अक्सर लोग मुंह के साधारण छाले या शरीर में महसूस होने वाली छोटी गांठ को सामान्य समझकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह लापरवाही सेहत पर भारी पड़ सकती है। भारत में गंभीर बीमारियों से निपटने के दौरान सबसे जटिल बाधा समय पर बीमारी का पता न चलना और उपचार तक सुलभ पहुंच का अभाव है। स्वास्थ्य आंकड़ों के मुताबिक देश में प्रतिवर्ष कैंसर के करीब 15.6 लाख नए मरीज सामने आते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि लगभग 70 से 80 फीसदी लोग तब चिकित्सीय परामर्श के लिए अस्पताल पहुंचते हैं जब बीमारी काफी गंभीर या एडवांस स्टेज में प्रवेश कर चुकी होती है।
स्वास्थ्य दिवस का संदेश और विशेषज्ञों की राय
हर साल 7 नवंबर को राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल कैंसर अवेयरनेस डे का आयोजन किया जाता है। इस वार्षिक अभियान का मूल उद्देश्य आम जनमानस के बीच समय रहते लक्षणों को पकड़ने, नियमित जांच कराने और सही वक्त पर उपचार शुरू करने के प्रति सतर्कता लाना है। नई दिल्ली स्थित वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज (VMMC) और सफदरजंग अस्पताल के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने शुरुआती जांच को ही इस लड़ाई का सबसे कारगर हथियार बताया है।
इस चिकित्सा विश्लेषण में वीएमएमसी और सफदरजंग अस्पताल के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की मेडिकल ऑफिसर डॉ. सौम्या अग्रवाल, इसी विभाग के विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार और सीजीएचएस (CGHS) नॉर्थ जोन के अतिरिक्त निदेशक कार्यालय में तैनात मेडिकल ऑफिसर डॉ. रोहित जोशी ने जमीनी चुनौतियों और समाधान पर विस्तार से प्रकाश डाला है।
महिलाओं और पुरुषों में दिखने वाले प्रमुख लक्षण
ग्लोबोकैन 2022 (GLOBOCAN 2022) के विश्लेषण से यह तथ्य सामने आया है कि भारतीय महिलाओं में सामने आने वाले कुल कैंसर मामलों में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले ब्रेस्ट कैंसर की है। वहीं दूसरी ओर पुरुषों में ओरल यानी मुंह का कैंसर सबसे अधिक पाया जाने वाला रोग बनकर उभरा है। चिकित्सा विशेषज्ञों ने कुछ बेहद स्पष्ट चेतावनी संकेतों को चिन्हित किया है जिन पर तत्काल ध्यान देना आवश्यक है। यदि मुंह के भीतर कोई छाला चार सप्ताह यानी एक महीने से अधिक समय तक बना रहे और सामान्य दवाओं से ठीक न हो, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके अलावा महिलाओं में स्तन के भीतर किसी भी प्रकार की असामान्य गांठ, शरीर के किसी अंग से अकारण रक्तस्राव होना या बिना किसी स्पष्ट वजह के अचानक वजन कम होना ऐसे लक्षण हैं जिनकी बिना देरी किए क्लिनिकल जांच कराई जानी चाहिए।
सरकारी नीतियां, दवाइयों पर राहत और मौजूदा सीमाएं
उपचार के भारी खर्च से परिवारों को राहत दिलाने के लिए सरकार ने आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई (PM-JAY), जनऔषधि केंद्र और अमृत (AMRIT) फार्मेसी जैसी कई व्यापक योजनाएं संचालित की हैं। पीएम-जेएवाई योजना के अंतर्गत पात्र लाभार्थी परिवारों को गंभीर बीमारियों के लिए प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज उपलब्ध कराया जाता है। इसके साथ ही नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने 543 ब्रांडेड कैंसर रोधी दवाओं के खुदरा मूल्यों में संशोधन किया है। दवाओं की यह संशोधित दरें 9 नवंबर 2026 से प्रभावी होंगी, जिससे मरीजों की जेब से होने वाले सालाना खर्च में करीब 2,500 करोड़ रुपये की सीधी बचत होने का अनुमान लगाया गया है। प्राथमिक स्वास्थ्य नेटवर्क के तहत आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से फरवरी 2026 तक 34.7 करोड़ से अधिक ओरल स्क्रीनिंग, 16.2 करोड़ ब्रेस्ट स्क्रीनिंग और 8.7 करोड़ सर्वाइकल कैंसर जांच पूरी की जा चुकी हैं।
इतने बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग अभियान के बावजूद एक अहम चुनौती मरीजों को जांच के तुरंत बाद उच्च स्तरीय उपचार केंद्रों तक पहुंचाने की बनी हुई है। देश के विभिन्न हिस्सों में कैंसर रोग विशेषज्ञों और रेडियोथेरेपी मशीनों का वितरण बेहद असमान है। इस बुनियादी कमी के चलते दूरदराज और छोटे शहरों के मरीजों को समय पर उचित रेडियोथेरेपी या विशेषज्ञ परामर्श लेने के लिए बड़े महानगरों का रुख करना पड़ता है, जिससे इलाज शुरू होने में अनावश्यक देरी होती है।
उपचार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की दिशा
इस बीमारी से निपटने के लिए केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाने या सस्ती दवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं रहा जा सकता। एक मजबूत स्वास्थ्य तंत्र के लिए जमीनी स्तर पर संदिग्ध मामलों की तुरंत पहचान, पर्याप्त प्रशिक्षित ऑन्कोलॉजिस्ट्स की तैनाती, जिला स्तर पर अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं और इलाज के बाद मरीजों की सतत निगरानी यानी फॉलोअप का ढांचा खड़ा करना बेहद जरूरी है। नेशनल कैंसर अवेयरनेस डे की मूल सीख यही है कि शरीर में होने वाले किसी भी असामान्य बदलाव को नजरअंदाज न करें, क्योंकि सही समय पर की गई जांच जीवन रक्षा की पहली कड़ी है।



















