कम उम्र में अगर अचानक पेशाब करने में भारी रुकावट आने लगे, पेट या कमर के निचले हिस्से में असहनीय दर्द उठे और तेज हाजत होने के बाद भी यूरिन खुलकर न आए, तो यह केवल एक सामान्य असहजता नहीं बल्कि मूत्र तंत्र से जुड़ी किसी गंभीर गड़बड़ी का संकेत हो सकता है। कॉरपोरेट दफ्तरों में काम करने वाले कई युवा जो शारीरिक रूप से पूरी तरह तंदुरुस्त दिखते हैं और नियमित दिनचर्या का पालन करते हैं, वे भी इस तरह की अचानक आई शारीरिक विपत्ति के शिकार बन रहे हैं। शुरुआत में यह समस्या केवल कुछ दिनों के लिए महसूस होती है, जहां यूरिन पास करने के लिए बहुत अधिक जोर लगाना पड़ता है। बाद में कुछ दिनों तक स्थिति सामान्य लगती है, लेकिन धीरे-धीरे यह परेशानी भयानक रूप अख्तियार कर लेती है। बार-बार पेशाब की इच्छा महसूस होना, ब्लैडर भरा हुआ सा लगना, शरीर के एक हिस्से में तेज दर्द उठना और अंततः अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ जाना इस स्थिति के प्रमुख चरण हैं।
पथरी के कारण यूरिनरी ट्रैक्ट में रुकावट और सर्जरी का जोखिम
अचानक पैदा होने वाले इस तरह के मूत्र अवरोध के पीछे एक बड़ा कारण यूरिनरी ट्रैक्ट यानी पेशाब की नली में पथरी का फंसना होता है। जब किडनी में बनने वाले छोटे-छोटे स्टोन नीचे खिसककर यूरेटर या लिंग की नली यानी यूरेथ्रा में आ जाते हैं, तो वे पेशाब के स्वाभाविक प्रवाह को रोक देते हैं। ऐसे स्टोन जब हिलते-डुलते हैं, तो शरीर के निचले या बाएं हिस्से में बेहद तेज दर्द पैदा करते हैं। यूरोलॉजिस्ट और एंड्रोलॉजिस्ट डॉ. विनीत मल्होत्रा के अनुसार, विशेष रूप से पांच से छह मिलीमीटर से छोटे आकार के स्टोन अत्यधिक दर्द पैदा करते हैं क्योंकि वे नली में अटकते रहते हैं। शुरुआत में ऐसी स्थिति में दवाओं के जरिए राहत पहुंचाने की कोशिश की जाती है, लेकिन यदि स्टोन का आकार कम नहीं होता या वह नली की दीवार में पूरी तरह फंस जाता है, तो मरीज को तत्काल सर्जिकल प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है।
युवाओं में प्रोस्टेट इंफेक्शन और प्रोस्टेटाइटिस की समस्या
आमतौर पर प्रोस्टेट ग्रंथि से जुड़ी परेशानियां 55 साल की उम्र पार कर चुके बुजुर्गों में देखी जाती हैं, जिसे बीपीएच या बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया कहा जाता है। इसमें प्रोस्टेट ग्रंथि का आकार स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। हालांकि, कम उम्र के पुरुषों में होने वाली समस्या इससे पूरी तरह अलग है। युवाओं में प्रोस्टेट ग्रंथि के अंदर संक्रमण होने के चलते सूजन आ जाती है, जिसे चिकित्सकीय भाषा में प्रोस्टेटाइटिस कहा जाता है। डॉ. विनीत मल्होत्रा के अनुसार, यह समस्या विशेष रूप से उन लोगों में अधिक देखने को मिलती है जिन्हें लंबे समय तक पेशाब रोककर रखने की आदत होती है। काम के दबाव या यात्रा के दौरान यूरिन को होल्ड करना इस संक्रमण का बड़ा कारण बनता है। इसके अतिरिक्त, कुछ मामलों में सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिजीज भी प्रोस्टेट में संक्रमण और यूरिन रुकावट की वजह बन सकती है।
मांसपेशियों का खिंचाव और ब्लैडर नेक ऑब्सट्रक्शन
