वाल्मीकिनगर के जंगलों और ग्रामीण इलाकों में पाई जाने वाली गिलोय को आयुर्वेद शास्त्र में संजीवनी बूटी के समान माना गया है। यदि कोई व्यक्ति खान-पान में आवश्यक संतुलन बनाकर नियमित रूप से सही तरीके से गिलोय का उपयोग करता है, तो उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यधिक मजबूत हो जाती है। इसके निरंतर उपयोग से शरीर बुढ़ापे तक कई तरह के संक्रमणों और बीमारियों से सुरक्षित रहता है। प्राचीन चिकित्सा पद्धति में गिलोय को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि यह शरीर के त्रिदोषों यानी वात, कफ और पित्त को संतुलित करने की क्षमता रखती है।
गिलोय के नाम और इसके मुख्य औषधीय गुण
आयुर्वेद शास्त्र में गिलोय के लिए अमृता और गुडूची जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। अमृता का शाब्दिक अर्थ अमरता प्रदान करने वाला और गुडूची का अर्थ शरीर को समस्त रोगों से बचाने वाला होता है। हालांकि गिलोय की पत्तियों और इसके तने से निकाले गए रस का स्वाद थोड़ा कसैला और कड़वा होता है, लेकिन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह बेहद लाभकारी माना जाता है। बगहा 02 प्रखंड के कदमहिया गांव निवासी सत्येंद्र सिंह, जो वाल्मीकिनगर के आसपास के जंगलों में उगने वाली जड़ी-बूटियों की गहरी समझ रखते हैं, उनका कहना है कि जंगल के निकट रहने वाले ग्रामीण प्राचीन काल से ही गिलोय जैसी औषधियों का सेवन करते आ रहे हैं। इसके प्रभाव से वे बढ़ती उम्र में भी पूरी तरह स्वस्थ और ऊर्जावान बने रहते हैं।
गिलोय का सही सेवन शरीर में कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को रोकने में मदद करता है। इसके मुख्य फायदों में निम्नलिखित शामिल हैं
- पाचन संबंधी राहत: यह गैस, कब्ज और बवासीर जैसी पाचन क्रिया से जुड़ी परेशानियों को नियंत्रित करने में सहायक है।
- त्रिदोष संतुलन: यह शरीर में वात, कफ और पित्त के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखती है।
- गंभीर बीमारियों से बचाव: इसके नियमित उपयोग से मधुमेह, पीलिया या जॉन्डिस और टीबी जैसी बीमारियों से बचाव होता है।
- इम्युनिटी में वृद्धि: यह शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करके बार-बार होने वाले मौसमी बुखार और संक्रमण से सुरक्षा देती है।
नीम के पेड़ पर चढ़ी गिलोय का विशेष महत्व
गिलोय की लताओं में एक अत्यंत अनूठी विशेषता पाई जाती है। यह लता जिस किसी भी औषधीय पेड़ या वनस्पति के संपर्क में आती है, उसके स्वास्थ्यवर्धक गुणों को धीरे-धीरे अपने भीतर अवशोषित कर लेती है। इसी कारण जब गिलोय की बेल किसी नीम के पेड़ पर चढ़ती है, तो उसे अत्यधिक दुर्लभ और असरदार माना जाता है। नीम के पेड़ के संपर्क में आने से गिलोय में नीम के प्राकृतिक एंटीफंगल और एंटीबैक्टीरियल गुण समाहित हो जाते हैं। इससे इस गिलोय की प्रभावशीलता और औषधीय क्षमता सामान्य गिलोय की तुलना में कई गुना बढ़ जाती है।
गिलोय का अर्क तैयार करने की सही विधि और सावधानियां
गिलोय से अधिकतम स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने के लिए इसे सही तरीके से तैयार करना बेहद आवश्यक है। सत्येंद्र सिंह के अनुसार, गिलोय के सेवन के लिए सबसे पहले इसकी पतली शाखाओं को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लेना चाहिए। इसके बाद इन टुकड़ों को साफ पानी में डालकर अच्छी तरह उबालें, ताकि इसके सभी पौष्टिक तत्व पानी में पूरी तरह घुल जाएं। जब उबलने के बाद अर्क तैयार हो जाए, तो इसे छानकर सुबह के समय खाली पेट पीना चाहिए। इस तरह तैयार किया गया अर्क शरीर को सीधे तौर पर गिलोय और उसके सहयोगी पेड़ के सभी आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है।
हालांकि, गिलोय का सेवन करते समय कुछ महत्वपूर्ण सावधानियों का पालन करना जरूरी है
- नियमितता का ध्यान: गिलोय के अर्क का सेवन लगातार हर दिन बिना किसी अंतराल के नहीं करना चाहिए।
- विशेषज्ञ की सलाह: किसी भी चिकित्सीय उपयोग से पहले और बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए किसी योग्य आयुर्वेदाचार्य या चिकित्सक से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।
- संतुलित आहार: गिलोय के सेवन के साथ-साथ सुपाच्य और संतुलित खान-पान का पालन करना भी अनिवार्य है।



















