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रितेश माधव: 45 की उम्र में 87 बार रक्तदान, अब 101 का संकल्प — कोडरमा के इस शख्स की मिसालस्वास्थ्य
14 जून 2026, 10:05 am (45 दिन पहले)· 0

रितेश माधव: 45 की उम्र में 87 बार रक्तदान, अब 101 का संकल्प — कोडरमा के इस शख्स की मिसाल

कोडरमा के जेजे कॉलेजकर्मी रितेश माधव ने वर्ष 2000 से अब तक 87 बार रक्तदान किया है और कई जिंदगियां बचाई हैं। उनका लक्ष्य जीवन में 101 बार रक्तदान करना है।

विश्व रक्तदान दिवस पर कोडरमा से एक ऐसी कहानी सामने आई है जो उन सभी को आईना दिखाती है जिन्होंने आज तक एक बार भी अपना खून नहीं दिया। जेजे कॉलेज में कार्यरत रितेश माधव 45 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते 87 बार रक्तदान कर चुके हैं, और इस सिलसिले में अनगिनत अनजान जरूरतमंदों को नई जिंदगी मिल चुकी है। उनके सामने अब एक और मंजिल है — जीवन में कुल 101 बार रक्तदान का संकल्प पूरा करना।

कहां से शुरू हुआ यह सफर

एक खास बातचीत में रितेश माधव ने बताया कि इस आदत की नींव वर्ष 2000 में पड़ी थी, उस दौर में जब वे पटना विश्वविद्यालय के छात्र हुआ करते थे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक रक्तदान शिविर में उन्होंने पहली बार अपनी बांह आगे बढ़ाई। वही पल उनके जीवन का मोड़ साबित हुआ — उसी दिन उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि अब उम्रभर नियमित रूप से खून देते रहेंगे और जरूरतमंदों के काम आते रहेंगे।

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हर तीन-चार महीने में एक बार, बीते 25 साल से

तब से लेकर अब तक, यानी करीब 25 बरसों से, रितेश हर तीन से चार महीने के अंतराल पर बिना नागा रक्तदान करते आ रहे हैं। उनका ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव है और जब भी किसी को जरूरत हो, वे बिना एक पल झिझके तैयार खड़े मिलते हैं। उनके लिए रक्तदान महज एक सामाजिक फर्ज नहीं है — वे इसे किसी अनजान इंसान को जिंदगी सौंपने का सबसे बड़ा जरिया मानते हैं।

महामारी में भी नहीं रुके कदम

कोरोना के सबसे डरावने दिनों में, जब पूरा देश दहशत में जी रहा था, तब भी रितेश का हौसला नहीं डगमगाया। उन्होंने खून देने की इच्छा जताई और सदर अस्पताल के ब्लड बैंक तक जा पहुंचे। हालांकि संक्रमण के बढ़ते खतरे को देखते हुए ब्लड बैंक के कर्मियों ने उन्हें उस वक्त अनुमति नहीं दी और घर लौटा दिया।

जब एक सड़क हादसे में बची एक जान

बातचीत के दौरान एक घटना सुनाते हुए रितेश भावुक हो उठे। उन्होंने बताया कि करीब दो साल पहले जेजे कॉलेज के ठीक सामने एक कार और ट्रक की भिड़ंत हुई थी। इस टक्कर में एक व्यक्ति की मौके पर ही जान चली गई, जबकि उसकी पत्नी बुरी तरह घायल हो गईं। अस्पताल में तुरंत खून की जरूरत थी। ऐसी विकट घड़ी में रितेश माधव ने अपना रक्तदान कर उस महिला के इलाज में मदद की और उनकी जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।

'शरीर का खून कुएं के पानी जैसा है'

रक्तदान का महत्व समझाते हुए रितेश एक सीधी-सी मिसाल देते हैं। उनके मुताबिक शरीर का रक्त बिल्कुल कुएं के पानी की तरह होता है — अगर कुएं से लगातार पानी न निकाला जाए तो वह सड़ने लगता है। ठीक वैसे ही शरीर की पुरानी रक्त कोशिकाएं भी समय के साथ खत्म होती रहती हैं। उनका कहना है कि जब हम रक्तदान करते हैं तो शरीर नई कोशिकाएं बनाने लगता है और हमारी सेहत भी बेहतर रहती है। इसीलिए वे किसी की जिंदगी बचाने को सबसे बड़ा पुण्य मानते हैं।

87 बार के बाद भी पूरी तरह तंदुरुस्त

इतनी बार खून देने के बावजूद रितेश पूरी तरह स्वस्थ हैं और इसे वे खुद एक संदेश की तरह पेश करते हैं। वे न तो किसी खास डाइट का पालन करते हैं और न ही कोई असाधारण दिनचर्या अपनाते हैं — आम लोगों की तरह सामान्य भोजन और सामान्य जीवनशैली ही उनका तरीका है। उनका भरोसा है कि किसी भी सेहतमंद इंसान के लिए नियमित रक्तदान पूरी तरह सुरक्षित है।

जिले से लेकर राज्य तक मिल चुका सम्मान

रक्तदान के प्रति लोगों को जागरूक करने और लगातार समाजसेवा में जुटे रहने के लिए रितेश माधव को जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक कई सामाजिक संस्थाओं और गैर सरकारी संगठनों ने सम्मानित किया है। झारखंड सरकार भी उन्हें सम्मानित कर चुकी है। रितेश मानते हैं कि इस तरह के सम्मान सिर्फ उनकी हौसलाअफजाई नहीं करते, बल्कि और लोगों को भी रक्तदान के लिए आगे आने की प्रेरणा देते हैं।

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