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जहरीली हवा से दिल पर गहरा संकट, जानिए कैसे बढ़ता एक्यूआई ट्रिगर करता है कार्डियक अरेस्टस्वास्थ्य
4 नव॰ 2026, 1:47 pm (2 मिनट पहले)· 0

जहरीली हवा से दिल पर गहरा संकट, जानिए कैसे बढ़ता एक्यूआई ट्रिगर करता है कार्डियक अरेस्ट

दिल्ली एनसीआर में एक्यूआई 350 के पार पहुंचने के साथ फेफड़ों के साथ-साथ हृदय संबंधी बीमारियों और दिल के दौरे का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।

राजधानी दिल्ली और पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में धुंध और जहरीली हवा का शिकंजा एक बार फिर कसने लगा है। कई प्रमुख इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई का स्तर 350 के आंकड़े को पार कर चुका है, जिसके चलते लोग गले में जलन, आंखों में चुभन और सांस फूलने की समस्याओं से जूझ रहे हैं। अक्सर लोग वायु प्रदूषण को सिर्फ खांसी, जुकाम या फेफड़ों के संक्रमण से जोड़कर देखते हैं, लेकिन इसका सबसे घातक वार शरीर के सबसे नाजुक अंग दिल पर होता है। हवा में फैले बारीक और जहरीले तत्व रक्त वाहिकाओं में दाखिल होकर दिल के दौरे की आशंका को कई गुना बढ़ा देते हैं।

खून में घुलकर दिल की धमनियों को कैसे जकड़ता है पीएम 2.5

पैथोलॉजी विशेषज्ञ और एजिलस डायग्नोस्टिक्स के डायरेक्टर डॉक्टर अजय फड़के (एमडी) के अनुसार, दूषित हवा का नुकसान सिर्फ फेफड़ों की सांस नली तक सीमित नहीं रहता। हवा में तैर रहे पीएम 2.5 जैसे बेहद बारीक और अदृश्य कण सांस के जरिए फेफड़ों की गहराई से होते हुए सीधे इंसानी रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं। एक बार खून में मिलने के बाद ये कण पूरे श्वसन तंत्र में गंभीर सूजन पैदा करते हैं।

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इसके सीधे प्रभाव से ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ जाता है और नसों के भीतर खून के थक्के यानी क्लॉटिंग बनने की रफ्तार तेज हो जाती है। जब दिल को खून और ऑक्सीजन पहुंचाने वाली धमनियों में रुकावट आने लगती है, तो कार्डियक अरेस्ट और स्ट्रोक की स्थिति पैदा हो जाती है। चिकित्सा अध्ययनों से यह बात सामने आ चुकी है कि जब किसी क्षेत्र में एक्यूआई गंभीर स्तर पर पहुंचता है, तो उसके कुछ ही दिनों के भीतर अस्पतालों में दिल के दौरे और पक्षाघात के मामलों में तेज उछाल देखा जाता है।

प्रदूषित वातावरण में किन समूहों को बरतनी होगी विशेष सावधानी

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार वायु प्रदूषण का कोई भी स्तर मानव शरीर के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। यदि एक्यूआई का स्तर मध्यम दर्जे पर भी रहे, तब भी नाजुक स्वास्थ्य वाले लोगों पर इसका बुरा असर पड़ सकता है। इस पूरे प्रदूषित मौसम में विशेष रूप से बच्चों, गर्भवती महिलाओं, उम्रदराज बुजुर्गों, सिगरेट या तंबाकू का सेवन करने वालों और पहले से किसी पुरानी बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों को सबसे कड़े एहतियात बरतने की जरूरत होती है।

यदि कोई व्यक्ति पहले से अस्थमा, फेफड़ों की पुरानी बीमारी यानी सीओपीडी, डायबिटीज अथवा दिल की किसी बीमारी से जूझ रहा है, तो जहरीली हवा उसकी मौजूदा स्थिति को अचानक जानलेवा बना सकती है। ऐसे सभी संवेदनशील लोगों को बिना जरूरी काम के बाहर निकलने से बचना चाहिए और अपने स्वास्थ्य का खास ध्यान रखना चाहिए।

