतरा टल सकता है।

ब्रेन स्ट्रोक को लंबे समय से बुजुर्गों से जुड़ी स्वास्थ्य समस्या माना जाता रहा है, मगर अब चिकित्सा जगत के सामने ऐसे कई मामले आ रहे हैं जो इस पुरानी धारणा को पूरी तरह तोड़ते हैं। कम उम्र के बच्चों और युवाओं में भी मस्तिष्क आघात के गंभीर मामले दर्ज किए जा रहे हैं। दस से पंद्रह वर्ष की उम्र के बच्चों में भी इस तरह की मेडिकल इमरजेंसी सामने आ रही है, जिसे देखकर विशेषज्ञ भी हैरान हैं। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति का अचानक संतुलन बिगड़ जाए, नजर कमजोर पड़ जाए, चेहरे की बनावट में टेढ़ापन दिखे, हाथ या पैर बेजान महसूस हों अथवा बोलने में दिक्कत आने लगे, तो इन संकेतों को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर इन शुरुआती लक्षणों को पहचानकर मरीज को सही अस्पताल पहुंचाने से न केवल जिंदगी बचाई जा सकती है, बल्कि हमेशा के लिए होने वाले लकवे और अन्य जटिलताओं से भी बचा जा सकता है।

मस्तिष्क में क्यों और कैसे होता है आघात

मेडिवर्सल हॉस्पिटल में बतौर सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोसर्जन कार्यरत डॉ. मनीष कुमार धीरज के अनुसार, दिमाग के किसी हिस्से में जब खून का संचार अचानक रुक जाता है अथवा कोई नस फट जाती है, तब स्ट्रोक की गंभीर स्थिति पैदा होती है। मस्तिष्क शरीर के तमाम अंगों की गतिविधियों को नियंत्रित करता है। जिस हिस्से में रक्त आपूर्ति बाधित होती है, उससे जुड़ा शरीर का अंग काम करना बंद कर देता है या कमजोर पड़ जाता है। इसी वजह से मरीज को लकवा, हाथ या पैर में भारी कमजोरी, भाषा एवं वाणी से जुड़ी समस्याएं और कई न्यूरोलॉजिकल विकारों का सामना करना पड़ता है।

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डॉक्टर ने स्पष्ट किया कि स्ट्रोक मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बंटा होता है। पहला होता है इस्केमिक स्ट्रोक, जो तब होता है जब दिमाग की किसी रक्त वाहिका में खून का थक्का जम जाता है और रक्त प्रवाह में रुकावट आ जाती है। दूसरा प्रकार हेमरेजिक स्ट्रोक कहलाता है, जिसमें उच्च दबाव या किसी कमजोरी के चलते नस फट जाती है और मस्तिष्क के अंदरूनी हिस्से में रक्तस्राव शुरू हो जाता है। दोनों तरह के स्ट्रोक में आपातकालीन जांच बेहद आवश्यक होती है, क्योंकि इस्केमिक स्ट्रोक और हेमरेजिक स्ट्रोक की उपचार प्रक्रियाएं एक-दूसरे से पूरी तरह अलग होती हैं। एक में खून का थक्का घोलने का प्रयास किया जाता है, जबकि दूसरे में बहते खून और दबाव को रोकना सबसे अहम होता है।

स्ट्रोक की पहचान के लिए बी फास्ट का छह अक्षरीय नियम

न्यूरोसर्जन ने लोगों को स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों को तुरंत भांपने के लिए बी फास्ट का स्मरण रखने की सलाह दी है। इस संक्षिप्त शब्द के हर अक्षर में एक जीवन रक्षक संकेत छिपा हुआ है।

बी का अर्थ है बैलेंस यानी शारीरिक संतुलन। यदि किसी व्यक्ति को अचानक चलने में भारी परेशानी हो रही हो, उसका शरीर लड़खड़ाने लगे या अंगों के बीच का तालमेल अचानक गड़बड़ा जाए, तो यह स्ट्रोक की दस्तक हो सकती है।

ई का मतलब है आइज यानी आंखें। दृष्टि में अचानक धुंधलापन आना, किसी एक या दोनों आंखों से कम दिखाई देना अथवा सामने की चीजें दोहरी नजर आना इस बात का इशारा है कि मस्तिष्क के देखने वाले केंद्र तक रक्त ठीक से नहीं पहुंच पा रहा है।

एफ का मतलब है फेस यानी चेहरा। यदि मरीज के चेहरे का एक हिस्सा अचानक नीचे की ओर लटक जाए या मुस्कुराने की कोशिश करने पर मुंह एक तरफ खिंचता हुआ या टेढ़ा नजर आए, तो यह बेहद गंभीर खतरे का संकेत है।

