दुनिया भर में कैंसर के मामले लगातार एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बने हुए हैं। समय रहते बीमारी की पहचान न होने पर यह मरीज की जान के लिए गंभीर खतरा पैदा कर देती है। 2024 के वैश्विक स्वास्थ्य आंकड़ों के मुताबिक कुल 1.92 करोड़ नए कैंसर मामलों में से करीब 23 लाख मरीजों में बीमारी की असल वजह अलग-अलग तरह के इंफेक्शन रहे हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि दुनिया भर में सामने आने वाले लगभग 12 प्रतिशत यानी हर आठ में से एक कैंसर मामले की शुरुआती जड़ कोई न कोई संक्रमण होता है। चिंताजनक बात यह है कि इंफेक्शन से जुड़े कुल मामलों में से 60 प्रतिशत से भी अधिक मामले केवल दो रोगाणुओं, हेलीकोबैक्टर पायलोरी बैक्टीरिया और ह्यूमन पैपिलोमावायरस के कारण सामने आए हैं। डॉक्टरों के अनुसार थोड़ी सी मेडिकल जागरूकता, समय पर जांच और सही उपचार से इन संक्रमण जनित कैंसरों से पूरी तरह बचाव संभव है।
पेट में पनपने वाला बैक्टीरिया कैसे बन जाता है कैंसर
हेलीकोबैक्टर पायलोरी अथवा एच. पायलोरी एक ऐसा बैक्टीरिया है जो इंसान के पेट के ऊपरी हिस्से की अंदरूनी दीवार पर चिपक जाता है। शरीर में प्रवेश करने के तुरंत बाद यह कैंसर पैदा नहीं करता, बल्कि पेट की अंदरूनी सुरक्षा परत जिसे म्यूकोसा कहा जाता है, उसमें यह कई सालों तक खामोशी से छिपा रहता है। अपनी संख्या को धीरे-धीरे बढ़ाने की इस प्रक्रिया में 5 से 7 साल तक का लंबा समय लग सकता है। इस दौरान मरीज के शरीर में बाहर से कोई स्पष्ट या गंभीर लक्षण नजर नहीं आते।
जब इस बैक्टीरिया की संख्या पेट की परत में बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, तब यह क्रोनिक इंफ्लेमेशन यानी लंबे समय तक रहने वाली आंतरिक सूजन में तब्दील हो जाता है। इसके चलते मरीज को गैस्ट्राइटिस की बीमारी घेर लेती है। गैस्ट्राइटिस की इस गंभीर स्थिति में बैक्टीरिया पेट के भीतर एक खास किस्म का विषैला पदार्थ छोड़ना शुरू कर देता है। यह टॉक्सिन पेट की स्वस्थ कोशिकाओं के डीएनए को स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त कर देता है। डीएनए में आई इसी खराबी की वजह से कोशिकाएं असामान्य और अनियंत्रित गति से विभाजित होने लगती हैं, जो आगे चलकर पेट के घातक कैंसर का रूप ले लेती हैं।
एंडोस्कोपी की अनदेखी और पेट के कैंसर से बचाव की राह
आमतौर पर जब किसी व्यक्ति को पेट में गैस, जलन या एसिडिटी की शिकायत होती है, तो वह डॉक्टर के पास जाने के बजाय खुद से मेडिकल स्टोर से एंटासिड या अन्य दवाइयां लेकर खाना शुरू कर देता है। इन अस्थायी दवाइयों के असर से एसिडिटी के लक्षणों में कुछ राहत तो मिल जाती है, लेकिन बैक्टीरिया पेट की म्यूकोसा परत में अंदर ही अंदर दबा रहता है। जब यह परेशानी ज्यादा बढ़ जाती है और मरीज किसी विशेषज्ञ को दिखाता है, तो डॉक्टर अक्सर एंडोस्कोपी करवाने की सलाह देते हैं।
अधिकांश लोग दर्द के डर से या जानकारी के अभाव में एंडोस्कोपी कराने से बचते रहते हैं। उन्हें यह अहसास ही नहीं होता कि यह साधारण प्रक्रिया उन्हें भविष्य के भयानक कैंसर से बचा सकती है। एच. पायलोरी बैक्टीरिया पेट के ऊपरी हिस्से की अंदरूनी परत में बहुत गहराई तक चिपका रहता है, इसलिए खून या सामान्य जांचों की जगह एंडोस्कोपी के जरिए ही उस प्रभावित हिस्से का सटीक सैंपल लिया जा सकता है। डॉक्टर एंडोस्कोपी के दौरान बायोप्सी करते हैं, जिससे उस जगह के ऊतकों की सूक्ष्म जांच कर बैक्टीरिया की मौजूदगी की पुष्टि होती है। डर या लापरवाही में इस जांच को टालने का नतीजा यह होता है कि बैक्टीरिया वर्षों तक पेट में जीवित रहकर चुपचाप कैंसर को विकसित करता रहता है। इसी वजह से जब भी विशेषज्ञ एंडोस्कोपी की सलाह दें, बिना हिचकिचाहट यह जांच तुरंत करवा लेनी चाहिए।
एचपीवी वायरस और सर्वाइकल कैंसर से सुरक्षा के उपाय