शरीर में दिखने वाले इन चेतावनी संकेतों को कतई न करें नजरअंदाज

अगर किसी व्यक्ति को दो से तीन सप्ताह से लगातार खांसी आ रही हो, सांस लेते वक्त सीने से घड़घड़ाहट की आवाज सुनाई दे, हल्का सा चलने पर भी सांस फूलने लगे या सीने के भीतर भारीपन और बेचैनी महसूस होने लगे, तो इसे मामूली मौसमी असर मानकर टालने की भूल नहीं करनी चाहिए।

विशेष रूप से यदि आराम की स्थिति में पल्स ऑक्सीमीटर पर शरीर का ऑक्सीजन स्तर 94 प्रतिशत से नीचे गिर जाता है, तो बिना देर किए सीधे चिकित्सक से संपर्क साधना जरूरी है। सबसे जरूरी बात यह है कि सांस की तकलीफ या खांसी होने पर खुद से मेडिकल स्टोर से एंटीबायोटिक्स या स्टेरॉयड जैसी हैवी दवाएं कभी न लें, क्योंकि यह आदत स्थिति को और अधिक बिगाड़ सकती है।

बीमारी की समय पर पहचान के लिए जरूरी चिकित्सीय जांचें

प्रदूषण से जुड़े लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर मरीज की शारीरिक स्थिति के अनुसार सीबीसी, सीआरपी, इओसिनोफिल काउंट, आईजीई, स्पाइरोमेट्री या फेफड़ों का चेस्ट एक्स-रे कराने की सिफारिश कर सकते हैं। वहीं जो लोग पहले से दिल के मरीज हैं, उन्हें अपने हृदय की स्थिति पर नजर रखने के लिए ईसीजी, लिपिड प्रोफाइल, एचबीए1सी और एचएस-सीआरपी टेस्ट करवाने की सलाह दी जा सकती है।

सर्दियों और धुंध का चरम मौसम शुरू होने से पहले ही अपनी एक प्राथमिक बेसलाइन मेडिकल जांच करवा लेना सबसे सुरक्षित कदम होता है। यदि मौसम के दौरान सेहत या सांस लेने के पैटर्न में कोई नया बदलाव महसूस हो, तो दोबारा जांच करवाकर सही स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए। सही समय पर फेफड़ों और हृदय को हो रहे आंतरिक नुकसान का पता लग जाए, तो उचित दवाओं और जीवनशैली के जरिए इसे समय रहते पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है।

सवाल-जवाब

बढ़ता प्रदूषण दिल के दौरे का खतरा कैसे बढ़ा देता है?
हवा में मौजूद पीएम 2.5 के सूक्ष्म कण फेफड़ों से रक्तप्रवाह में पहुंचकर नसों में सूजन लाते हैं, ब्लड प्रेशर बढ़ाते हैं और खून के थक्के जमाकर हार्ट अटैक की आशंका बढ़ाते हैं।
दिल्ली एनसीआर में वर्तमान में वायु गुणवत्ता का क्या स्तर दर्ज किया गया है?
दिल्ली के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) का स्तर 350 के पार पहुंच चुका है।
प्रदूषण के दौरान किन स्वास्थ्य समस्याओं वाले मरीजों को सर्वाधिक खतरा है?
अस्थमा, सीओपीडी, डायबिटीज, हृदय रोग के मरीजों के साथ-साथ बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और धूम्रपान करने वालों को सबसे अधिक सावधानी रखनी चाहिए।
किन लक्षणों के दिखने पर तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए?
दो-तीन सप्ताह से अधिक खांसी, सांस में घड़घड़ाहट, सांस फूलना, सीने में बेचैनी या आराम की स्थिति में ऑक्सीजन 94 प्रतिशत से कम होने पर डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
हार्ट के मरीजों को प्रदूषण के मौसम में कौन सी जांचें करवानी चाहिए?
हृदय रोगियों को अपने डॉक्टर की सलाह पर ईसीजी, लिपिड प्रोफाइल, एचबीए1सी और एचएस-सीआरपी जैसी जांचें करवानी चाहिए।
क्या सांस की तकलीफ होने पर खुद से एंटीबायोटिक्स ली जा सकती हैं?
नहीं, डॉक्टर की सलाह के बिना खुद से एंटीबायोटिक्स या स्टेरॉयड जैसी दवाएं बिल्कुल नहीं लेनी चाहिए।
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