कई पुरुषों में शारीरिक रूप से अंगों को अत्यधिक टाइट रखने या पेल्विक हिस्से की मांसपेशियों के लगातार तनाव में रहने से भी मूत्र मार्ग प्रभावित होता है। डॉ. विनीत मल्होत्रा स्पष्ट करते हैं कि जो लोग बहुत भारी वजन उठाने वाली कसरत करते हैं या कठिन शारीरिक श्रम करते हैं, उनके शरीर और प्रजनन अंगों की मांसपेशियां अत्यंत सख्त हो जाती हैं। लिंग और अंडकोष के आसपास की मांसपेशियों में अत्यधिक खिंचाव रहने से ब्लैडर नेक ऑब्सट्रक्शन की स्थिति बन जाती है। इस विकार के कारण पेशाब की थैली एक बार में पूरी तरह खाली नहीं हो पाती। ब्लैडर में यूरिन बाकी रह जाने के चलते व्यक्ति को बार-बार टॉयलेट जाने की तलब महसूस होती है। इसके अलावा, यदि किसी व्यक्ति के प्रजनन अंगों पर कभी कोई अंदरूनी चोट लगी हो, तो वह चोट भी आगे चलकर पेशाब के मार्ग में बार-बार रुकावट खड़ी कर सकती है।
संवेदनशील नसें और ब्लैडर की ओवरएक्टिविटी
कुछ मामलों में मरीज के मूत्र मार्ग में किसी भी प्रकार की शारीरिक रुकावट या पथरी मौजूद नहीं होती, फिर भी उसे बार-बार तेज पेशाब आने का भ्रम होता है। इसे ब्लैडर की ओवरएक्टिविटी या ब्लैडर इनस्टेबिलिटी कहा जाता है। इसमें व्यक्ति के मूत्र तंत्र से जुड़ी नसें अत्यधिक संवेदनशील हो जाती हैं। नतीजतन, जब पेशाब की थैली में बिल्कुल भी यूरिन नहीं होता या नाममात्र का तरल होता है, तब भी नसों की अति-सक्रियता के चलते दिमाग को बार-बार यह सिग्नल जाता है कि तुरंत पेशाब करना जरूरी है। मरीज को लगता है कि उसकी थैली पूरी तरह भर चुकी है, लेकिन यूरिन पास करने जाने पर कुछ भी नहीं निकलता। यह न्यूरोलॉजिकल और मस्कुलर सामंजस्य की गड़बड़ी के कारण होता है।
यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर और सर्जरी की अनिवार्यता
यूरिनरी समस्याओं का अधिकांश इलाज सामान्य दवाओं और तरल पदार्थों के सेवन से संभव हो जाता है, लेकिन कुछ गंभीर स्थितियों में ऑपरेशन ही एकमात्र विकल्प बचता है। यदि मरीज को यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर की समस्या हो गई हो, तो दवाइयां पूरी तरह बेअसर साबित होती हैं। यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर में पेशाब की नली के अंदर सिकुड़न आ जाती है या अंदरूनी चोट के कारण फाइब्रोसिस विकसित हो जाता है, जिससे नली का रास्ता बेहद संकरा हो जाता है। इसी तरह यदि कोई कड़ा स्टोन यूरेथ्रा की दीवार में धंस जाता है, तो मूत्र मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है। इस ब्लॉकेज को हटाने और पेशाब की नली को दोबारा खोलने के लिए डॉक्टरों को सर्जिकल प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ता है।
बचाव के उपाय और जीवनशैली में जरूरी बदलाव
इस प्रकार के यूरिनरी संकट से बचने के लिए विशेषज्ञों ने खान-पान और दैनिक आदतों में सुधार करने पर विशेष जोर दिया है। हालांकि हर स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता, फिर भी स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इसके जोखिम को काफी हद तक घटाया जा सकता है। डॉ. विनीत मल्होत्रा के अनुसार, दिनभर में पर्याप्त मात्रा में पानी पीना सबसे बुनियादी और जरूरी नियम है। बाहर का अस्वच्छ या अत्यधिक तेल-मसाले वाला खाना खाने से परहेज करना चाहिए। अपने दैनिक आहार में नमक की मात्रा को सीमित रखना जरूरी है। इसके साथ ही रेड मीट और कृत्रिम प्रिजर्वेटिव्स वाले प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के नियमित सेवन से पूरी तरह दूरी बनानी चाहिए ताकि शरीर में पथरी और संक्रमण का खतरा न्यूनतम स्तर पर रहे।



















