दैनिक खानपान में केवल स्वाद ही नहीं बल्कि संपूर्ण पोषण सुनिश्चित करने के लिए अनाजों में विविधता लाना बेहद जरूरी माना जाता है। उत्तर भारत और विशेष रूप से उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में पीढ़ियों से एक से अधिक अनाजों को मिलाकर आटा तैयार करने का चलन रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में इसे पारंपरिक तौर पर नौरंगी या सतरंगी आटा पुकारा जाता है। सिर्फ गेहूं के आटे पर निर्भर रहने के बजाय इसमें मंडुवा, जौ, मक्का और स्थानीय दालों को शामिल किया जाता है, जिससे थाली में जरूरी पोषक तत्वों का संतुलन अपने आप बन जाता है।
पांच किलो आटे का सही मिश्रण और अनाज का अनुपात
पारंपरिक खानपान की जानकार संतोषी देवी के अनुसार, अलग-अलग अनाजों का एक संतुलित अनुपात में होना ही इस आटे की असली ताकत है। संतोषी देवी कहती हैं, "मल्टीग्रेन आटे की खासियत यह है कि इसमें कई तरह के अनाज और दालों को एक साथ शामिल किया जाता है।"
यदि आप अपने घर के लिए पांच किलोग्राम का बैच तैयार करना चाहते हैं, तो अनाजों की यह मात्रा सबसे उपयुक्त मानी जाती है
- गेहूं: 2.5 किलोग्राम मुख्य आधार के रूप में
- मंडुवा (रागी): 1 किलोग्राम
- ओगल अथवा फापर (कुट्टू): 500 ग्राम
- जौ: 500 ग्राम
- काला भट्ट या सोयाबीन: 250 ग्राम
- मक्का: 250 ग्राम
इस सटीक मिश्रण से तैयार होने वाला आटा रोटी को मुलायम बनाए रखने के साथ-साथ कई ऐसे जरूरी तत्व प्रदान करता है जो सामान्य मैदे या सादे गेहूं के आटे में नहीं मिलते।
पोषण और पाचन के लिए क्यों फायदेमंद है यह मिश्रण
इस आटे में शामिल किया जाने वाला मंडुवा (रागी) कैल्शियम और घुलनशील फाइबर का बेहतरीन प्राकृतिक माध्यम माना जाता है। वहीं जौ की मौजूदगी आटे में फाइबर की मात्रा को और अधिक सुदृढ़ करती है। नियमित आहार में फाइबर का पर्याप्त स्तर पाचन तंत्र की कार्यप्रणाली को सुचारू बनाए रखने में सहायक होता है।
इसके अलावा, मिश्रण में शामिल किए जाने वाले काले भट्ट या सोयाबीन से आटे में पादप-आधारित प्रोटीन जुड़ जाता है। साधारण अनाज के साथ जब दाल या तिलहन का तालमेल होता है, तो भोजन का जैविक मूल्य बढ़ जाता है। मक्का न केवल आटे में हल्का सौंधापन और विशिष्ट स्वाद जोड़ता है, बल्कि इसमें मौजूद पोषक घटक आहार को अधिक ऊर्जावान बनाते हैं। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि हर व्यक्ति की शारीरिक जरूरत अलग होती है, इसलिए अपनी पाचन क्षमता को देखते हुए अनाजों की मात्रा में थोड़ा फेरबदल भी किया जा सकता है।
सफाई, सुखाने और पिसाई की सही तकनीक
घर पर शुद्ध मल्टीग्रेन आटा तैयार करते समय अनाजों की प्राथमिक तैयारी सबसे अहम चरण होता है। सबसे पहले सभी अनाजों और दालों को थाली में फैलाकर कंकड़, धूल-मिट्टी और अवांछित तिनके पूरी तरह निकाल दें। इसके बाद सभी अनाजों को साफ पानी में धोकर तेज धूप में फैला दें।
अनाज को तब तक सुखाना चाहिए जब तक कि उसमें से नमी का आखिरी कतरा भी समाप्त न हो जाए। यदि पिसाई के समय किसी भी दाने में नमी रह गई, तो आटा बहुत जल्द फफूंद पकड़ सकता है या खराब हो सकता है। मिश्रण में शामिल किए जाने वाले काले भट्ट को पिसाने से पूर्व तवे पर हल्का सा भून लेना चाहिए। हल्का भूनने से इसकी कच्ची महक दूर होकर सोंधी खुशबू आती है, लेकिन इसे बहुत तेज आंच पर जलने न दें।
सूखने के बाद इन अनाजों को स्थानीय घराट (पारंपरिक पनचक्की) या आधुनिक आटा चक्की में ले जाकर एक साथ अथवा अलग-अलग पिसवाया जा सकता है। पारंपरिक स्वाद और चोकर का लाभ लेने के लिए हल्का दरदरा पिसाव अच्छा रहता है, जबकि बारीक रोटियां पसंद करने वाले लोग इसे छलनी से छानकर इस्तेमाल कर सकते हैं।
भंडारण के नियम और रसोइ में उपयोग
ताजा पिसे हुए आटे को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए उसे हमेशा किसी साफ, पूरी तरह सूखे और हवा-बंद (एयरटाइट) डिब्बे में ही रखना चाहिए। नमी वाले स्थान, सीधी धूप और कीड़ों से इस आटे का डिब्बा दूर रखना अनिवार्य है, ताकि इसके प्राकृतिक पोषक तत्व और स्वाद महीनों तक बरकरार रहें।
इस मल्टीग्रेन आटे का उपयोग केवल रोजाना की रोटियां या पराठे बनाने तक ही सीमित नहीं है। इससे बेहद स्वादिष्ट और सुपाच्य पूरियां, पौष्टिक चीला, हलवा और पारंपरिक नमकीन पकवान भी तैयार किए जा सकते हैं। अपनी दैनिक खुराक में विविध अनाजों को शामिल करने का यह सबसे सुलभ और सुरक्षित घरेलू उपाय है।



















