रसायन विज्ञान की दृष्टि से देखें तो शराब मूल रूप से एथेनॉल या इथाइल अल्कोहल का एक रूप है, जिसमें कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के तत्व होते हैं। इसे उपभोग योग्य बनाने के लिए पानी की भारी मात्रा मिलाई जाती है। इसके अलावा किण्वन यानी फर्मटेंशन प्रक्रिया के दौरान फलों से बनने वाले एस्टर का इस्तेमाल बेहद कम मात्रा में किया जाता है ताकि फलों जैसा जायका मिल सके। स्वाद और सुगंध को बेहतर बनाने के लिए एल्डिहाइड और फूसेल्स भी जोड़े जाते हैं। अगर यह प्रक्रिया लकड़ी के पीपों के भीतर की जाती है, तो इसमें टैनिन भी प्राकृतिक रूप से आ जाता है। एथेनॉल तैयार करने का एक तयशुदा वैज्ञानिक फॉर्मूला होता है, लेकिन जब इसमें खतरनाक मिथेनॉल की मिलावट की जाती है, तो स्थिति बेहद गंभीर और जानलेवा हो जाती है। इस पूरी प्रक्रिया पर हमने मैक्स हेल्थकेयर के इंटरनल मेडिसिन के डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. प्रभात रंजन सिन्हा से बातचीत की और यह समझने की कोशिश की कि आखिर यह पेय शरीर के भीतर पहुंचकर ऐसा क्या करता है जिससे लोगों की जान चली जाती है।
क्या हर तरह की शराब जहर होती है
डॉ. प्रभात रंजन सिन्हा ने इस बारे में स्पष्ट किया कि सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि यदि मानक विधियों से तैयार इथेनॉल को कोई व्यक्ति सीमित मात्रा में लेता है, तो शरीर के भीतर उसके जहर बनने की आशंका न के बराबर होती है। असल समस्या तब पैदा होती है जब उस इथेनॉल के साथ मिथाइल अल्कोहल को बाहर से मिला दिया जाता है। इस तरह की अवैध और सस्ती शराब को बिना किसी तय फॉर्मूले के चोरी-छिपे तैयार किया जाता है। ऐसी घटिया क्वालिटी की शराब में नौसादर जैसी कई सस्ती चीजें मिलाई जाती हैं, जो रिएक्शन के बाद मिथाइल अल्कोहल का निर्माण करती हैं। यह मिथाइल अल्कोहल अपने आप में शुद्ध जहर है जो पेट के अंदर पहुंचते ही फॉर्मलाडेहाइड और फॉर्मिक एसिड में तब्दील हो जाता है। यह खतरनाक मिश्रण सीधे मानव तंत्रिका तंत्र, लिवर और आंखों की नसों पर प्रहार करता है, जिसका परिणाम जानलेवा साबित हो सकता है। डॉक्टर सिन्हा ने यह भी जोड़ा कि वैसे तो स्वास्थ्य के लिहाज से किसी भी प्रकार की मदिरा मुफीद नहीं है, लेकिन जो जहरीली शराब बेची जाती है, वह असल में शराब होती ही नहीं है क्योंकि उसमें सीधे तौर पर मिथाइल अल्कोहल मिला होता है।
जहर शरीर के अंगों को किस तरह तबाह करता है
मानक शराब जब पेट में जाती है तो लिवर द्वारा उसे मेटाबोलाइज किया जाता है। लिवर अपने विभिन्न एंजाइमों की मदद से इथाइल अल्कोहल को तोड़कर एसीटैल्डिहाइड में बदल देता है, जो नुकसानदेह तो है लेकिन जानलेवा नहीं। इसके विपरीत, जब पेय पदार्थ में मिथाइल अल्कोहल मिला होता है, तो वह सबसे पहले फॉर्मलाडेहाइड और फिर फॉर्मिक एसिड का रूप ले लेता है। ये दोनों ही तत्व अत्यधिक जहरीले और कैंसर पैदा करने वाले होते हैं। फॉर्मलाडेहाइड बहुत ज्यादा खतरनाक होता है जो तुरंत लिवर की कोशिकाओं को नष्ट करना शुरू कर देता है। इसके कारण लिवर फेल्योर हो सकता है, आंतें फट सकती हैं और आंखों की ऑप्टिक नर्व बुरी तरह टूट सकती है। यह