बड़ी कंपनियों में करियर की होड़ और हर काम के लिए तय समयसीमा आज शहरी कामकाजी युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रही है। महानगरों में रहने वाले युवा पेशेवर अक्सर निजी जिम्मेदारियों और दफ्तर की अपेक्षाओं के दोहरे बोझ तले दब जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में कई दफा छोटी रुकावटें भी मन के भीतर विशाल संकट का रूप ले लेती हैं। महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के डिप्टी डीन गौरव ठाकुर ने मानसिक उलझन की इस अवस्था की तुलना धुंधले प्रकाश में पड़ी किसी रस्सी को भ्रमवश सांप मान लेने के अनुभव से की है। उनके मुताबिक किसी विकट परिस्थिति की आशंका वास्तविक घटना से कहीं अधिक डरावनी प्रतीत होने लगती है, जिसका यह अर्थ कतई नहीं है कि व्यक्ति की चिंताएं काल्पनिक हैं। वास्तविक मानसिक परेशानियों को गंभीरता से आंकना और समय रहते सलाहकारों की शरण में जाना बेहद आवश्यक कदम है।
महत्वाकांक्षाओं की तेज रफ्तार और मनोवैज्ञानिक दबाव
शहरी वातावरण में कम समय के भीतर अधिक उपलब्धियां हासिल करने की अंधी दौड़ मानसिक तनाव की एक प्रमुख वजह बनकर उभरती है। जब कोई कर्मी लगातार अपने ही बनाए ऊंचे पैमानों पर खरा उतरने की जद्दोजहद में लगा रहता है, तो उसका आंतरिक संतुलन बिगड़ने लगता है। ऐसे दौर में यह जरूरी हो जाता है कि इंसान अपने विचारों का निष्पक्ष विश्लेषण करे और संकट के मूल स्रोत की पहचान करे। स्थानीय स्तर पर कार्यरत पेशेवर शिवम यादव का अनुभव है कि मानसिक हलचल बढ़ने पर शांत बैठकर आत्ममंथन करना फायदेमंद रहता है। जरूरत से ज्यादा सोचने के जाल में फंसने के स्थान पर कठिनाई के व्यावहारिक समाधान तलाशने की मानसिकता बनानी चाहिए।
संवाद का महत्व और नियमित योग अभ्यास
योग के क्षेत्र से जुड़े प्रशिक्षक पीयूष, सुधीर और निकिता का विश्लेषण है कि मानसिक दबाव का सामना करने की पहली सीढ़ी परेशानी के मूल कारण को खोजना है। जब व्यक्ति यह स्पष्ट जान लेता है कि तनाव कहां से उपज रहा है, तब उससे उबरने की राह अपने आप आसान होने लगती है। इसके लिए नियमित रूप से खुद के साथ वक्त बिताना और जरूरी सवाल पूछना अनिवार्य है। यदि अपनी समझ से कोई रास्ता न सूझ रहा हो, तो परिवार के सदस्यों, आत्मीय मित्रों, गुरुओं अथवा किसी अन्य विश्वसनीय व्यक्ति से दिल की बात साझा कर लेनी चाहिए। सामाजिक जुड़ाव इंसान को अकेलापन महसूस नहीं होने देता और दूसरों के तजुर्बे से कई जटिल गुत्थियां सुलझ जाती हैं।
इसी संदर्भ में सुहेल का मानना है कि दैनिक दिनचर्या में ध्यान, योगाभ्यास और चित्त को स्थिर रखने की विधियां तनाव को नियंत्रित करने में अत्यंत प्रभावी साबित होती हैं। जब भी कोई असमंजस सामने आए, तो हड़बड़ी में कदम उठाने के बजाय स्थिति का पूरा खाका समझना चाहिए। भावातीत ध्यान की इंडिया हेड शिक्षिका अदिति श्रीवास्तव ने रेखांकित किया कि तनाव के कारक हर शख्स की निजी परिस्थितियों के हिसाब से भिन्न हो सकते हैं। कई बार लोग अपनी नुकसानदेह आदतों से भलीभांति वाकिफ होते हैं, फिर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते। ऐसी दशा में व्यावहारिक तौर-तरीके अपनाना और उनका सतत अभ्यास करना ही कारगर उपाय है। मानसिक स्वास्थ्य के इसी महत्व को केंद्र में रखते हुए स्पिरिचुअल रीजेनेरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया तथा महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी ने संयुक्त रूप से एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया। इसके तहत ‘तनाव से ठहराव की ओर’ नाम से एक नई मुहिम शुरू की गई है, जिसके जरिए विभिन्न कामकाजी स्थलों पर जाकर कर्मचारियों के लिए विशेष जागरूकता सत्र संचालित किए जाएंगे।
चेतावनी भरे लक्षण और विशेषज्ञ परामर्श की आवश्यकता
मानसिक व्याधियों को केवल नजरअंदाज कर देना या यह सोचना कि सिर्फ सकारात्मक नजरिया रखने भर से सब ठीक हो जाएगा, बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज़, मेदांता हॉस्पिटल से जुड़ी क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट मुस्कान त्रिखा के अनुसार मानसिक परेशानी के भौतिक संकेतों को पहचानना जरूरी है। मन में लगातार उदासी छाई रहना, अकारण घबराहट होना, भूख अथवा नींद के चक्र में गंभीर बदलाव आना और काम पर मन न लगना ऐसे लक्षण हैं जो अनदेखे नहीं किए जाने चाहिए। इन परिस्थितियों से बाहर आने के लिए किसी करीबी से खुलकर बात करना, व्यवस्थित दिनचर्या का पालन करना, भरपूर नींद लेना और शारीरिक व्यायाम अपनाना मददगार सिद्ध होता है।
सामान्य जिंदगी में कभी-कभार उदास होना या तनाव महसूस करना कोई असामान्य बात नहीं है। लेकिन यदि यह स्थिति कई हफ्तों तक लगातार बनी रहे, तो इसे साधारण मानकर टालना खतरे की घंटी है। जब पहले आनंद देने वाले कामों से पूरी तरह मन उचट जाए, दिनभर थकान और मायूसी का अहसास रहे, अथवा सामान्य काम निपटाना भी भारी लगने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि मानसिक सेहत को तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे गंभीर मोड़ों पर किसी मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक से संपर्क साधने में देरी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हालात बिगड़ने से पहले उठाया गया कदम ही बचाव का सबसे मजबूत रास्ता है।



















