अक्सर लोग केवल दो मिनट के लिए किसी सोशल मीडिया ऐप को खोलते हैं, लेकिन जब उनकी नजर समय पर पड़ती है तो आधा घंटा या उससे भी अधिक समय निकल चुका होता है। स्मार्टफोन पर लगातार सनसनीखेज खबरें, परेशान करने वाले वीडियो, विवादित मुद्दे और नकारात्मक पोस्ट देखते रहने की इस प्रवृत्ति को डूम स्क्रॉलिंग कहा जाता है। युवा पीढ़ी और जेन ज़ी में यह आदत बहुत तेजी से फैल रही है। यह समस्या सिर्फ ज्यादा स्क्रीन टाइम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हमारी मानसिक स्थिति और दैनिक जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है।
लगातार चिंताजनक और नकारात्मक सामग्री के संपर्क में रहने से मस्तिष्क लगातार सतर्क स्थिति में बना रहता है। इससे व्यक्ति का मिजाज प्रभावित होता है और मानसिक थकावट महसूस होने लगती है। हालांकि, इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए तकनीक या फोन का पूरी तरह त्याग करना आवश्यक नहीं है। दैनिक जीवन की कुछ साधारण आदतों में सुधार करके इस डिजिटल आदत पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है।
डूम स्क्रॉलिंग की प्रवृत्ति क्यों बढ़ती जा रही है?
आधुनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म का ढांचा इस प्रकार तैयार किया जाता है कि उपयोगकर्ता का ध्यान लगातार स्क्रीन पर बना रहे। जैसे ही एक वीडियो या पोस्ट समाप्त होती है, तुरंत दूसरी सामग्री सामने आ जाती है। कभी कोई ताजा घटनाक्रम तो कभी कोई वायरल वीडियो हमारी जानने की इच्छा को जगाता है। हम बार-बार यह सोचते हैं कि बस एक और पोस्ट देख लें, और यही सोच हमें अंतहीन स्क्रॉलिंग के चक्र में फंसा देती है।
यह समस्या विशेष रूप से रात के समय बिस्तर पर फोन का उपयोग करते समय अत्यधिक गंभीर रूप ले लेती है। सोने से ठीक पहले स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी और नकारात्मक खबरों का प्रभाव मस्तिष्क को शांत होने से रोकता है। परिणामस्वरूप, नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है और व्यक्ति सुबह उठकर भी थका हुआ महसूस करता है।
डूम स्क्रॉलिंग रोकने के 5 आसान और व्यावहारिक उपाय
डिजिटल आदतों में सुधार करने और डूम स्क्रॉलिंग के दुष्चक्र से बाहर निकलने के लिए निम्नलिखित 5 प्रभावी रणनीतियों को अपनाया जा सकता है
- 1. ऐप उपयोग के लिए समय सीमा निर्धारित करें: सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने के लिए प्रतिदिन का एक निश्चित समय तय करें। शुरुआती चरण में 20 से 30 मिनट की सीमा निर्धारित की जा सकती है। जब निर्धारित समय समाप्त हो जाए और ऐप बंद हो, तो दोबारा उसे खोलने से पहले स्वयं से यह सवाल पूछें कि क्या कोई अति आवश्यक जानकारी देखना बाकी है। यह छोटा सा आत्म-मूल्यांकन आपको ऑटो-पायलट मोड में फोन चलाने से रोकता है।
- 2. सुबह की शुरुआत फोन से दूर रखकर करें: कई लोगों की दिनचर्या आंख खुलते ही सोशल मीडिया के नोटिफिकेशन, मैसेज और रील्स चेक करने से शुरू होती है। सुबह के शुरुआती समय में ही स्क्रीन के संपर्क में आने से पूरे दिन का तनाव स्तर बढ़ सकता है। उठने के बाद कम से कम 30 मिनट तक फोन से दूरी बनाए रखें। इस दौरान जलपान करना, हल्का व्यायाम या नाश्ता करने जैसी सकारात्मक दिनचर्या अपनाएं।
- 3. नकारात्मक कंटेंट वाले अकाउंट्स को अनफॉलो करें: डिजिटल फीड में दिखने वाली हर ट्रेंडिंग पोस्ट को देखना जरूरी नहीं होता। यदि कोई पेज या क्रिएटर लगातार डर, तनाव, गुस्सा या नकारात्मकता फैलाने वाली सामग्री शेयर करता है, तो उसे अनफॉलो या म्यूट कर दें। इसके स्थान पर केवल उन्हीं अकाउंट्स को फॉलो करें जो ज्ञानवर्धक, मनोरंजक और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देते हों।
- 4. सोने से 30 से 60 मिनट पहले फोन दूर रखें: रात के समय "केवल एक और वीडियो" देखने की चाहत सबसे ज्यादा समय बर्बाद करती है। नींद के समय से लगभग 30 से 60 मिनट पहले फोन को बेड से दूर किसी अन्य स्थान पर रख दें। सुबह जगाने के लिए अलार्म घड़ी का उपयोग किया जा सकता है। फोन पास न होने पर बार-बार स्क्रीन चेक करने की आदत स्वतः समाप्त हो जाती है।
- 5. 5 मिनट का पॉज़ नियम लागू करें: जब भी बिना किसी उद्देश्य के स्क्रीन स्क्रॉल करने की तीव्र इच्छा महसूस हो, तो खुद को 5 मिनट रोकने का नियम बनाएं। इस दौरान कमरे से बाहर टहलें, पानी पिएं, किसी परिचित से बात करें या कोई अधूरा छोटा कार्य पूरा कर लें। यह 5 मिनट का छोटा सा ब्रेक मस्तिष्क को अनियंत्रित स्क्रॉलिंग के चक्र से बाहर निकालने में बेहद मददगार साबित होता है।
सचेत स्क्रॉलिंग: तकनीक का सीमित और सही उपयोग
डूम स्क्रॉलिंग से बचने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि आप इंटरनेट, न्यूज या सोशल मीडिया का प्रयोग करना पूरी तरह बंद कर दें। वास्तविक आवश्यकता इस बात की है कि स्क्रॉलिंग पूरी तरह सचेत और उद्देश्यपूर्ण हो। जब भी फोन खोलें, तो किसी स्पष्ट कारण या जरूरत के तहत खोलें, न कि केवल समय बिताने के लिए स्क्रीन पर उंगलियां चलाते रहें। दिनभर में कुछ निश्चित समय तय करके सोशल मीडिया चेक करने की आदत इस दिशा में एक बेहतरीन कदम है।
अंततः यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि तकनीक का निर्माण हमारे जीवन और समय को सुगम बनाने के लिए हुआ है, न कि हमारे बहुमूल्य समय को नष्ट करने के लिए। इस डिजिटल बदलाव की शुरुआत किसी एक छोटे कदम से की जा सकती है, जैसे रात को फोन दूर रखना या ऐप्स पर टाइम लिमिट लगाना। धीरे-धीरे यही छोटी आदतें एक स्वस्थ डिजिटल जीवनशैली का निर्माण करती हैं।



