ए का मतलब है आर्म्स यानी हाथ और पैर। मरीज के हाथ या पैर में अचानक सुन्नपन आ जाना, मांसपेशियां कमजोर हो जाना या एक हाथ को ऊपर उठाने में असमर्थ होना स्ट्रोक की पुख्ता आशंका को दर्शाता है।

एस का मतलब है स्पीच यानी बोलचाल। यदि बातचीत करते समय आवाज लड़खड़ाने लगे, शब्दों का स्पष्ट उच्चारण न हो पाए अथवा व्यक्ति सामने वाले की सामान्य बात को भी समझने में असमर्थ दिखे, तो यह दिमाग के वाणी केंद्र पर आघात की निशानी है।

टी का तात्पर्य है टाइम यानी समय। जैसे ही ऊपर बताए गए किसी भी लक्षण की पुष्टि हो, बिना एक भी पल गंवाए तुरंत एंबुलेंस बुलानी चाहिए और मरीज को ऐसे चिकित्सा संस्थान ले जाना चाहिए जहां स्ट्रोक प्रबंधन की मुकम्मल व्यवस्था हो।

गोल्डन आवर की अहमियत और थ्रोम्बोलिसिस थेरेपी

स्ट्रोक के प्रबंधन में हर मिनट कीमती होता है और न्यूरोलॉजी में इसी कारण समय ही दिमाग है का सिद्धांत माना जाता है। इलाज शुरू होने में जितनी देर होगी, मस्तिष्क की जीवित कोशिकाएं उतनी ही तेजी से नष्ट होंगी। जब मरीज शुरुआती एक घंटे के भीतर यानी गोल्डन आवर में अस्पताल पहुंच जाता है, तो डॉक्टरों के पास उसे बचाने और सामान्य स्थिति में लौटाने के सबसे बेहतर अवसर होते हैं।

अस्पताल पहुंचते ही मरीज का तत्काल सीटी स्कैन अथवा एमआरआई कराया जाता है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि समस्या नस में ब्लॉकेज के कारण है या नस फटने से रक्तस्राव हुआ है। जांच में इस्केमिक स्ट्रोक की पुष्टि होने पर और तय चिकित्सा मानकों के अनुकूल पाए जाने पर मरीज को नस के जरिए आईवी थ्रोम्बोलिसिस थेरेपी दी जाती है। इस थेरेपी में विशेष दवाओं की मदद से रक्त वाहिका में फंसे खून के थक्के को तेजी से घोलने का काम किया जाता है। अगर यह उपचार सही समय सीमा के भीतर योग्य मरीज को मिल जाए, तो मस्तिष्क में रक्त प्रवाह दोबारा सुचारू हो जाता है और पक्षाघात के लक्षण बहुत हद तक खत्म हो सकते हैं।

बच्चों और युवाओं में बढ़ते मामलों पर विशेषज्ञ की चिंता

स्ट्रोक के आंकड़े अब उम्र के पुराने दायरों को पार कर रहे हैं। डॉ. मनीष कुमार धीरज ने अपने क्लिनिकल अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने स्ट्रोक से पीड़ित सबसे कम उम्र का मरीज महज दस साल का बच्चा देखा है। दस से पंद्रह साल के बच्चों में स्ट्रोक की पुष्टि होना बेहद अचरज में डालने वाला और चिंताजनक विषय है।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि तीन दिन के नवजात शिशु में भी उन्होंने ब्रेन हेमरेज का मामला देखा है, हालांकि उसे सामान्य स्ट्रोक की श्रेणी में न रखकर जन्मजात या नवजात से जुड़ी अलग चिकित्सकीय जटिलता के तहत माना जाता है। कम उम्र के बच्चों और किशोरों में इस तरह के न्यूरोलॉजिकल खतरे आखिर क्यों बढ़ रहे हैं, इसके कारणों की तह तक जाने के लिए चिकित्सा विज्ञान के स्तर पर और अधिक गहन शोध की दरकार है।

बचाव के लिए जरूरी सावधानियां और जीवनशैली में बदलाव

स्ट्रोक के जोखिम को काफी हद तक अपनी दिनचर्या और स्वास्थ्य की नियमित निगरानी से नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए कुछ बुनियादी आदतों को जीवन का हिस्सा बनाना जरूरी है

