सर्दियों का मौसम दस्तक देते ही अधिकांश घरों में खांसी, जुकाम, गले में चुभन और हल्के बुखार की शिकायतें तेजी से बढ़ने लगती हैं। कई लोगों के साथ यह समस्या इतनी गंभीर हो जाती है कि वे एक बीमारी से उबर भी नहीं पाते और कुछ ही हफ्तों के भीतर दोबारा किसी नए संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं। सामान्य तौर पर लोग इसे केवल ठंड लगना या फिर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का अचानक कमजोर पड़ जाना मान लेते हैं। हालांकि, स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार बार-बार बीमार पड़ने के पीछे केवल तापमान का गिरना एकमात्र वजह नहीं होता। हमारे रोजमर्रा के तौर-तरीके, सर्दियों की शुष्क हवा और वातावरण में विभिन्न प्रकार के रोगाणुओं की बढ़ी हुई सक्रियता आपस में मिलकर संक्रमण का चक्र तैयार करती हैं।
बंद कमरों में ज्यादा समय बिताना और हवा की निकासी की कमी
सर्दियों में कंपकंपी से बचने के लिए लोग अपने घरों, कार्यालयों और वाहनों के खिड़की-दरवाजे कसकर बंद रखते हैं। नतीजा यह होता है कि बंद कमरों के भीतर ताजी हवा का आवागमन लगभग रुक जाता है। यदि उस बंद कमरे में कोई एक व्यक्ति भी फ्लू या सामान्य सर्दी से ग्रस्त होता है, तो उसके खांसने, छींकने या यहां तक कि बातचीत करने के दौरान निकले अतिसूक्ष्म कण घंटों हवा में तैरते रहते हैं। जब कई लोग एक ही बंद स्थान पर लंबे समय तक सांस लेते हैं, तो यह दूषित हवा दूसरों के शरीर में आसानी से प्रवेश कर जाती है। बंद जगहों पर वेंटिलेशन यानी हवा की पर्याप्त आवाजाही न होना श्वसन तंत्र से जुड़े वायरस के फैलने की गति को कई गुना बढ़ा देता है।
वातावरण की शुष्क हवा और सांस की नली की सुरक्षा परत
तापमान गिरने के साथ ही सर्दियों में वातावरण की सापेक्ष आर्द्रता यानी नमी के स्तर में भी भारी गिरावट आती है। शुष्क हवा हमारे शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली पर सीधा असर डालती है। नाक और श्वसन नली के भीतर एक सुरक्षात्मक म्यूकस परत होती है, जो बाहर से आने वाले धूल, बैक्टीरिया और वायरस को फेफड़ों तक पहुंचने से पहले ही रोक लेती है। लगातार सूखी और ठंडी हवा में सांस लेने से यह सुरक्षात्मक परत सूखकर कमजोर पड़ जाती है, जिससे रोगाणुओं को शरीर में दाखिल होने का सीधा रास्ता मिल जाता है। इसके अलावा, कम नमी वाले वातावरण में इन्फ्लूएंजा जैसे श्वसन वायरस हवा में अधिक समय तक स्थिर और सक्रिय बने रहते हैं, जिससे संक्रमण का जोखिम बढ़ जाता है।
एक साथ कई श्वसन वायरस का सक्रिय होना
ठंड के महीनों में वातावरण में केवल एक तरह का रोगाणु नहीं होता, बल्कि कई अलग-अलग श्वसन वायरस एक साथ सक्रिय हो जाते हैं। इनमें इन्फ्लूएंजा यानी फ्लू, रेस्पिरेटरी सिंसिशियल वायरस यानी RSV और सामान्य जुकाम पैदा करने वाले दर्जनों किस्म के अन्य वायरस शामिल हैं। जब कोई व्यक्ति किसी एक वायरस से संक्रमित होकर ठीक होता है, तो उसका शरीर केवल उसी विशेष वायरस के खिलाफ अस्थाई इम्युनिटी विकसित करता है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि शरीर बाकी अन्य वायरसों से भी सुरक्षित हो गया है। यही कारण है कि एक संक्रमण से ठीक होने के कुछ ही दिनों बाद जब कोई नया रोगाणु हमला करता है, तो व्यक्ति फिर से बीमार पड़ जाता है और उसे लगता है कि उसकी पुरानी बीमारी दोबारा लौट आई है।
