व्यस्त दिनचर्या और बढ़ते तनाव के बीच खुद को तंदुरुस्त रखने के लिए योग अपनाने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है। कुछ लोग वजन नियंत्रित करने के लिए चटाई बिछाते हैं, तो कई लोग मानसिक सुकून और आंतरिक शांति की तलाश में इसका अभ्यास करते हैं। योग का वास्तविक अर्थ महज शरीर को तरह-तरह के कोणों में मोड़ना या कठिन मुद्राओं को साधना नहीं है। यह असल में मन और शरीर के बीच गहरा सामंजस्य स्थापित करने की एक साधना है, जिसके लिए अटूट धैर्य, लगातार अभ्यास और अपनी शारीरिक सीमाओं की समझ होना बेहद अनिवार्य है। इसी संदर्भ में आयुष मंत्रालय ने अभ्यास से जुड़े बुनियादी दिशा-निर्देश रेखांकित किए हैं, ताकि साधक बिना किसी नुकसान के पूरा लाभ प्राप्त कर सकें।
प्रतिस्पर्धा की भावना से बचें
अभ्यास के दौरान अक्सर लोग दूसरों को देखकर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के फेर में पड़ जाते हैं। वर्ग में या आसपास किसी साथी को जटिल आसन लगाते देख कई साधक तुरंत उसी मुद्रा को दोहराने का प्रयास करने लगते हैं। योग किसी भी प्रकार की होड़ या मुकाबला नहीं है, जहां किसी दूसरे से आगे निकलना आपकी जीत मानी जाए। इसका मूल ध्येय अपने भीतर झांकना और स्वयं की मानसिक व शारीरिक स्थिति को समझना है। किसी अन्य व्यक्ति के लचीलेपन से ईर्ष्या या तुलना करने के स्थान पर अपनी व्यक्तिगत यात्रा और सुधार पर ही ध्यान केंद्रित रखना चाहिए।
अनियमितता के बजाय निरंतरता चुनें
योग का समुचित लाभ तभी हासिल होता है, जब इसे जीवनशैली और दैनिक दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए। सप्ताह में किसी एक दिन अचानक कई घंटे पसीना बहाने से कोई स्थायी लाभ नहीं मिलता, बल्कि प्रतिदिन अपनी सुविधा के अनुसार कुछ समय निकालना कहीं अधिक गुणकारी साबित होता है। शुरुआती दौर में हमेशा सरल और सहज मुद्राओं का चयन करना चाहिए और धीरे-धीरे ही समय अवधि का विस्तार करना चाहिए। नियमित अभ्यास से शरीर की मांसपेशियां सहज रूप से ढलने लगती हैं और अभ्यास की आदत पक्की होती है।
अपनी शारीरिक क्षमता का सम्मान करें
हर साधक की शारीरिक बनावट और मांसपेशियों का लचीलापन बिल्कुल अलग होता है। किसी व्यक्ति की देह प्राकृतिक रूप से ज्यादा मुड़ सकती है, जबकि दूसरे को सामान्य खिंचाव में भी असुविधा हो सकती है। सोशल मीडिया मंचों पर किसी को कठिन मुद्राओं का प्रदर्शन करते देखकर आंख मूंदकर उसकी नकल उतारना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। हमेशा अपनी आयु, मौजूदा शारीरिक स्थिति और वास्तविक क्षमता के आधार पर ही आसनों का चयन करना समझदारी है। क्षमता से परे जाकर शरीर पर अत्यधिक दबाव डालने से मांसपेशियों में खिंचाव या गंभीर चोट लग सकती है।
शरीर के संकेतों और सांसों पर दें ध्यान
आसन की पूर्णता तक पहुंचने की हड़बड़ाहट में अक्सर लोग अपने आंतरिक संकेतों की अनदेखी कर देते हैं। अभ्यास के प्रत्येक क्षण में अपनी श्वसन गति, मांसपेशियों में पैदा होने वाले खिंचाव और मन की शांति पर पूरी सजगता रखनी चाहिए। यदि किसी मुद्रा के दौरान तेज दर्द, चक्कर, भारीपन या किसी भी प्रकार की असहजता महसूस हो, तो जबरन आसन जारी रखने के बजाय तुरंत रुक जाना चाहिए। दर्द को सहन करते हुए आसन को पूरा करने की हठ नुकसानदेह होती है। योग का सही मार्ग शांति, सजगता और आराम के साथ आगे बढ़ना है।
यम और नियम को भी जीवन में उतारें
अधिकांश लोग योग को केवल आसनों और कसरतों तक सीमित समझ लेते हैं, जबकि इसका दायरा बहुत व्यापक है। योग दर्शन में यम और नियम को अत्यंत महत्वपूर्ण आधार माना गया है। यम के अंतर्गत समाज और दूसरों के प्रति सही व्यवहार, अहिंसा, सत्य और ईमानदारी जैसे जीवन मूल्य आते हैं। वहीं नियम के तहत व्यक्तिगत शुचिता, आत्म-अनुशासन, संतोष और नित्य साधना को दैनिक आचरण में ढालने की सीख दी गई है। इन सिद्धांतों को अपनाए बिना योग अधूरा रहता है, क्योंकि इनका उद्देश्य साधक के व्यवहार और संपूर्ण जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव लाना है।



















