दैनिक जीवनशैली में शारीरिक गतिविधि की कमी और घंटों एक ही जगह बैठकर काम करने की आदत का सीधा असर शरीर की बनावट पर पड़ता है। चाहे दफ्तर की डेस्क हो या वर्क फ्रॉम होम, लंबे समय तक गतिहीन रहने से वजन बढ़ने लगता है और पेट के आसपास अतिरिक्त चर्बी जमा होने लगती है। जब शरीर का मूवमेंट कम हो जाता है, तो मेटाबॉलिज्म सुस्त पड़ता है और मांसपेशियों का लचीलापन भी घटने लगता है। ऐसे दौर में रोजाना कुछ समय योग के लिए निकालना न केवल शरीर को सक्रिय बनाए रखता है, बल्कि आंतरिक अंगों को भी मजबूत करता है। इसी कड़ी में उत्तानपादासन एक ऐसा योग अभ्यास है, जो खासतौर पर पेट के हिस्से और पैरों की मांसपेशियों को सुदृढ़ बनाने के लिए जाना जाता है।
उत्तानपादासन की मूल शारीरिक क्रिया और प्रभाव
इस योगासन के दौरान साधक को जमीन पर पीठ के बल सीधे लेटना होता है और फिर दोनों पैरों को धीरे-धीरे ऊपर की दिशा में उठाया जाता है। इस मुद्रा में सिर, गर्दन, कंधे और पीठ का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह से फर्श पर टिका रहता है, जबकि दोनों पैरों को कुछ ऊंचाई तक उठाकर हवा में स्थिर रखा जाता है। जब पैरों को इस तरह संतुलित किया जाता है, तो शरीर का पूरा भार और गुरुत्वाकर्षण का दबाव पेट की मांसपेशियों पर पड़ता है। इसके साथ ही जांघों, पिंडलियों और पैरों के निचले हिस्से की मांसपेशियां भी पूरी तरह सक्रिय हो जाती हैं। यही जैविक खिंचाव पेट और शरीर के निचले हिस्से की मजबूती के लिए बेहद लाभकारी सिद्ध होता है।
कोर स्ट्रेंथ और चर्बी घटाने का समग्र दृष्टिकोण
पैरों को हवा में संतुलित रखने की प्रक्रिया के दौरान पेट की अंदरूनी मांसपेशियों को अत्यधिक मेहनत करनी पड़ती है, जिससे पेट का कोर क्षेत्र मजबूत होता है। हालांकि, पेट की चर्बी घटाने की इच्छा रखने वालों को यह बात समझनी चाहिए कि केवल एक ही आसन पर पूरी तरह निर्भर रहना पर्याप्त नहीं हो सकता। पेट का फैट दरअसल पूरे शरीर में वसा का स्तर घटने के साथ ही धीरे-धीरे कम होता है। इसलिए इस योगासन के साथ-साथ दैनिक जीवन में नियमित पैदल चलना, अन्य सामान्य व्यायाम, पौष्टिक एवं संतुलित खानपान और पर्याप्त नींद लेना भी उतना ही आवश्यक है। समग्र दिनचर्या में बदलाव किए बिना केवल एक व्यायाम से स्थायी परिणाम पाना संभव नहीं है।
निचले शरीर की मांसपेशियों की सक्रियता
इस आसन में पैरों को कुछ क्षणों तक ऊपर टिकाए रखने से जांघों और पैरों की मांसपेशियां निरंतर सक्रिय रहती हैं, जिससे शरीर के निचले हिस्से की टोनिंग बेहतर होती है और कमजोरी दूर होती है। जो कामकाजी लोग दिन का अधिकांश समय कुर्सी पर बैठकर बिताते हैं, उन्हें योग के अतिरिक्त भी पूरे दिन में हल्की-फुल्की गतिविधियां करते रहना चाहिए। काम के बीच-बीच में उठकर कुछ कदम टहलना शरीर को सक्रिय और चुस्त रखने का एक बहुत ही सरल और व्यावहारिक तरीका है।
पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में उपयोगिता
उत्तानपादासन के अभ्यास से जब पेट के आसपास की मांसपेशियों में संकुचन और खिंचाव होता है, तो इससे पेट के आंतरिक अंगों की मालिश जैसा प्रभाव पड़ता है। लगातार योगाभ्यास शरीर को गतिशील रखता है और कुछ लोगों को इससे गैस, अपच और पाचन से जुड़ी सामान्य समस्याओं में काफी राहत का अनुभव हो सकता है। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति लगातार पेट दर्द, पुरानी कब्ज या अत्यधिक गैस की गंभीर समस्या से जूझ रहा हो, तो उसे सिर्फ योग के भरोसे नहीं रहना चाहिए। ऐसे मामलों में बिना देरी किए योग्य डॉक्टर से चिकित्सीय जांच और परामर्श लेना अनिवार्य है।
उत्तानपादासन करने की चरणबद्ध विधि
इस आसन को सही ढंग से करने के लिए एक साफ योग मैट पर पीठ के बल सीधे लेट जाएं। दोनों पैरों को आपस में मिलाकर बिल्कुल सीधा रखें और दोनों हाथों को हथेलियां नीचे की तरफ रखते हुए शरीर के करीब फर्श पर टिकाएं। इसके बाद धीरे-धीरे सामान्य गति से सांस अंदर खींचते हुए दोनों पैरों को एक साथ जमीन से ऊपर की ओर उठाएं। पैरों को अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार सुविधाजनक ऊंचाई पर उठाएं और कुछ सेकंड के लिए इसी स्थिति में बने रहें। इस दौरान पेट पर अत्यधिक तनाव देने या अपनी सांस रोकने का प्रयास कतई न करें। इसके पश्चात धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए पैरों को बिना किसी झटके के वापस जमीन पर ले आएं। शुरुआती दिनों में इसे कम समय के लिए करें और जैसे-जैसे अभ्यास बढ़ता जाए, समय सीमा को धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है।
जरूरी सावधानियां और चिकित्सीय सलाह
यदि किसी व्यक्ति को कमर, रीढ़ की हड्डी या पेट में पहले से कोई गंभीर दर्द या चोट की समस्या है, तो उसे यह आसन शुरू करने से पहले किसी चिकित्सक या प्रमाणित योग विशेषज्ञ से राय जरूर लेनी चाहिए। इसके अलावा गर्भवती महिलाओं को भी बिना विशेषज्ञ के मार्गदर्शन के यह आसन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। अभ्यास के दौरान यदि अचानक तेज दर्द, चक्कर आने की अनुभूति या सांस लेने में किसी तरह की तकलीफ महसूस हो, तो तुरंत आसन को रोककर सामान्य स्थिति में आ जाना चाहिए।



















