डायबिटीज और बढ़ते मोटापे से जूझ रहे लोगों के लिए वजन कम करने वाली आधुनिक दवाएं नई उम्मीद बनकर उभरी थीं, लेकिन भारतीय बाजार में अब एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है. भारत दुनिया भर में डायबिटीज के मामलों में दूसरे पायदान पर आता है, जहां करोड़ों लोग खराब जीवनशैली, असंतुलित खानपान और अत्यधिक वजन की समस्या से परेशान हैं. जब डेनमार्क की दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क की ओज़ेम्पिक और अमेरिकी दवा निर्माता एली लिली की मोनजारो जैसी आधुनिक दवाओं की चर्चा शुरू हुई, तो देश में भी इनकी मांग में जबरदस्त इजाफा देखा गया. ये दवाएं मूल रूप से टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों के ब्लड शुगर को नियंत्रित करने के लिए बनाई गई थीं, मगर इनके प्रयोग से तेजी से घटते वजन के प्रभाव ने इन्हें स्लिमिंग ड्रग के तौर पर वैश्विक पहचान दिला दी. मार्च के महीने में इन जीवनरक्षक दवाओं पर से पेटेंट सुरक्षा हट गई, जिसके बाद घरेलू दवा कंपनियों के लिए 70 प्रतिशत तक सस्ते जेनेरिक विकल्प बनाने की राह आसान हो गई थी. हालांकि आम मरीजों तक सस्ती और सुरक्षित दवाएं व्यापक स्तर पर पहुंचने से पहले ही जालसाजों ने नकली और मिलावटी दवाओं का खतरनाक अवैध जाल बिछा दिया है.
डायबिटीज उपचार से चमत्कारी वजन घटाने तक का सफर
नोवो नॉर्डिस्क ने जब पहली बार ओज़ेम्पिक इंजेक्शन पेश किया था, तब इसका प्राथमिक उद्देश्य डायबिटीज के गंभीर मरीजों के स्वास्थ्य को स्थिर करना था. यह दवा शरीर में इंसुलिन के स्राव को संतुलित करने और पाचन क्रिया को धीमा करने का काम करती है. चिकित्सा परीक्षणों और उपयोग के दौरान यह पाया गया कि यह भूख को दबाने और पेट को लंबे समय तक भरा रखने में मदद करती है, जिससे मरीजों के वजन में अप्रत्याशित गिरावट दर्ज की गई. इसके तुरंत बाद एली लिली कंपनी ने मोनजारो दवा बाजार में उतारी, जिसने मोटापे और मेटाबॉलिक सिंड्रोम से पीड़ित लोगों के लिए उम्मीदें और बढ़ा दीं. भारत जैसे विशाल देश में, जहां खराब जीवनशैली जनित बीमारियां लगातार गंभीर रूप ले रही हैं, वहां इन दवाओं को एक बड़े वरदान के रूप में देखा जाने लगा. अगर डॉक्टर के उचित परामर्श और देखरेख में इनका इस्तेमाल किया जाए तो ये गंभीर हृदय रोगों, स्ट्रोक और अनियंत्रित डायबिटीज के खतरों को बड़े स्तर पर घटा सकती हैं.
महंगे इंजेक्शन और जेनेरिक विकल्पों की भारी मांग
इन आधुनिक दवाओं की सबसे बड़ी बाधा इनकी अत्यधिक ऊंची कीमत रही है, जिसके चलते आम मध्यवर्गीय मरीज इनके नियमित उपचार से वंचित रहे. उदाहरण के तौर पर भारत में मोनजारो के एक इंजेक्शन की कीमत 13,000 रुपये से भी अधिक बैठती है. वजन घटाने और मेटाबॉलिक सुधार के लिए इस प्रकार के इंजेक्शन कई महीनों तक लगातार लेने पड़ते हैं, जिससे कुल इलाज का खर्च 1,00,000 रुपये से भी ऊपर निकल जाता है. मार्च में पेटेंट समाप्त होने के बाद भारतीय फार्मास्युटिकल कंपनियों ने इन दवाओं के किफायती जेनेरिक वर्जन विकसित करने की तैयारी कर ली, जिनकी कीमतें ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले लगभग 70 प्रतिशत तक कम होने का अनुमान है. सस्ती दवाओं की इस भारी संभावना और मांग के बीच मिलावटखोरों ने बाजार में अपना दखल बढ़ा दिया और जरूरतमंद मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाना शुरू कर दिया.
हूबहू दिखने वाली पैकेजिंग और नकली दवाओं का ऑनलाइन तंत्र
बाजार में बिक रही नकली दवाओं को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में देखा जा सकता है. पहली श्रेणी में वे उत्पाद आते हैं जो पूरी तरह से फर्जी और धोखेबाजी पर आधारित हैं. इन उत्पादों की बाहरी शीशी, लेबलिंग और कार्टन पैकेजिंग को ओज़ेम्पिक अथवा मोनजारो जैसा बिल्कुल हूबहू डिजाइन किया जाता है, ताकि साधारण नजर से असली और नकली में अंतर कर पाना असंभव लगे. इन नकली शीशियों के अंदर वजन घटाने वाला कोई सक्रिय तत्व मौजूद नहीं होता, बल्कि इनमें केवल रंगीन पानी या अज्ञात तरल भर दिया जाता है. इंटरनेट और विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए कम कीमतों का झांसा देकर इन फर्जी इंजेक्शनों को बेचा जा रहा है. महंगा इलाज न करा पाने वाले मरीज भारी डिस्काउंट देखकर आसानी से इस ठगी के शिकार बन रहे हैं.
अवैध कच्चे माल और दूषित वातावरण में निर्माण का गंभीर खतरा
नकली दवाओं की दूसरी श्रेणी और भी अधिक घातक साबित हो रही है, जिसमें दवाओं को सही वैज्ञानिक नियमों का पालन किए बिना तैयार किया जाता है. ओज़ेम्पिक में मुख्य सक्रिय तत्व के रूप में सेमाग्लूटाइड काम करता है, जबकि मोनजारो का मुख्य एक्टिव कंपोनेंट टिरज़ेपाटाइड है. किसी भी इंजेक्टेबल दवा को सुरक्षित और असरदार बनाने के लिए केवल एक्टिव इनग्रेडिएंट होना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार सख्त स्टेराइल माहौल, सटीक तापमान और विशिष्ट रासायनिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है. कई गैरकानूनी निर्माता चीन जैसे देशों से यह कच्चा एक्टिव केमिकल मंगा रहे हैं और बिना किसी साफ-सुथरे एवं नियंत्रित वातावरण के असुरक्षित तरीके से दवाइयां तैयार कर रहे हैं. अस्वच्छ परिस्थितियों में तैयार किए गए इन इंजेक्शनों से गंभीर बैक्टीरियल इन्फेक्शन, अंगों की विफलता और अन्य जानलेवा स्वास्थ्य जटिलताओं का जोखिम बहुत बढ़ जाता है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि इस अनियंत्रित अवैध कारोबार पर रोक लगाने और आम नागरिकों की जान बचाने के लिए औषधि नियामक संस्थाओं को तुरंत कठोर कानूनी कदम उठाने होंगे.


















