हफ्ते के आखिरी दिन ढलती धूप के साथ बहुत से लोगों के भीतर एक अनजाना डर और बेचैनी घर करने लगती है। कल सुबह फिर दफ्तर जाना है, इस सोच के हावी होते ही वीकेंड का सारा सुकून अचानक गायब हो जाता है। अक्सर लोग इसे काम या पढ़ाई का भारी बोझ समझ लेते हैं, लेकिन असलियत इससे काफी अलग हो सकती है। हकीकत यह है कि शनिवार और रविवार के दो दिनों में शरीर और मस्तिष्क को वह आराम मिल ही नहीं पाता, जिसकी उन्हें सख्त दरकार होती है। फरीदाबाद स्थित अमृता अस्पताल के मनोरोग विभाग के प्रोफेसर और हेड डॉ. राकेश चड्ढा के मुताबिक, वीकेंड का असली मकसद पूरे हफ्ते की थकान मिटाना होता है, मगर लोग इसे बेवजह भागदौड़, लगातार घूमने-फिरने और सामाजिक गतिविधियों में गुजार देते हैं। नतीजा यह निकलता है कि शारीरिक और मानसिक थकावट कम होने के बजाय और गहरी हो जाती है, जो रविवार शाम आते-आते सोमवार के भारी दबाव में बदल जाती है।
लगातार बेचैनी बर्नआउट की आहट, आधी रात तक स्क्रीन देखने की लत
जब हर वीकेंड के अंत में यह घबराहट बार-बार लौटने लगे, तो इसे केवल सामान्य आलस मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। डॉ. राकेश चड्ढा स्पष्ट करते हैं कि लगातार महसूस होने वाली यह बेचैनी गंभीर मानसिक थकावट यानी बर्नआउट का स्पष्ट संकेत हो सकती है। मौजूदा दौर में लोगों के बीच आमने-सामने बैठकर बातचीत करने का चलन तेजी से घटा है। इसकी जगह देर रात तक स्मार्टफोन थामे रहने, सोशल मीडिया स्क्रॉल करने और तरह-तरह के मोबाइल ऐप में उलझे रहने की आदत ने ले ली है। बड़ी संख्या में लोग रात के 12 बजे, 2 बजे या सुबह 3 बजे तक मोबाइल की स्क्रीन में आंखें गड़ाए रहते हैं। इस अनियंत्रित स्क्रीन टाइम की सीधी मार इंसान की प्राकृतिक नींद पर पड़ती है और शरीर को गहरी नींद का वह चक्र मिल ही नहीं पाता जो उसकी मरम्मत के लिए जरूरी है।
शरीर और दिमाग के लिए 7 से 8 घंटे की गहरी नींद अनिवार्य
शारीरिक और मानसिक तंत्र को सुचारू बनाए रखने के लिए बुनियादी जैविक नियमों का पालन करना बेहद जरूरी है। डॉ. राकेश चड्ढा बताते हैं कि एक सामान्य वयस्क के शरीर और मस्तिष्क को पूरी तरह रीचार्ज होने के लिए रोजाना करीब 7 से 8 घंटे की निर्बाध नींद और मुकम्मल आराम की आवश्यकता होती है। यदि पर्याप्त समय तक सुकून की नींद न मिले, तो मस्तिष्क के न्यूरॉन्स और शरीर के अंग तरोताजा नहीं हो पाते। दिनभर की मसरूफियत, भागदौड़ और लगातार चलने वाली गतिविधियों के बाद शरीर के प्रत्येक सिस्टम को आराम की एक शांत अवधि चाहिए होती है। अगर यह जरूरी ठहराव समय पर न दिया जाए, तो दबी हुई थकान धीरे-धीरे बढ़ती चली जाती है और आगे चलकर गंभीर बर्नआउट की शक्ल में सामने आती है।
शुक्रवार से ही शुरू हो जाती है खिंचाव की शुरुआत, वीकेंड की सही प्लानिंग जरूरी
रविवार शाम के तनाव को कम करने के लिए पूरे वीकेंड के प्रबंधन पर नए सिरे से गौर करने की दरकार है। डॉ. राकेश चड्ढा का कहना है कि यह मानसिक खिंचाव अचानक रविवार की शाम को ही पैदा नहीं होता, बल्कि इसकी जड़ें वीकेंड की शुरुआत से ही जुड़ी होती हैं। पांच दिन काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह तनाव शुक्रवार की शाम से ही असर दिखाना शुरू कर सकता है, जबकि छह दिन काम करने वालों में यह शनिवार शाम से पनपने लगता है। इसलिए वीकेंड की शुरुआत से ही अपने समय का संतुलन बनाना चाहिए। रविवार के दिन को खास तौर पर शांत गतिविधियों, पूरी नींद और मानसिक विश्राम के लिए सुरक्षित रखना चाहिए, ताकि सोमवार की सुबह जब नए हफ्ते का आगाज हो, तो शरीर और दिमाग दोनों पूरी ऊर्जा के साथ तैयार रहें।


















