मध्य प्रदेश में फेफड़े की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए एक बड़ी उम्मीद की खबर सामने आई है। एम्स भोपाल जल्द ही लंग ट्रांसप्लांट की सुविधा शुरू करने जा रहा है, और यह सर्जरी करीब 20 लाख रुपये में उपलब्ध होगी। इससे उन मरीजों को सबसे ज्यादा राहत मिलेगी जो अब तक इलाज के लिए चेन्नई, दिल्ली या हैदराबाद जैसे दूर के शहरों तक जाने पर मजबूर थे।
प्राइवेट अस्पतालों से कितनी कम है कीमत?
देश के बड़े प्राइवेट अस्पतालों में फेफड़े का प्रत्यारोपण कराना बेहद खर्चीला रहा है। इसकी लागत 60 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है, जो आम परिवारों की पहुंच से बाहर होती है। एम्स भोपाल की योजना है कि यही सर्जरी करीब 20 लाख रुपये में उपलब्ध कराई जाए। हालांकि मरीज की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार यह रकम थोड़ी अधिक भी हो सकती है। राज्य सरकार ने भी पात्र मरीजों को इस महंगे इलाज के लिए आर्थिक सहायता देने पर सहमति जताई है।
दो मरीज पहले से तैयार हैं
एम्स भोपाल में दो मरीजों का लंग ट्रांसप्लांट के लिए पंजीकरण पहले ही हो चुका है। ये दोनों सोटो यानी स्टेट ऑर्गन डोनेशन सोसायटी की प्रतीक्षा सूची में शामिल हैं। जैसे ही कोई उपयुक्त ब्रेन डेड डोनर उपलब्ध होगा, इन मरीजों की सर्जरी की जाएगी।
कब होगा प्रदेश का पहला लंग ट्रांसप्लांट?
चिकित्सकों का अनुमान है कि आने वाले एक से दो महीनों में मध्य प्रदेश में पहली बार लंग ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक संपन्न हो सकता है। एम्स भोपाल के कार्डियोथोरेसिक और वैस्कुलर सर्जन डॉ. विक्रम वट्टी ने इसके लिए अमेरिका के टेनेसी में स्थित वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर से विशेष प्रशिक्षण लिया है। अस्पताल में आधुनिक ऑपरेशन थिएटर, मशीनें और सभी आवश्यक उपकरण पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं। एम्स के डायरेक्टर का कहना है कि हार्ट ट्रांसप्लांट की सुविधा मिलने के बाद अब लंग ट्रांसप्लांट की शुरुआत प्रदेश के लिए एक बड़ी चिकित्सीय उपलब्धि है।
हर साल कितने मरीज राज्य छोड़ते हैं?
मध्य प्रदेश में हर साल लगभग 5 से 6 मरीज लंग ट्रांसप्लांट के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं। इससे उनका न केवल पैसा बल्कि कीमती वक्त भी खर्च होता है। फिलहाल इस सर्जरी को आयुष्मान भारत योजना में शामिल नहीं किया गया है।
सर्जरी के बाद भी होगा मासिक खर्च
फेफड़े का ट्रांसप्लांट होने के बाद मरीज की जिम्मेदारी यहीं खत्म नहीं होती। शरीर नए फेफड़े को अस्वीकार न कर दे, इसके लिए उन्हें जीवनभर इम्यूनोसप्रेशन यानी एंटी-रिजेक्शन दवाएं लेनी होंगी। इन दवाओं पर हर महीने करीब 10 हजार रुपये तक खर्च आ सकता है। इसीलिए मरीज और उनके परिजनों को इस दीर्घकालिक आर्थिक बोझ के लिए भी पहले से योजना बना कर चलनी होगी।













