हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की पारिवारिक पेंशन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्थिति साफ कर दी है। अदालत ने निर्णय दिया कि यदि किसी कर्मचारी ने अपनी पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी की थी, तो पहली पत्नी की मृत्यु हो जाने के बाद भी दूसरी पत्नी को पारिवारिक पेंशन पाने का कोई कानूनी या वैधानिक अधिकार नहीं मिलता। एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि पहली शादी के अस्तित्व में रहते रचाया गया दूसरा विवाह कानून की नजर में अमान्य होता है, इसलिए पहली पत्नी के गुजर जाने से दूसरी शादी वैध नहीं बन जाती।
पेंशन दावे का मामला और पारिवारिक पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला शिमला में शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त हुए जूनियर बेसिक टीचर खूब राम के परिवार से जुड़ा हुआ है। खूब राम 1 जून 1996 को अपनी सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी पहली शादी खिमी देवी के साथ हुई थी। काफी समय बीत जाने के बाद भी जब पहली पत्नी से कोई संतान नहीं हुई, तब खूब राम ने दूसरा विवाह करने का निर्णय लिया। उन्होंने 5 दिसंबर 1970 को दमयंती देवी से दूसरी शादी रचा ली। हालांकि, इस दूसरी शादी के समय खूब राम ने अपनी पहली पत्नी खिमी देवी से कोई कानूनी तलाक नहीं लिया था और उनका पहला विवाह पूरी तरह से कायम था।
पहली पत्नी के निधन के बाद खड़ा हुआ विवाद
सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के कई वर्षों बाद 13 अक्तूबर 2014 को खूब राम का निधन हो गया। पति की मृत्यु के पश्चात नियमानुसार उनकी पहली कानूनी पत्नी खिमी देवी को पारिवारिक पेंशन मिलना शुरू हो गई। खिमी देवी को 2 जुलाई 2023 को अपने निधन तक यह पेंशन लगातार मिलती रही। पहली पत्नी की मृत्यु होने के बाद दमयंती देवी ने खुद को जीवित विधवा बताते हुए संबंधित विभाग के समक्ष पारिवारिक पेंशन पर अपना दावा पेश किया। उन्होंने अपने नाम पर पेंशन जारी करने के साथ ही पिछले बकाया भुगतान की भी मांग की, जिसे प्रशासनिक अधिकारियों ने सिरे से खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट का रुख और याचिका खारिज
प्रशासनिक स्तर पर दावा खारिज होने के बाद दमयंती देवी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने विवाह की कानूनी वैधता और पेंशन अधिकारों का विस्तार से विश्लेषण किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब तक पहली शादी कानूनी रूप से खत्म न हुई हो, तब तक किया गया दूसरा विवाह कानून में शून्य माना जाता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दमयंती देवी की याचिका को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी कि केवल पहली पत्नी की मौत हो जाने भर से दूसरी पत्नी को सरकारी कर्मचारी की पेंशन पर कोई अधिकार नहीं दिया जा सकता।



















