दिनभर की व्यस्त दिनचर्या में मुस्कुराते रहना, दफ्तर का काम निपटाना और घर परिवार के बीच सामान्य दिखना हमेशा मानसिक शांति का सबूत नहीं होता. कई बार इंसान दुनिया के सामने अपनी हर जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा होता है, मगर भीतर ही भीतर एक गहरा अकेलापन और खालीपन उसे घेरे रहता है. जिन शौक और गतिविधियों से पहले खुशी मिलती थी, अचानक उनसे लगाव खत्म होने लगता है. इसे महज सामान्य उदासी मानकर टाल देना सही नहीं है, क्योंकि लगातार बना रहने वाला तनाव और मानसिक थकावट मन को पूरी तरह खोखला कर सकती है. फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल के मनोचिकित्सा विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. गायत्री भाटिया के अनुसार मानसिक संकट हमेशा रोने या चीखने के रूप में ही सामने नहीं आता, बल्कि अक्सर इंसान खुद यह समझ ही नहीं पाता कि वह किसी गंभीर भावनात्मक उथल-पुथल से जूझ रहा है.
हंसी के पीछे छुपा भीतरी खालीपन और इसके लक्षण
जब कोई इंसान नियमित रूप से काम पर जा रहा हो, घरेलू जिम्मेदारियां पूरी कर रहा हो और बातचीत में भी शामिल हो, तब भी उसके भीतर एक अजीब सूनापन घर कर सकता है. इस स्थिति को चिकित्सा विज्ञान में भावनात्मक सुन्नता या भावनात्मक थकान के रूप में देखा जाता है. इसमें पुराने पसंदीदा कामों से मन उचटने लगता है और जीवन नीरस लगने लगता है. इसके संकेत अचानक नहीं, बल्कि बेहद धीमी गति से उभरते हैं. व्यक्ति में बात-बात पर झुंझलाहट और चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है, दूसरों से आत्मीयता से जुड़ना मुश्किल हो जाता है और धीरे-धीरे अपने सबसे करीबी रिश्तेदारों या दोस्तों से भी एक अनचाही भावनात्मक दूरी बनने लगती है. सबसे जटिल बात यह होती है कि व्यक्ति को भीतरी सहारे या मदद की सख्त जरूरत महसूस होती है, लेकिन वह अपनी बात किसी के सामने रखने में असमर्थ रहता है.
लगातार तनाव और खुद की अनदेखी से बढ़ता है संकट
दौड़ती-भागती जिंदगी में लोग अक्सर अपने करियर और सामाजिक कर्तव्यों के चक्कर में अपनी मानसिक और भावनात्मक भलाई को पीछे धकेल देते हैं. दुख और तनाव को किनारे रखकर हर परिस्थिति में केवल अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करते रहना एक आदत बन जाती है. कई बार दूसरों की खुशी या अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए इंसान लगातार ऐसे काम करता चला जाता है, जिनसे उसे खुद तनिक भी खुशी नहीं मिलती. जब अपनी बुनियादी भावनात्मक जरूरतों और भावनाओं को लगातार दबाया जाता है, तो मस्तिष्क और मन दोनों ही प्रतिक्रिया देना बंद करने लगते हैं. लगातार अपनी उपेक्षा करने का यही सिलसिला अंततः भारी मानसिक थकान और गहरी भावनात्मक शून्यता का रूप ले लेता है.
शारीरिक थकान और मानसिक सुन्नता का आपसी संबंध
मन का तनाव कभी भी केवल विचारों तक सीमित नहीं रहता, उसका सीधा असर पूरे शरीर के तंत्र पर पड़ता है. रात में सात से आठ घंटे की पूरी नींद लेने के बाद भी अगर सुबह उठते ही शरीर में भारी थकान और सुस्ती बनी रहे, तो यह मानसिक दबाव का संकेत हो सकता है. इसके अलावा बिना किसी स्पष्ट बीमारी के पेट खराब रहना, पाचन में गड़बड़ी होना और लगातार चिड़चिड़ापन रहना भी इसी स्थिति से जुड़ा होता है. कई लोग इन लक्षणों से परेशान होकर विभिन्न तरह की शारीरिक जांचें करवाते हैं और दवाइयां लेते हैं, फिर भी उनकी यह बेचैनी और थकावट दूर नहीं होती. चूंकि इन शारीरिक दिक्कतों के पीछे अन्य चिकित्सकीय कारण भी हो सकते हैं, इसलिए किसी विशेषज्ञ से सलाह लेकर सही कारण की पहचान करना जरूरी होता है.
विशेषज्ञ से परामर्श लेने का सही समय
अगर किसी व्यक्ति को काफी लंबे समय से किसी भी बात पर खुशी का अहसास न हो रहा हो, मन भारी होने के बावजूद आंखों से आंसू न निकल पा रहे हों, छोटी-छोटी बातों पर तीव्र गुस्सा आने लगा हो या फिर शरीर हर समय थका-थका रहने लगे, तो इन संकेतों को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. जब इंसान इस अंदरूनी खालीपन और दबाव से बचने के लिए शराब, सिगरेट या अन्य नुकसानदेह चीजों का सहारा लेने लगता है, तो यह स्थिति और भी गंभीर मानी जाती है. ऐसे समय में किसी योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना अनिवार्य हो जाता है. शराब या अन्य नशीले पदार्थों के जरिए तनाव से राहत पाने का प्रयास केवल कुछ समय का भ्रम पैदा करता है और आगे चलकर यह आदत शरीर तथा मस्तिष्क दोनों को और अधिक नुकसान पहुंचाती है.