ब्लड ब्रेन बैरियर को भी पार कर जाता है, जिसकी वजह से दिमाग की नसें डैमेज होने लगती हैं। मरीज को पेरिटोनाइटिस की शिकायत हो सकती है जिसमें पेट की अंदरूनी परत में जानलेवा सूजन पैदा हो जाती है। इस स्थिति में पीड़ित को मिर्गी के दौरे आने लगते हैं, उल्टियां होती हैं और वह बेहोश तक हो जाता है। किडनी, लिवर और हृदय जैसे शरीर के तमाम मुख्य अंग इससे क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। खून में घुलने के बाद फॉर्मिक एसिड कोशिकाओं के भीतर मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया को निष्क्रिय कर देता है। यही माइटोकॉन्ड्रिया शरीर को ऊर्जा प्रदान करने का काम करता है। इसके बंद होने से कोशिकाएं ऑक्सीजन का उपयोग नहीं कर पाती हैं और शरीर में मेटाबॉलिक एसिडोसिस यानी खतरनाक तेजाब बनने लगता है। मस्तिष्क की कोशिकाओं को ऑक्सीजन मिलना बंद होने पर सांस की गति रुक जाती है और इंसान कोमा में चला जाता है।
क्या पीने से पहले नकली शराब की पहचान की जा सकती है
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि यदि बाजार में जहरीली शराब आ जाए, तो आम आदमी के लिए खुद से उसकी पहचान करना लगभग असंभव होता है। इसकी असली सच्चाई का पता लगाने के लिए प्रयोगशाला परीक्षण की आवश्यकता होती है। यदि कोई व्यक्ति घटिया दर्जे की अवैध शराब खरीदता है, तो उसे पीने से पहले या उसके स्वाद के आधार पर यह पता लगाने का कोई भी व्यावहारिक तरीका नहीं है कि उसमें जहर मिला है या नहीं। इसे केवल चखकर या देखकर पहचाना नहीं जा सकता है।
कितनी मात्रा शरीर के लिए घातक साबित होती है
डॉक्टर सिन्हा बताते हैं कि यदि शराब में मिथाइल अल्कोहल की मिलावट की गई है, तो उसकी जरा सी मात्रा भी जहर के समान है क्योंकि मिथाइल अल्कोहल अपने आप में पूर्ण विष है। लोगों पर इसके असर में भिन्नता हो सकती है जिसके पीछे कई कारक जिम्मेदार हो सकते हैं। मुमकिन है कि किसी व्यक्ति का चयापचय यानी मेटाबॉलिज्म बहुत सक्रिय हो जो इस जहर को जल्दी से परिवर्तित कर शरीर से बाहर निकालने का प्रयास करे, लेकिन यदि घटक मिथाइल अल्कोहल है तो उसका दुष्प्रभाव हर शरीर पर पड़ेगा। फर्क सिर्फ इतना हो सकता है कि किसी पर असर कम हो और किसी पर ज्यादा। जिस व्यक्ति के शरीर के भीतर मिथाइल अल्कोहल की जितनी अधिक मात्रा जाएगी, उसके अंग उतनी ही तेजी से क्षतिग्रस्त होंगे।
बचाव के लिए क्या सावधानियां जरूरी हैं
डॉक्टर प्रभात रंजन सिन्हा की सलाह है कि सबसे बेहतर और आदर्श स्थिति यही है कि शराब का सेवन बिल्कुल न किया जाए क्योंकि यह हर प्रकार से शरीर के लिए नुकसानदायक है। इसके बावजूद यदि कोई व्यक्ति इसका सेवन करना ही चाहता है, तो उसे केवल बेहतरीन गुणवत्ता वाले ब्रांड्स का ही चयन करना चाहिए। भले ही कोई साल में एक आध बार इसका सेवन करे, लेकिन गुणवत्ता से कभी समझौता न करें। सस्ती, खुली और कम कीमत वाली अवैध शराब में मिथाइल अल्कोहल होने का जोखिम सबसे अधिक रहता है। इसलिए इस तरह के जोखिम मोल लेने से बचना चाहिए। इसके अलावा मदिरापान के दौरान पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करना समझदारी होती है।



