हाथों की स्वच्छता की अनदेखी और दूषित सतहों का संपर्क
सर्दियों में पानी ठंडा होने के कारण लोग अक्सर बार-बार हाथ धोने से बचते हैं या सिर्फ औपचारिकता निभाते हैं। यह लापरवाही संक्रमण फैलने का एक बड़ा माध्यम बनती है। संक्रमित व्यक्ति द्वारा छुए गए दरवाजों के हैंडल, मेज, कीबोर्ड या रेलिंग जैसी सतहों पर वायरस कई घंटों तक जीवित रह सकते हैं। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति इन दूषित सतहों को छूने के बाद उन्हीं बिना धुले हाथों से अपनी आंखों, नाक या मुंह को छूता है, तो रोगाणु सीधे म्यूकस मेम्ब्रेन के जरिए शरीर के अंदर प्रवेश कर जाते हैं। खाना खाने से पहले, सार्वजनिक स्थानों से घर लौटने पर और खांसने या छींकने के बाद हाथों को ठीक से न धोना इस बीमारी चक्र को तेज कर देता है।
संक्रमण के चक्र को तोड़ने के जरूरी और व्यावहारिक कदम
सर्दियों में बार-बार बीमार पड़ने से बचने के लिए अपनी जीवनशैली में कुछ बुनियादी बदलाव करना बेहद जरूरी है। सबसे पहले, अपने हाथों को साबुन और पानी से कम से कम 20 सेकंड तक अच्छी तरह साफ करने की आदत बनाएं। दूसरा, दिन के समय जब धूप निकले या तापमान थोड़ा अनुकूल हो, तो घर और कमरे की खिड़कियां कुछ देर के लिए जरूर खोलें, ताकि बासी हवा बाहर निकल सके और ताजी हवा का संचार हो सके। तीसरा, अत्यधिक भीड़भाड़ वाली बंद जगहों, बाजारों और सार्वजनिक परिवहन में मास्क पहनना श्वसन बूंदों से होने वाले संक्रमण से बचाने में अत्यंत मददगार साबित होता है।
इसके साथ ही, शरीर की प्राकृतिक मजबूती बनाए रखने के लिए रोजाना पर्याप्त और नियमित नींद लेना आवश्यक है। अपने खान-पान में मौसमी फल, हरी सब्जियां, दालें और प्रोटीन युक्त आहार शामिल करें तथा प्यास न लगने पर भी पूरे दिन पर्याप्त मात्रा में गुनगुना या सामान्य पानी पीते रहें। इसके अतिरिक्त, डॉक्टर की सलाह लेकर फ्लू वैक्सीन लगवाने पर विचार करें, जो इन्फ्लूएंजा और उससे जुड़ी गंभीर जटिलताओं के खतरे को काफी हद तक कम कर देती है।
चिकित्सकीय परामर्श कब लेना आवश्यक हो जाता है?
यूं तो सामान्य सर्दी और जुकाम कुछ दिनों के आराम से ठीक हो जाते हैं, लेकिन हर स्थिति को साधारण मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यदि संक्रमण बार-बार लौट रहा हो, बीमारी एक हफ्ते से अधिक समय तक बिना किसी सुधार के खिंच रही हो, या फिर तेज बुखार, सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द और असामान्य अत्यधिक कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो बिना किसी देरी के योग्य चिकित्सक से जांच करवानी चाहिए ताकि किसी गंभीर संक्रमण की समय रहते पहचान हो सके।



















