छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में प्रसव से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाएं इस समय एक गंभीर संकट से गुजर रही हैं। हालत यह है कि जिला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अब प्रसव कराने के बजाय गर्भवती महिलाओं को सीधे अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल की ओर रवाना कर दे रहे हैं। नतीजा यह कि दूर-दराज के इलाकों से इलाज के लिए निकलीं कई महिलाएं और उनके नवजात अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में दम तोड़ दे रहे हैं।
रेफरल की मार सबसे ज्यादा ग्रामीण और आदिवासी इलाकों पर
संभाग के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा लगातार सवालों के घेरे में रहा है। यहां सामान्य डिलीवरी हो या फिर पेचीदा प्रसव का मामला — मरीजों को जिला अस्पतालों और उप स्वास्थ्य केंद्रों से उठाकर सीधे अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज भेज दिया जाता है। दिक्कत यह है कि दूरस्थ गांवों से अंबिकापुर तक पहुंचने में ही कई-कई घंटे निकल जाते हैं।
टूटी-फूटी सड़कें, ऐन वक्त पर एंबुलेंस का न मिलना और इलाज में होने वाली देरी — ये तीनों मिलकर कई गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। आंकड़ों की भाषा में देखें तो हर 100 में से 5 माताओं की जान जा रही है, जबकि शिशु मृत्यु दर भी बढ़ चुकी है।
संसाधनों की कमी, इसलिए मजबूरी का रेफरल
समाजसेवियों का साफ कहना है कि स्थानीय अस्पतालों में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों, प्रशिक्षित स्टाफ और जरूरी संसाधनों की भारी कमी है, और यही वजह है कि मरीजों को मजबूरी में आगे रेफर कर दिया जाता है। हालात इतने खराब हैं कि कई अस्पतालों में तो 24 घंटे प्रसूति सेवाएं तक मौजूद नहीं हैं, जिससे रात-बेरात आने वाली महिलाओं के पास कोई विकल्प ही नहीं बचता।
पहला घंटा सबसे अहम, पर वही गुजर जाता है रास्ते में
TrendKia की टीम ने जब एक स्त्री रोग विशेषज्ञ से बात की, तो उन्होंने बताया कि डिलीवरी के तुरंत बाद मां और बच्चे दोनों को इलाज की बेहद जरूरत होती है। उनके मुताबिक शुरुआती 1 घंटा बेहद महत्वपूर्ण होता है और इस समय सीमा का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। विडंबना यह है कि सरगुजा में यही सबसे कीमती घंटा अक्सर खराब सड़कों और लंबे सफर में ही बीत जाता है।
मेडिकल कॉलेज पर बढ़ता बोझ, उठते सवाल
लगातार बढ़ते रेफरल मामलों ने अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल पर भी दबाव कई गुना बढ़ा दिया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर जिला अस्पतालों में ऐसी कौन-सी कमी है, जिसके चलते अधिकांश मरीजों को मेडिकल कॉलेज की ओर धकेला जा रहा है। और इस पूरी व्यवस्था का खामियाजा अंततः आम लोग अपनी और अपने नवजातों की जान देकर भुगत रहे हैं। स्थानीय अस्पतालों की व्यवस्था, विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता और पूरे रेफरल सिस्टम की कार्यप्रणाली — तीनों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।