  • ब्लड प्रेशर की नियमित जांच कराएं और यदि रक्तचाप बढ़ा हुआ आए तो चिकित्सक के परामर्श के अनुसार दवाएं लेकर उसे सामान्य बनाए रखें।
  • समय-समय पर ब्लड शुगर और लिपिड प्रोफाइल यानी कोलेस्ट्रॉल की जांच करवाएं ताकि धमनियों में जमाव न हो सके।
  • धूम्रपान, सिगरेट और किसी भी प्रकार के तंबाकू उत्पादों के सेवन से पूरी तरह दूरी बनाकर रखें।
  • मोटापा होने की स्थिति में संतुलित खानपान अपनाएं और नियमित कसरत के जरिए अपने वजन को संतुलित दायरे में रखें।
  • दैनिक जीवन में शारीरिक गतिविधियां बढ़ाएं और मानसिक तनाव को कम करने के लिए योग या ध्यान का सहारा लें।
  • प्रतिदिन पर्याप्त नींद लें और सोने-जागने का एक नियमित रूटीन बनाकर रखें।
  • स्ट्रोक के लक्षण दिखते ही देसी टोटकों, तेल मालिश या झाड़-फूंक में वक्त बर्बाद किए बिना मरीज को तत्काल न्यूरोलॉजी सुविधा वाले अस्पताल पहुंचाएं।

डॉ. मनीष कुमार धीरज का कहना है कि एक बार स्ट्रोक हो जाने के बाद मरीज को उबारने में अत्यधिक समय, परिवार की ऊर्जा और आर्थिक संसाधनों का बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है। इसका गंभीर असर केवल पीड़ित पर ही नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार के जीवन पर पड़ता है। इसलिए समझदारी इसी में है कि जोखिम भरे कारणों को समय रहते पहचाना जाए और रोकथाम पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाए।

सवाल-जवाब

बी फास्ट (BE FAST) का पूरा नाम क्या है?
बी फास्ट में बी का मतलब बैलेंस, ई से आईज, एफ से फेस, ए से आर्म्स, एस से स्पीच और टी से टाइम है।
स्ट्रोक में गोल्डन आवर किसे कहा जाता है?
लक्षण दिखने के बाद शुरुआती एक घंटे के समय को गोल्डन आवर कहते हैं, जिसमें सही इलाज मिलने से मस्तिष्क को नुकसान से बचाया जा सकता है।
स्ट्रोक के दो मुख्य प्रकार कौन से हैं?
स्ट्रोक दो तरह का होता है, पहला रक्त वाहिका में थक्का जमने से होने वाला इस्केमिक स्ट्रोक और दूसरा नस फटने से होने वाला हेमरेजिक स्ट्रोक।
क्या छोटे बच्चों को भी स्ट्रोक हो सकता है?
हां, विशेषज्ञ के अनुसार दस से पंद्रह साल के बच्चों में भी स्ट्रोक देखा गया है और सबसे कम उम्र का मरीज दस वर्ष का बच्चा रहा है।
आईवी थ्रोम्बोलिसिस थेरेपी का क्या काम होता है?
यह थेरेपी इस्केमिक स्ट्रोक के मरीजों में नस के जरिए दवा देकर दिमाग की रक्त वाहिका में बने खून के थक्के को घोलने का काम करती है।
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टिप्पणियाँ 4

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·1 घंटे पहले

दस-पंद्रह साल के बच्चों में स्ट्रोक की बात थोड़ी हजम नहीं होती। बुजुर्गों की बीमारी को अब बच्चों से जोड़ना डरावना तो है, पर कहीं डॉक्टर सिर्फ लाइफस्टाइल को ही इसके पीछे की अकेली वजह मानकर कोई और अंदरूनी बात तो नहीं छुपा रहे?

Riya Menon@riya-menon·1 घंटे पहले

राजेश जी, बच्चों में ये सब सुनना वाकई डरावना है। कल ही मेरे भतीजे ने बहुत सिरदर्द और चक्कर की शिकायत की थी, ये पढ़कर दिल बैठ सा गया।

Nyra Kaif@nyra-kaif·1 घंटे पहले

दस-पंद्रह साल के बच्चों में स्ट्रोक की बात थोड़ी अजीब लग रही है। आजकल की लाइफस्टाइल खराब है, मानती हूँ, पर इतनी छोटी उम्र में दिमाग की नसें फटने की बात पर पूरा यकीन करना मुश्किल सा लगता है।

Vikram Yadav@vikram-yadav·1 घंटे पहले

नयारा जी, बात चौंकाने वाली जरूर है, पर पिछले साल पटना के एक अस्पताल में मैंने खुद 14 साल के बच्चे को स्ट्रोक के बाद बेड पर देखा था।

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