संक्रमण से होने वाले कैंसर के मामलों में दूसरा सबसे बड़ा कारण ह्यूमन पैपिलोमावायरस यानी एचपीवी वायरस है। यह वायरस विशेष तौर पर महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर का मुख्य कारण बनता है, हालांकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की मदद से इस बीमारी को पूरी तरह रोका जा सकता है। एचपीवी वायरस के संक्रमण से सुरक्षा के लिए प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध है। 14 साल से कम उम्र की बालिकाओं को यह टीका आसानी से लगाया जा सकता है, वहीं इससे अधिक उम्र की महिलाओं को भी चिकित्सीय परामर्श के बाद यह वैक्सीन जरूर लगवानी चाहिए।
टीकाकरण के अलावा समय-समय पर एचपीवी की मेडिकल स्क्रीनिंग करवाना भी बेहद आवश्यक कदम है। वयस्क होने के बाद प्रत्येक महिला को नियमित अंतराल पर एचपीवी संक्रमण की जांच करवानी चाहिए। इसके लिए पेप स्मीयर टेस्ट किया जाता है, जो काफी आसान और किफायती परीक्षण है। पेप स्मीयर जांच के दौरान यदि गर्भाशय ग्रीवा में वायरस द्वारा निर्मित किसी गांठ या सिस्ट का हल्का सा भी संदेह सामने आता है, तो डॉक्टर उस सिस्ट को शुरुआती स्तर पर ही हटा देते हैं। इस त्वरित प्रक्रिया से संक्रमण को कैंसर में बदलने से पहले ही रोक दिया जाता है। चिकित्सकों की सलाह है कि शुरुआत में महिलाओं को हर साल पेप स्मीयर टेस्ट कराना चाहिए और आगे चलकर हर दो से तीन साल के अंतराल पर इसकी जांच दोहराते रहना चाहिए।
अधूरा इलाज और हेपेटाइटिस से लिवर कैंसर का खतरा
हेपेटाइटिस इंफेक्शन के कारण भी करीब 5 लाख लोगों को कैंसर का शिकार होना पड़ा है। हेपेटाइटिस बी अथवा हेपेटाइटिस सी से संक्रमित होने पर मरीज को पीलिया यानी जॉन्डिस जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। कई बार लोग इसका शुरुआती इलाज तो शुरू करते हैं, लेकिन जैसे ही तबीयत में थोड़ा सुधार दिखता है या पीलिया उतरता है, वे दवाओं का सेवन बीच में ही बंद कर देते हैं। इलाज को अधूरा छोड़ने की यह आदत बेहद खतरनाक साबित होती है, क्योंकि इससे हेपेटाइटिस बी या सी का वायरस शरीर से पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाता और 6 महीने से अधिक समय तक अंदर ही बना रहता है।
जब यह वायरस कई महीनों तक शरीर में सक्रिय रहता है, तो यह धीरे-धीरे लिवर के स्वस्थ टिशू को नष्ट करने लगता है और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। शरीर में लंबे समय तक रहने वाला यह वायरल लोड लिवर की कोशिकाओं के डीएनए में विकृति ला देता है। डीएनए बदलने के कारण लिवर की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं, जो धीरे-धीरे ट्यूमर और फिर लिवर कैंसर का रूप ले लेती हैं। इसलिए मरीजों को डॉक्टर द्वारा निर्धारित दवाओं का पूरा कोर्स बिना नागा खत्म करना चाहिए। दवाएं पूरी होने और मरीज के स्वस्थ महसूस करने के बाद भी समय-समय पर वायरल लोड की जांच कराते रहना आवश्यक है। चाहे पेट का एच. पायलोरी बैक्टीरिया हो, एचआईवी हो या हेपेटाइटिस बी और सी का वायरस, इन सभी संक्रमणों का सटीक इलाज मौजूद है। यदि इन रोगाणुओं को समय रहते शरीर से पूरी तरह खत्म कर दिया जाए तो कैंसर का खतरा न के बराबर रह जाता है।
वैश्विक आंकड़ों में संक्रमण जनित कैंसर का लेखा-जोखा
वर्ष 2024 में संक्रमण के चलते सामने आए कुल 23 लाख कैंसर मामलों का विस्तृत विवरण बताता है कि कौन सा रोगाणु कितना घातक साबित हुआ है। पेट में मौजूद रहने वाले हेलीकोबैक्टर पायलोरी बैक्टीरिया के चलते दुनिया भर में 7.60 लाख लोगों को कैंसर हुआ। दूसरे स्थान पर रहे ह्यूमन पैपिलोमावायरस ने 7.45 लाख महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर का शिकार बनाया। वहीं हेपेटाइटिस बी वायरस के संक्रमण के कारण 3.57 लाख मरीजों में कैंसर विकसित हुआ। इसके अतिरिक्त एचआईवी संक्रमण की वजह से 81 हजार लोगों को कैंसर की चपेट में आना पड़ा, जबकि हेपेटाइटिस बी और सी के संयुक्त प्रभाव भी कई मरीजों में लिवर की गंभीर बीमारियों का कारण बने। इन सभी आंकड़ों से साफ है कि यदि सामान्य लगने वाले संक्रमणों की पहचान कर उनका समय रहते पूर्ण उपचार कर लिया जाए, तो लाखों जिंदगियों को कैंसर जैसी घातक बीमारी से बचाया जा सकता है।


















