त्योहारी सीजन के दौरान दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के वातावरण में प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक स्थिति में पहुंच जाता है। कई मौकों पर वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI का आंकड़ा 400 से लेकर 700 तक दर्ज किया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में महज कुछ दिनों तक भी विषैली हवा में सांस लेने से फेफड़ों की कार्यप्रणाली को गहरा आघात पहुंचता है। इसका सबसे प्रतिकूल असर छोटे बच्चों, वयोवृद्ध नागरिकों और श्वसन संबंधी पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोगों पर पड़ता है। वायुमंडल से धुंध और धुआं छंट जाने के बाद भी फेफड़ों पर हुआ यह दुष्प्रभाव लंबे समय तक बना रह सकता है। फरीदाबाद स्थित अमृता अस्पताल के पल्मोनोलॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रदीप बजाज के अनुसार, वायु प्रदूषण मानवीय श्वसन तंत्र को बेहद जटिल तरीके से नुकसान पहुंचाता है।
श्वसन संबंधी पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए बढ़ा जोखिम
वायु गुणवत्ता सूचकांक के बिगड़ने पर उसका तात्कालिक प्रभाव तो हर किसी पर नजर आता है, परंतु जो व्यक्ति पहले से क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी COPD, दमा या इंटरस्टिशियल लंग डिजीज यानी ILD जैसी गंभीर फेफड़ों की बीमारियों से जूझ रहे हैं, उनके लिए स्थिति और भी विकट हो जाती है। ऐसे मरीजों के शरीर में विषैले तत्वों के प्रवेश करने के बाद बीमारी के लक्षण लंबे समय तक खिंच सकते हैं। जहरीले कणों के संपर्क में आने से उनकी पुरानी तकलीफें अचानक गंभीर रूप ले सकती हैं और सांस लेने की क्षमता पर गहरा असर पड़ता है।
धूम्रपान न करने वाले लोग भी नहीं हैं सुरक्षित
आमतौर पर यह समझा जाता है कि फेफड़ों की गंभीर बीमारियां केवल बीड़ी, सिगरेट या हुक्का पीने वालों को ही अपनी चपेट में लेती हैं, परंतु वास्तविकता इसके विपरीत है। ऐसे अनेक व्यक्ति जिन्होंने जीवन में कभी भी तंबाकू का सेवन या धूम्रपान नहीं किया, वे भी गंभीर दमा अथवा लंग फाइब्रोसिस जैसी असाध्य बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। 75 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों और छोटे बच्चों के लिए यह विषाक्त वातावरण विशेष रूप से जानलेवा साबित होता है। ढलती उम्र के साथ मानव शरीर के फेफड़ों की प्राकृतिक कार्यक्षमता पहले से ही कम होने लगती है, जिसके चलते वे जहरीली हवा के आघात को आसानी से झेल नहीं पाते हैं।
विकासशील उम्र में बच्चों के फेफड़ों पर स्थायी क्षति का साया
मानव शरीर रचना विज्ञान के अनुसार बच्चों के फेफड़े जन्म के बाद से लेकर लगभग 14 से 16 वर्ष की आयु तक निरंतर विकसित होते रहते हैं। यदि इस महत्वपूर्ण विकासात्मक चरण के दौरान कोई बच्चा लगातार दूषित और विषाक्त वातावरण में सांस लेता है, तो उसके फेफड़ों की ऊतकों को स्थायी रूप से क्षति पहुंच सकती है। इस अवधि में हुआ नुकसान आगे चलकर उसके जीवन में क्रॉनिक अस्थमा तथा सांस की अन्य गंभीर बीमारियों की आशंका को कई गुना बढ़ा देता है। विकास की प्रक्रिया में फेफड़ों की प्राकृतिक क्षमता सीमित हो जाने से बच्चे के वयस्क होने पर भी उसका असर बना रहता है।
लक्षण प्रकट होने से पूर्व जांच द्वारा पहचान संभव
फेफड़ों को नुकसान पहुंचने पर तुरंत खांसी उठने या सांस फूलने जैसे प्रत्यक्ष लक्षण सामने आएं, यह आवश्यक नहीं है। कई बार फेफड़ों की कार्यक्षमता भीतर ही भीतर कमजोर हो रही होती है। ऐसी स्थिति की पूर्व पहचान के लिए पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट यानी PFT और स्पाइरोमेट्री जैसी आधुनिक चिकित्सकीय जांचों का सहारा लिया जा सकता है। इन परीक्षणों की सहायता से किसी भी स्पष्ट शारीरिक लक्षण के उभरने से पहले ही फेफड़ों की वास्तविक कार्यप्रणाली और वायु ग्रहण करने की क्षमता का सटीक आकलन किया जा सकता है। समय रहते किसी योग्य पल्मोनोलॉजिस्ट से परामर्श कर जांच करवाना भविष्य के बड़े नुकसान से बचा सकता है।
गंभीर प्रदूषण के दौर में सुरक्षात्मक उपाय
जब भी वायु गुणवत्ता सूचकांक का स्तर 500 से 600 तक पहुंच जाए, तो लोगों को घरों से बाहर जाकर की जाने वाली तमाम शारीरिक गतिविधियों और व्यायाम को तत्काल कम कर देना चाहिए। जब वायुमंडल में लगातार लंबे समय तक प्रदूषण बना रहता है, तो कमरों और घरों के भीतर की वायु भी प्रदूषित हो जाती है। ऐसे कठिन समय में अधिकांश समय घर के सुरक्षित वातावरण में बिताना, कमरों में एयर प्यूरीफायर का संचालन करना और श्वसन रोगों के मरीजों द्वारा अपनी निर्धारित दवाइयों का नियमित सेवन करना अत्यंत आवश्यक है। सभी प्रभावित व्यक्तियों को अपने चिकित्सक के नियमित संपर्क में रहना चाहिए और उनके मेडिकल प्रिस्क्रिप्शन के आधार पर ही उपचार जारी रखना चाहिए।


















